दर्द में डूबों को कलम ने ही प्रदान की है संजीवनी — रामकिशोर उपाध्याय


मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन के कथा संवाद ने किया चौथे वर्ष में प्रवेश

नकारात्मक दौर में सकारात्मकता का मंच है कथा संवाद : हरियश राय



गाजियाबाद। मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन के कथा संवाद को संबोधित करते हुए वरिष्ठ रचनाकार रामकिशोर उपाध्याय ने कहा कि एक अंधकार काल से बाहर निकल कर कथा संवाद जैसे आयोजन निसंदेह ऊर्जा प्रदान करते हैं। बीते साल की पहचान इतिहास में भले ही काले अध्याय के तौर पर हो लेकिन इस काल खंड में रचनाधर्मिता के कई नए आयाम सामने आए हैं। अपनों को खोने के दर्द में डूबे लोगों को कलम ने ही संजीवनी प्रदान की है।
होटल रेडबरी में आयोजित कथा संवाद के चौथे वर्ष में प्रवेश के अवसर पर फाउंडेशन के संरक्षक एवं वरिष्ठ लेखक व आलोचक हरियश राय ने कहा कि साहित्य आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं में शामिल है। पांच हजार साल पुरानी कहानियां हमारी स्मृति में रची बसी हैं। दादी-नानी की सुनाई कहानियां आज भी हमारे साथ चल रही हैं। भारतीय साहित्य विश्व में सबसे अधिक समृद्ध है। इसे और समृद्ध करने की दिशा में मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन द्वारा आयोजित कथा संवाद जैसे पड़ाव विशेष भूमिका निभा रहे हैं। श्री राय ने कहा कि कथा संवाद जैसी कार्यशालाएं भविष्य के रचनाकारों का निर्माण करती हैं।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि किरण यादव ने कहा कि अधिकांश साहित्यिक संस्थाएं एक खास विधा को ही बढ़ावा दे रही हैं। ऐसे में कहानी के वाचन की परंपरा को जिंदा रखना दुरुह कार्य है। उन्होंने “पंछी और पेड़” रचना के माध्यम से अपना लालित्यपूर्ण आत्म वक्तव्य भी प्रस्तुत किया। अपने दोहों पर भी उन्होंने जमकर सराहना बटोरी। कार्यक्रम अध्यक्ष राम किशोर उपाध्याय ने कहा कि आज के दौर में जहां निराशा, वैमनस्य, भुखमरी और युद्ध की विभीषिका जैसे विषयों को कहानियों का आधार बनाकर नकारात्मकता को बढ़ावा मिल रहा हो, वहां प्रेम विषय पर रचनाएं सुनना एक सुखद एहसास है। प्रेम मनुष्य के जीवन का आधार है। श्री उपाध्याय ने प्रेम को आधार बनाकर लिखी गई दीपाली जैन जिया की कहानी “झल्ली” को 21वीं सदी के भारत की स्त्रियों के प्रेम का प्रतीक बताया।
विशेष आमंत्रित अतिथि सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट काक ने कहा कि बीते तीन साल से वह कथा संवाद के इस प्लेटफार्म के बारे में चर्चा सुनते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह प्लेटफार्म रचनाकारों को उत्थान के अवसर देता। मैं भी उठूं, तुम भी उठो, चलो दीवार में एक खिड़की खोलें। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए फाउंडेशन अध्यक्ष शिवराज सिंह ने कहा कि संवाद में साहित्यकारों और श्रोताओं की बड़ी हिस्सेदारी इस बात का सुबूत है कि कंक्रीट के जंगल में साहित्यिक हरियाली विस्तार पा रही है। संयोजक सुभाष चंदर ने कहा कि उम्रदराज लोगों का नवांकुर के तौर पर परिपक्व रचना प्रस्तुत करना इस बात का प्रमाण है कि यह कार्यशाला अपने उद्देश्य की पूर्ति सार्थक तौर पर कर रही है। इस अवसर पर डॉ. पूनम सिंह ने”ये कैसा रंगून बाबुल”, डॉ. निधि अग्रवाल ने ‘शोक पर्व”, नेहा वैद्य ने “भाभी जी का बैग”, “विपिन जैन ने “मां की सांसे”, डॉ. बीना शर्मा ने “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, उमाकांत दीक्षित ने “अपराध बोध” कल्पना कौशिक ने “सुकून”, रश्मि पाठक ने “सच मानिए” और टेकचंद ने “अपराधी” कहानी का पाठ किया। आलोक यात्री ने विदेश में बसे बच्चों के अभिभावकों के संत्रास को आधर बना कर लिखी जाने वाली कहानी “सिलिकॉन वैली” के प्लॉट का पाठ किया।

कार्यक्रम का संचालन दीपाली जैन जिया ने किया। इस अवसर पर पत्रकार अतुल सिन्हा, सुभाष अखिल, जितेंद्र बच्चन, सुशील शर्मा, अशहर इब्राहिम, ललित चौधरी, सोनिया चौधरी, दिनेश शर्मा जम्दाग्नि, सुरेंद्र सिंघल, कमलेश भट्ट कमल, गोविंद गुलशन, मीरा शलभ, डॉ. दलजीत सचदेवा, डॉ. संजय शर्मा, रिंकल शर्मा, बी. एल. बत्रा, डॉ.वीना मित्तल, वागीश शर्मा, तेजवीर सिंह, भारत भूषण बरारा, रविन्द्र कांत त्यागी, आर.पी. बंसल, गौतम सिन्हा, डी. सी. श्रीवास्तव, आर. एस. श्रीवास्तव, पराग कौशिक, अभिषेक कौशिक, सुनील कुमार कौशिक, वैभव शर्मा, धीरेन्द्र दत्त पाठक, अजय वर्मा, श्यामल कुमार मुखर्जी, अजय मित्तल, तन्नु शर्मा, अमित कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।


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