
: निजीकरण का निर्णय वापस न हुआ तो बेमियादी हड़ताल की चेतावनी:
लखनऊ | उ प्र सरकार द्वारा 05 शहरों के विद्युत वितरण का निजीकरण किये जाने के फैसले से गुस्साये बिजली कर्मचारियों ने कई जिलों में विरोध सभायें कर नारेबाजी की। लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, मेरठ, मुरादाबाद, गाजियाबाद, कानपुर और कई अन्य जनपदों में बिजली कर्मचारियों और अभियन्ताओं ने आज कार्यालयों के बाहर जोरदार विरोध प्रदर्शन किये। लखनऊ में मध्यांचल मुख्यालय पर कर्मचारियों एवं अभियन्ताओं का दिनभर विरोध प्रदर्शन चलता रहा।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति उप्र की केन्द्रीय समिति की आज लखनऊ में हुई आपात बैठक में यह निर्णय लिया गया कि यदि प्रदेश सरकार विद्युत वितरण के निजीकरण का फैसला वापस नहीं लेती तो आगामी 27 मार्च को प्रदेश के सभी ऊर्जा निगमों के तमाम कर्मचारी व अभियन्ता एक दिन का कार्य बहिष्कार करेंगे जिसकी सारी जिम्मेदारी सरकार और प्रबन्धन की होगी। संघर्ष समिति ने यह भी निर्णय लिया कि इसके पहले 19 मार्च को प्रदेश भर में जनपद एवं परियोजना स्तर पर सायं 03 बजे से 05 बजे तक विरोध सभायें की जायेंगी। समिति ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि निजीकरण का निर्णय वापस न लिया गया तो बिजली कर्मचारियों एवं अभियन्ताओं को अनिश्चितकालीन हड़ताल का निर्णय लेने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
संघर्ष समिति ने एक बार पुनः प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निजीकरण के फैसले पर पुनः विचार करने की अपील करते हुए कहा है कि प्रदेश की विद्युत व्यवस्था के बारे में ऊर्जा विभाग के आला अधिकारी प्रदेश सरकार को गुमराह कर रहे हैं अन्यथा बिजली व्यवस्था में हो रहे सुधार के बावजूद प्रदेश सरकार निजीकरण का निर्णय न लेती। समिति ने कहा कि एक ओर प्रदेश सरकार बिजली व्यवस्था में सुधार के चलते सभी जिलों में 24 घण्टे बिजली देने की बात कर रही है वहीं दूसरी ओर सुधार के लिए निजीकरण का निर्णय लिया जा रहा है तो यह दोनों बातें विरोधाभाषी हैं। यदि सुधार हो रहा है तो सुधार के नाम पर निजीकरण का क्या औचित्य है। समिति ने यह सवाल भी किया कि लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, मेरठ और मुरादाबाद शहरों का चयन किस आधार पर निजीकरण करने के लिये लिया गया है यह भी सरकार को बताना चाहिए। सरकार का यह वक्तव्य कि शहरों का निजीकरण किया जायेगा जिससे देहातों में बिजली व्यवस्था को सुदृड़ करने हेतु धनराशि खर्च की जा सके यह स्पष्टया मुनाफे के निजीकरण और घाटे के राष्ट्रीयकरण की प्रदेश सरकार की नीति है जो जनहित में नहीं है अतः इस नीति का पुरजोर विरोध किया जायेगा।
संघर्ष समिति ने आगरा के निजी फ्रेेन्चाईजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानपुर और आगरा के फ्रेन्चाईजीकरण का निर्णय एक साथ मई 2009 में किया गया था। बिजली कर्मचारियों के विरोध के चलते कानपुर की बिजली व्यवस्था निजी फ्रेन्चाईजी टोरेन्ट को नहीं सौंपी जा सकी जबकि आगरा की बिजली व्यवस्था 01 अप्रैल 2010 को टोरेन्ट को सौंप दी गयी थी। आज हालात यह हैं कि टोरेन्ट कम्पनी आगरा में पावर कारपोरेशन से बिजली खरीद रही है और पावर कारपोरेशन को लगभग 3.25 रूपये प्रति यूनिट भुगतान कर रही है जबकि कानपुर में पावर कारपोरेशन को लगभग 6.25 रूपये प्रति यूनिट राजस्व मिल रहा है। इससे स्पष्ट है कि आगरा में निजीकरण से पावर कारपोरेशन को भारी नुकसान हो रहा है। ऐसे में आगरा का उदाहरण देकर प्रदेश के अन्य 05 शहरों का निजीकरण किये जाने का निर्णय पूरी तरह गलत है और जनहित में नहीं है। समिति ने यह भी कहा कि 07 अन्य जनपदों रायबरेली, मऊ, बलिया, कन्नौज, इटावा, उरई और सहारनपुर के निजीकरण के फैसले भी तत्काल वापस लिये जाने चाहिए। संघर्ष समिति का अन्दोलन इन सभी जनपदों एवं पांचों शहरों के निजीकरण के निर्णय की वापसी तक चलता रहेगा।
संघर्ष समिति की आज यहां हुई बैठक में समिति के प्रमुख पदाधिकारी शैलेन्द्र दुबे, राजीव सिंह, गिरीश पाण्डेय, सदरूदद्ीन राना, विपिन प्रकाश वर्मा, सुहैल आबिद, राजेन्द्र घिल्डियाल, परशुराम, पी एन राय, पूसे लाल, ए के श्रीवास्तव, महेन्द्र राय, शशिकान्त श्रीवास्तव, करतार प्रसाद, के एस रावत, पी एन तिवारी, आर एस वर्मा, रामनाथ यादव, पवन श्रीवास्तव, शम्भू रत्न दीक्षित, कुलेन्द्र प्रताप सिंह, मो इलियास मुख्यतया उपस्थित थे।
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