करछना बिजली परियोजना के निजीकरण और लिखित समझौते का पालन न होने से बिजली कर्मचारियों में गुस्सा


 

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: 21 मई तक द्विपक्षीय वार्ता द्वारा समस्याओं का समाधान न हुआ तो आन्दोलन होगा:

lucknow | विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति उप्र ने प्रदेश सरकार द्वारा 05 अप्रैल, 2018 के लिखित समझौते का उल्लंघन करते हुए, करछना बिजली परियोजना व पारेषण के कई उपकेन्द्रों व लाइनों को निजी क्षेत्र को सौंपने और समझौते के अनुसार द्विपक्षीय वार्ता द्वारा समस्याओं का समाधान करने हेतु कोई पहल न किये जाने पर रोष प्रकट करते हुए, चेतावनी दी है कि यदि 21 मई तक निजीकरण के फैसले वापस न हुए और द्विपक्षीय वार्ता द्वारा कर्मचारियों की न्यायोचित समस्याओं का समाधान न किया गया तो प्रदेश के सभी ऊर्जा निगमों के तमाम कर्मचारी व अभियन्ता आन्दोलन प्रारम्भ करने हेतु बाध्य होगें।

संघर्ष समिति की आज हुई बैठक में 05 अप्रैल, 2018 और पूर्व में किये गये समझौते का पालन न किये जाने पर गहरा रोष प्रकट किया गया। समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि 05 अप्रैल के समझौते में स्पष्ट तौर पर लिखा गया था कि उत्तर प्रदेश में कहीं भी निजीकरण की कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी, किन्तु समझौते का उल्लंघन करते हुए प्रदेश सरकार ने 1320मे0वा0 क्षमता की करछना ताप बिजली परियोजना को विद्युत उत्पादन निगम से छीनकर निजी क्षेत्र को सौंपने का निर्णय लिया। इसी प्रकार पारेषण में 400के0वी0 और 220के0वी0 के कई विद्युत उपकेन्द्रों और लाइनों का कार्य पावर कारपोरेशन से लेकर निजी घरानों को सौंपा जा रहा है। समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि निजीकरण की कार्यवाही समझौता का सरासर उल्लंघन है और बिजली कर्मचारियों के साथ विश्वासघात है।

समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि 05 अप्रैल के समझौते में लिखा गया था कि द्विपक्षीय वार्ता द्वारा कर्मचारियों की अन्य समस्याओं का शीघ्र ही समाधान किया जायेगा। अत्यन्त दुर्भाग्य का विषय है कि कर्मचारियों के वेतन एवं समयबद्ध वेतनमान की विसंगतियों के मामले, भत्तों के पुनरीक्षण, 2000 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों को पेंशन देने और संविदा कर्मचारियों को सीधा भुगतान किये जाने हेतु कोई भी सार्थक कार्यवाही नहीं की जा रही है, जिससे कर्मचारियों में बहुत रोष है।

संघर्ष समिति ने उ0प्र0 सरकार और प्रबन्धन को 10 दिन का समय देते हुए कहा कि यदि 10 दिन में समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो बिजली कर्मचारियों व अभियन्ताओं को पुनः आन्दोलन करने को बाध्य होना पड़ेगा।

संघर्ष समिति की बैठक में शैलेन्द्र दुबे, राजीव सिंह, गिरीश पाण्डेय, सदरूदद्ीन राना, सुहैल आबिद, महेन्द्र राय, विजय त्रिपाठी, विपिन प्रकाश वर्मा, राजेन्द्र घिल्डियाल, परशुराम, शशिकान्त श्रीवास्तव, मो इलियास, कुलेन्द्र प्रताप सिंह, अशोक कुमार बारी, करतार प्रसाद, के एस रावत, पी एन तिवारी, आर एस वर्मा, डीके मिश्रा, पवन श्रीवास्तव, शम्भू रत्न दीक्षित मुख्यतया उपस्थित थे।


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