
महाविद्यालयों में नियुक्त शिक्षको के सापेक्ष शिक्षक-छात्र अनुपात में किया जाय प्रवेश,को दरकिनार कर शिक्षक विहीन महाविद्यालयों में जारी है प्रवेश !!
लखनऊ | मामला डां.राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से ही जुड़ा है। जहाँ हाईकोर्ट लखनऊ बेंच में दायर रिट याचिका संख्या 729/2012 डां.सुरेश कुमार पाण्डेय वनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य के प्रकरण में दिये गये दिनांक 01.03.2013 के आदेश के पैरा 53 एवं 56 के अन्तर्गत स्पष्ट रुप से मा.हाईकोर्ट द्वारा आदेशित किया गया है कि : “महाविद्यालय में नियुक्त शिक्षको के सापेक्ष निर्धारित शिक्षक-छात्र अनुपात में ही प्रवेश लिया जाय। यह आदेश मात्र रिस्पांडेण्ट कालेज (साकेत महाविद्यालय अयोध्या फैजाबाद) पर ही नहीं लागू होगा, बल्कि प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों व एडेड नान एडेड कालेजो में अनुपालित किया जाय”।
मा.हाईकोर्ट के उपरोक्त आदेश के बावजूद आज मात्र अवध विश्वविद्यालय ही नहीं, प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों द्वारा उक्त आदेश को दरकिनार कर नियुक्त शिक्षक के सापेक्ष कौन कहे, शिक्षक विहीन महाविद्यालयों में पंजीकृत हजारों छात्रो का परीक्षा परिणाम व अंक पत्र धड़ल्ले से मार्च 2013 से ही विश्वविद्यालय प्रशासन के आशीर्वाद व प्रबन्धतंत्र के धनबल व रसूख के आधार पर बादस्तूर निर्बाध गति से जारी किया जा रहा है।
मा.हाईकोर्ट लखनऊ बेंच के दिनांक 01.03.2013 के आदेश, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित मानदण्ड एवं विश्वविद्यालय नियमावली के अनुसार स्नातक स्तर पर महाविद्यालय में नियुक्त शिक्षको के सापेक्ष प्रायोगिक विषयों में प्रति शिक्षक पर 60 छात्र एवं सैद्धांतिक विषयों में प्रति शिक्षक पर 80 छात्र एवं परास्नातक स्तर पर प्रायोगिक विषयों में प्रति शिक्षक 40 एवं सैद्धांतिक विषयों में प्रति शिक्षक 60 छात्रो का ही प्रवेश लिया जा सकता है। विशेष परिस्थिति में परास्नातक स्तर पर राजाज्ञा द्वारा अधिकतम 25% की सीट वृद्धि की जा सकती है।
उक्त आदेश के ही अनुपालन हेतु तत्कालीन राज्यपाल द्वारा जारी राजाज्ञा पर प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा एवं निदेशक उच्च शिक्षा इलाहाबाद द्वारा आदेश भी जारी किया गया था,फिर भी आज प्रदेश भर में हजारों प्राचार्य व शिक्षक विहीन महाविद्यालयों में कुलपतियों के आशीर्वाद व विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रश्रय से बिना मानक के ही प्रवेश प्रक्रिया निरन्तर जारी है।
किन्तु यह कितना हास्यास्पद हैकि हाईकोर्ट का आदेश ही जिस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालय के सन्दर्भ में दिया गया है, उसी विश्वविद्यालय में आज 05 वर्ष बाद भी सैकड़ों प्राचार्य व शिक्षक विहीन महाविद्यालयों में लाखो छात्रो की बकायदा विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा सम्पन्न करवा कर उच्च शिक्षा गुणवत्ता के विकासशील आसमान में अपना सितारा चमकाया जा रहा है। वैसे अवध विश्वविद्यालय से यह विशेष अपेक्षा थी कि प्रकरण विश्वसनीय परिक्षेत्र के सबसे बड़े व प्रतिष्ठ कालेज से जुड़े होने के नाते मा.हाईकोर्ट का आदेश अवध विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में अवश्य अनुपालित होगा,लेकिन काश ऐसा हुआ होता !!!
आज प्रदेश के सभी विश्वविद्यालय के कुलपतियों व विश्वविद्यालय प्रशासन की आंख पर महाविद्यालय प्रबन्धनों द्वारा गुलाबी रंग की ऐसी पट्टी बांध दी गयी हैकि उसके आगे नियम कानून व मा.हाईकोर्ट का आदेश भी बेमानी साबित हो रहा है।
यह स्थिति किसी एक ही विश्वविद्यालय विशेष की ही नहीं है,बल्कि प्रदेश के सभी विश्वविद्यालय अपनी आंखो पर गुलाबी रंग की पट्टी बांध कर महाविद्यालय प्रबन्धन के धन बल व रसूख के द्वारा प्रदत्त धनलाभ की लिप्सा में नियम कानून को ताख पर रख कर भ्रष्टाचार की बैतरणी में गोता लगा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सम्बन्धित गोरखपुर विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा मंत्री डां.दिनेश शर्मा से सम्बन्धित लखनऊ विश्वविद्यालय, उप मुख्य मंत्री केशव प्रसाद मौर्या से सम्बन्धित इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय एवं प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्या पीठ में ही जब केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर एवं महामहिम राज्यपाल उत्तर के आदेशो को दरकिनार कर अभी तक न तो स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के अनुमोदित शिक्षको का भौतिक सत्यापन हो सका और न ही डाटा आंनलाइन ही किया जा सका, तो हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन तो दूर की बात है।
यहीं स्थिति शिक्षक अनुमोदन फर्जीवाड़े के खूलासे का आधार बने आगरा विश्वविद्यालय, कानपुर विश्वविद्यालय एवं अवध विश्वविद्यालय व मेरठ विश्वविद्यालय द्वारा जिन महाविद्यालय में से हजारों फर्जी अनुमोदित शिक्षको का अनुमोदन निरस्त किया गया है, क्या मात्र तीन महीने में ही ऐसे महाविद्यालयों शिक्षक की पर्याप्तता हो गयी ? यदि नहीं तो फिर ऐसे महाविद्यालयों में सत्र 2018-19 में प्रवेश कैसे हो रहा है ? इसका जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं है !!!
यह तो मात्र बानगी भर है,बाकी प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय कुलपति,विश्वविद्यालय प्रशासन, अनुमोदन सम्बद्ध न पैनल में शामिल स्थायी शिक्षको एवं महाविद्यालय प्रबन्धनों के गुलाबी रंग के तथाकथित गठबंधन से नियम कानून व हाईकोर्ट के आदेश की धज्जियां निरन्तर उड़ायी जा रही है।
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