यमुना प्राधिकरण अपने उद्यमियों को दस वर्ष बाद भी भूखंडों पर कब्जा नहीं दे सका


यमुना प्राधिकरण के सीईओ डा, अरूणवीर सिंह चौथी बार सेवा विस्तार पा कर जमें हुए हैं पर वह और उनके अधिकारियों की टीम भष्टाचार, गड़बड़ियों और आम जनता व उद्यमियों को राहत और सुविधाएं सही ढंग से नहीं दें पा रही हैं

मुख्यमंत्री योगी और सरकार की हाई-फाई योजनाओं को विस्तार देने में लगा यमुना प्राधिकरण अपने आंबटियों की शिकायतों को दूर नहीं कर पा रहा है

लखनऊ। जेवर एयरपोर्ट, पाड टैक्सी , सहित बड़े कामों के चक्कर में यमुना प्राधिकरण अपने आंबटियों और उद्यमियों को दस वर्ष बीत जाने के बाद भी भूखंडों पर कब्जा नहीं दे सका है । यमुना प्राधिकरण के सीईओ डा, अरूणवीर सिंह चौथी बार सेवा विस्तार पा कर जमें हुए हैं पर वह और उनके अधिकारियों की टीम भष्टाचार, गड़बड़ियों और आम जनता व उद्यमियों को राहत और सुविधाएं सही ढंग से नहीं दें पा रही हैं।

मुख्यमंत्री योगी और सरकार की हाई-फाई योजनाओं को विस्तार देने में लगा यमुना प्राधिकरण अपने आंबटियों की शिकायतों को दूर नहीं कर पा रहा है ।यमुना एक्सप्रेसवे एंटरप्रिन्योर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ऋषभ निगम ने मुख्य कार्यपालक अधिकारी को एक पत्र लिखा है। ऋषभ का कहना है कि उद्यमियों को प्लॉट्स मिले हुए 10 साल बीत गए हैं लेकिन अब तक कब्जा नहीं मिला है। कब मिलेगा? यह भी पता नहीं है। कई आवंटी कोविड-19 महामारी में मर गए हैं। कई उद्योग अब तकनीकी तौर पर गैरजरूरी हो गए हैं। कुछ लोगों ने परेशान होकर हरियाणा, राजस्थान या हिमाचल में उद्योग लगा लिए हैं। अब एसोसिएशन ने यमुना अथॉरिटी के बोर्ड से पांच राहत मांगी हैं। यह मसौदा बोर्ड सदस्यों को भेजा है। आपको बता दें कि यमुना अथॉरिटी की बोर्ड बैठक होने वाली है, उसके लिए तैयारी चल रही हैं।


उन्होंने कहा, “प्राधिकरण ने सेक्टर-32 और सेक्टर-33 में औद्योगिक भूखंडों का आवंटन करने के लिए वर्ष 2013 में आवेदन आमंत्रित किए थे और अब तक प्राधिकरण ने औद्योगिक भूखंडों का कब्जा नहीं दिया है। पिछले 10 वर्षों में आवंटियों की स्थिति में कई नकारात्मक बदलाव आए हैं। मसलन, कुछ परियोजनाएं अब व्यवहार्य नहीं हैं, क्योंकि लागत में बदलाव आ गया है। बाजार की मांग वैकल्पिक उत्पादों की ओर चली गई है। पिछले 10 वर्षों मे प्रौद्योगिकी में परिवर्तन के कारण कुछ परियोजनाएं अप्रचलित हो गई हैं। पिछले 10 वर्षों में प्राधिकरण आवंटियों को भूखंड पर कब्जा प्रदान करने में असमर्थ इसलिए आवंटियों ने वैकल्पिक स्थान पर अपनी औद्योगिक इकाइयां पहले ही स्थापित कर ली हैं।

ऋषभ निगम का आगे कहना है, “पिछले 10 वर्षों में कुछ आवंटियों की मृत्यु हो गई है और आवंटियों के परिवार के अन्य सदस्य औद्योगिक इकाई स्थापित करने में असमर्थ हैं। हर आवंटी की आयु में 10 वर्ष की वृद्धि होने से कार्य क्षमता में परिवर्तन आया है और अब वह ऐसी आयु व स्थिति पर पहुंच गया है, जहां औद्योगिक स्थापित करना असम्भव हो गया है। इन तथ्यों के आलोक में हमने यमुना अथॉरिटी के बोर्ड से इकाइयों को चालू किए बिना औद्योगिक भूखंडों के हस्तांतरण की अनुमति देने का अनुरोध किया है। वर्तमान में आवासीय भूखंडों के हस्तांतरण की अनुमति बिना कब्जा लिए आवंटी दी जाती है। हमने पूर्णता प्रमाण पत्र, व्यावसायिक प्रमाण पत्र, पार्टनरशिप टू प्राइवेट लिमिटेड और प्रोपराइटरशिप टू पार्टनरशिप आदि से जुड़े नियमों में बदलाव की प्रक्रिया को सरल बनाने का भी अनुरोध किया है। क्योंकि पिछले 10 वर्षों में कराधान और नियामक नीतियों में बदलाव हुआ है|

ऋषभ का कहना है, “सभी जानते हैं कि छोटी उत्पादन इकाइयों में सभी व्यावसायिक मामलों का प्रबंधन परिवार के सदस्यों करते हैं। लेकिन पिछले वर्षों में COVID-19 ने सभी को प्रभावित किया है, जिससे आवंटी के परिवार के कुछ सदस्यों की मृत्यु हो गई है। जिससे व्यवसाय की संरचना को बदल दिया है। और अब वे एक औद्योगिकस्थापित करने में असमर्थ हैं। इसलिए हमने शेयरहोल्डिंग रेशियो में बदलाव का भी अनुरोध किया है। इससे आवंटी अपने परिवार के सदस्यों के बीच बंटवारा और साझेदारी तय कर सकें। इसके साथ ही हमने सब्सिडी दरों पर औद्योगिक भूखंडों के आवंटियों को आवासीय भूखंडों का आवंटन करने का अनुरोध किया है, क्योंकि यह क्योंकि यह नोएडा की अपनाई गई पुरानी नीति है। ग्रेटर नोएडा और यमुना अथॉरिटी की वर्तमान नीति के अनुसार वर्तमान केवल फंक्शनल इण्डस्ट्री के आवंटियों को यह लाभ मिलता है। हम तो अपने उद्योगों को क्रियाशील बनाने में असमर्थ हैं, क्योंकि प्राधिकरण हमें हमारी जमीन देने में विफल रहा है। हमने पहले 10 वर्षों लीज रेंट माफ करने का भी अनुरोध किया है और कब्जा देने में हुई देरी के लिए मुआवजा मांगा है।”


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