राहुल बोले, RBI जैसे संस्थानों की स्वायत्तता को चोट पहुंचा रहे हैं मोदी


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ऋषिकेश : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारतीय रिजर्व बैंक जैसे संस्थानों की स्वायत्तता को चोट पहुंचाने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज दावा किया कि केंद्रीय बैंक के गवर्नर को भी नोटबंदी पर उनके निर्णय के बारे में सिर्फ एक दिन पहले ही सूचित किया गया. राहुल ने यहां एक रैली में कहा, ‘भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना ऐसे संस्थान के रुप में की गयी थी जो सभी राजनीतिक दवाब से मुक्त रहकर स्वंत्रत काम करता था. हालांकि, नोटबंदी से सिर्फ एक दिन पहले उसके गवर्नर को एक पत्र लिखकर यह बताया जाता है कि मोदीजी ने 500 और 1000 रुपये के नोटों को वापस लेने का निर्णय ले लिया है.’

कामकाज के निरंकुश तरीके के लिये मोदी की आलोचना करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष ने आरोप लगाया कि वह सब चीजों पर अपने चेहरे को थोपना चाहते हैं. खादी और ग्रामोद्योग आयोग की डायरियों में महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री की चरखा चलाते आयी तस्वीर का जिक्र करते हुए राहुल ने कटाक्ष किया कि अगर चीजें ऐसे ही चलती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब देश में रामलीलाओं में अभिनेता भगवान राम की बजाय मोदी के मुखौटे पहनकर अभिनय करेंगे. उन्होंने कहा, ‘अगर चीजें ऐसे ही चलती रहीं तो अगले साल से आप को रामलीलाओं में भी भगवान राम की जगह मोदी के मुखौटे पहने अभिनेता नजर आयेंगे.

कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि मोदीजी केवल एक व्यक्ति का शासन चाहते हैं. वह अपनी आवाज में सबकी आवाज को दबाना चाहते हैं.’ मोदी के खादी के प्रति प्रेम को फर्जी बताते हुए राहुल ने कहा कि 15 लाख रुपये का सूट और चरखा एक साथ नहीं चल सकते. चरखे को कुटीर और हथकरघा उद्योग को बढावा देने वाला बताते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर मोदी की खादी के लिये प्रतिबद्वता असली होती तो वह चुनिंदा 50 उद्योगपतियों के लिये दिन-रात काम नहीं कर रहे होते.

कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि मोदी अक्सर फोटो में अमीरों के साथ खड़े दिखायी देते हैं और इससे पता चलता है कि किसान और गरीब उनके एजेंडा में नहीं आते. उन्होंने कहा कि मोदी किसी की भी न सुनने की नीति अपनाते हुए देश पर खुद को थोप रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया, ‘उनका दृष्टिकोण यह है कि चाहे जो हो जाये किसी भी कीमत पर अपनी मनमर्जी से ही काम करना है. उद्योगपतियों की उद्देश्यपूर्ति के लिये वह भूमि अधिग्रहण कानून बदल देते हैं. यहां तक कि वह बिना किसानों को विश्वास में लिये उनकी जमीन भी छीन सकते हैं और उसे अपने उद्योगपति मित्रों में बांट सकते हैं.’


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