करछना बिजली परियोजना निजीकरण – बड़े घोटाले की तैयारी तो नहीं ?


 

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करछना बिजली परियोजना को उत्पादन निगम से लेकर निजी क्षेत्र को सौंपने के निर्णय का विरोध

लखनऊ। विद्युत् कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति , उप्र ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1320 मेगावॉट क्षमता की इलाहाबाद जिले की करछना तापीय परियोजना को उप्र राज्य विद्युत् उत्पादन निगम से वापस लेकर बिडिंग के जरिये निजी क्षेत्र को सौंपने के कैबिनेट के निर्णय का विरोध करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है। संघर्ष समिति की शंका है कि ऐसा करके बड़े घोटाले की तैयारी की जा रही है।

विद्युत् कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति , उप्र के प्रमुख पदाधिकारियों शैलेन्द्र दुबे , राजीव सिंह , गिरीश पाण्डेय , सदरुद्दीन राना ,बिपिन प्रकाश वर्मा , सुहेल आबिद , राजेंद्र घिल्डियाल ,महेंद्र राय ,शशि कांत श्रीवास्तव ,करतार प्रसाद ,पी एन तिवारी ,शम्भू रत्न दीक्षित ,पी एन राय , पूसे लाल ,ए के श्रीवास्तव ,आर एस वर्मा ,डी के मिश्र ने आज यहाँ जारी बयान में कहा कि निजी क्षेत्र से महंगी बिजली मिलेगी जिसका भार आम जनता पर ही डाला जायेगा जो जनहित में नहीं है अतः सरकार को निजीकरण के निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।संघर्ष समिति ने कहा की परियोजना के निजीकरण का निर्णय संघर्ष समिति और प्रमुख सचिव ऊर्जा के मध्य विगत 05 अप्रैल को हुए लिखित समझौते का उल्लंघन है । यह समझौता ऊर्जा मंत्री श्री श्रीकांत शर्मा जी की उपस्थिति में हुआ था जिसमे लिखा है कि कर्मचारियों की सहमति के बिना उत्तर प्रदेश में किसी भी स्थान पर कोई निजीकरण नहीं किया जायेगा।
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने ऊर्जा विभाग के आला अधिकारियों पर आरोप लगाया है कि करछना प्लान्ट के मामले में उन्होंने प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और मुख्यमंत्री को गुमराह किया है ।

समिति ने कहा कि ऊर्जा मंत्री श्री श्रीकांत शर्मा का यह बयान कि, सरकारी क्षेत्र की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक बिडिंग से सस्ती बिजली मिलती है सत्य नहीं है और करछना के मामले में ही सत्य इसके विपरीत रहा है । उन्होंने कहा कि करछना परियोजना के लिए सबसे पहले अप्रैल 2008 में बिडिंग हुई थी जिसमे न्यूनतम रेट रु 02 . 83 प्रति यूनिट आया था जिसे सरकार ने बाजार मूल्य से अधिक माना और बिडर्स से दुबारा रेट देने को कहा । जून 2008 में दुबारा आने वाले रेट में न्यूनतम रु 02 . 60 प्रति यूनिट आया किन्तु इसे भी बाजार मूल्य से अधिक मानकर टेंडर निरस्त कर दिया गया द्य इसके बाद नया टेंडर किया गया जिसमे न्यूनतम रेट मेसर्स जय प्रकाश पावर के आये जो रू 03 . 05 प्रति यूनिट थे जिसे सरकार ने सही मान कर मार्च 2009 में परियोजना का कार्य मेसर्स जय प्रकाश पावर को सौंप दिया ।

इस प्रकार अपनी पसंद की निजी कंपनी को टेंडर देने के लिए बिडिंग का ड्रामा कर बिडिंग में ही आयी रु 02 . 60 प्रति यूनिट की दरों को ठुकराकर रू 03 . 05 प्रति यूनिट की दर पर करार कर बड़ा घोटाला किया गया। इस घोटाले पर सी ए जी ने सवाल खड़ा करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 45 पैसे प्रति यूनिट अधिक मूल्य पर मेसर्स जय प्रकाश पावर को प्लांट देकर सरकार ने निजी कंपनी को प्लांट की कुल कीमत से अधिक का बेजा मुनाफा दिया है। समिति ने कहा कि प्रदेश सरकार यह भी बताये कि सी ए जी की रिपोर्ट पर क्या कार्यवाही हुई है और अभी तक निजी कंपनी को ब्लैक लिस्ट क्यों नहीं किया गया ?

समिति ने कहा कि निजी कंपनी का करार रद्द कर पिछली सरकार ने करछना प्लांट उप्र राज्य विद्युत् उत्पादन निगम को सौंप दिया था फिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां बनी कि अब इस प्लांट को पुनः निजी क्षेत्र को दिया जा रहा है। लोगों को आशंका है कि कहीं एक बार फिर 2008 जैसे मेगा घोटाले की तैयारी तो नहीं हो रही है ? समिति ने कहा कि उत्पादन निगम को यह परियोजना 2008 में दी गयी होती तो 2012 में पूरी हो गयी होती द्य अभी भी उत्पादन निगम कार्य कर रहा था और चार साल में परियोजना पूरी हो जाती किन्तु अब बिडिंग की प्रक्रिया में ही एक साल से अधिक लग जाएगा और परियोजना कब पूरी होगी कोई कह नहीं सकता।संघर्ष समिति ने कहा है कि यदि निजीकरण का निर्णय वापस न लिया गया तो समिति आंदोलनात्मक कदम उठाने हेतु बाध्य होगी जिसकी साड़ी जिम्मेदारी सरकार और प्रबंधन की होगी जो 05 अप्रैल के समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं और निजीकरण के नाम पर आम जनता से धोखा कर रहे है।


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