अनिश्चय, अनियमितता , भ्रष्टाचार एवं फर्जीवाड़े में आकंठ डूबी उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा !!!


 

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उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय राजनैतिक संरक्षण व प्रशासन की उदासीनता से भ्रष्टाचार के बाजार बन चुके हैं

लखनऊ|  यह कितना बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद हैकि आम जनमानस की निगाह में उच्च शिक्षा और विद्या के सबसे बड़े आस्था व विकास का केन्द्र माने जाने वाले उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय सरस्वती की उन्नयन व विकास के नाम पर सरकार की उदासीनता व तुष्टिकरण के कारण अनियमितता भ्रष्टाचार शोषण उत्पीड़न एवं फर्जावाड़े के सबसे बड़े आधार बन चुके है। यह किसी से छिपा नहीं हैकि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय राजनैतिक संरक्षण व प्रशासन की उदासीनता से भ्रष्टाचार के बाजार बन चुके हैं,जहाँ छात्रो के तथाकथित भविष्य विकास के नाम पर मात्र पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है। हर तरफ शोषण और उत्पीड़न का ही बोल बाला है।

जो मात्र एक ही सरकार के कार्यकाल की देन नहीं है बल्कि सभी सरकारो के कर्णधारो ने अपने स्वलाभ व स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रदेश की उच्च शिक्षा का बेड़ा गर्त ही किया है, और होगा भी क्यों नहीं ? आखिर प्रदेश के 90% अनुदानित एवं स्ववित्तपोषित महाविद्यालय सांसदो मंत्रियों विधायको राजनेताओ और अधिकारियो के ही जो है,जहाँ पर न तो किसी नियम के अनुपालन में विश्वास है और न ही कानून का डर !!!

आखिरकार प्रदेश में भाजपा नीति योगी सरकार के सत्तासीन होने के बाद आम जनमानस में एक विश्वास की आस और उम्मीद जगी थीकि हो सकता है भ्रष्टाचार और अनियमितता पर लम्बी लम्बी फेकने वाली भाजपा सरकार में प्रदेश की उच्च शिक्षा का भ्रष्टाचार अवश्य दूर होगा, लेकिन इस सरकार में भी मात्र सत्ता बदली है भ्रष्टाचार के दस्तूर पुराने पैटर्न पर ही जारी है। और प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री प्रदेश भर में फैले भ्रष्टाचार अनियमितता फर्जीवाड़े की धुरी बन चुके हजारों मानक विहीन, प्राचार्य विहीन एवं शिक्षक विहीन महाविद्यालयों के बल पर आये दिन उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा को आक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज बनाने का सपना दिखा रहे हैं। उस सरकार और सत्ता को शर्म आनी चाहिए जिसके आदेश का अनुपालन स्वयं उसके ही मातहत अधिकारियों द्वारा न किया जाता हो !!! केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय, महामहिम राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री व उच्च शिक्षा मंत्री के दर्जनो आदेश के बावजूद आज तक मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्रियों व उच्च शिक्षा मंत्री के गृह क्षेत्र में ही नाक के नीचे के गोरखपुर लखनऊ एवं इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय द्वारा न तो परिक्षेत्र के स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों व अनुमोदित शिक्षको का व्योरा आंनलाइन किया गया और न ही भौतिक सत्यापन !! तो बाकी विश्वविद्यालय तो भगवान भरोसे ही है।

वैसे तो उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा प्रदेश के 13 राज्य विश्वविद्यालयों (लखनऊ गोरखपुर वाराणसी जौनपुर फैजाबाद आगरा कानपुर मेरठ बरेली झांसी इलाहाबाद सिद्धार्थनगर एवं बलिया) से सम्बद्ध 331 अनुदानित एवं लगभग 150 राजकीय महाविद्यालयों के साथ साथ लगभग 6000 स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के बल पर नित नवीन रिकार्डो के साथ उच्च शिक्षा में चार चांद लगा रहे हैं। यह आखिर उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा का भ्रष्टाचार युक्त विकास नहीं तो और क्या हैकि भ्रष्टाचार को रोकने के जवाबदेह लोग ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए है, चाहे वह उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के गृहक्षेत्र के इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय के सचल दल के द्वारा की गयी रिश्वतख़ोरी में गिरफ्तारी का मामला हो या फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहक्षेत्र गोरखपुर विश्वविद्यालय में पेपर आउट व सामूहिक नकल के रैकेट के खुलासे का हो, सब कुछ सरकार की नाक के नीचे बादस्तूर जारी हैफिर भी सरकार उच्च शिक्षा विकास का गीत गा रही है।

आगरा, मेरठ,फैजाबाद,कानपुर गोरखपुर एवं वाराणसी सहित प्रदेश का कोई भी ऐसा विश्वविद्यालय नहीं है,जिनसे सम्बद्ध महाविद्यालयों में मानक विहीनता प्राचार्य व शिक्षक विहीनता एवं शिक्षक फर्जीवाड़े का खेल न चल रहा हो,लेकिन सब कुछ सत्ता के संरक्षण में कथित रुप से सब कुछ चल रहा है।

लिफाफा लाओ,सम्बद्धता पाओ:-

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयो के कुलपतियों की तो यह नीयति बन गयी है कि मात्र लिफाफे की मोटाई के आधार पर ही महाविद्यालयो की सम्बद्धता रेवड़ी की तरह बांटी जाती है। महाविद्यालय में अवस्थापना सम्बन्धित सुवाधाएं हो या न हो, बस लिफाफा मोटा अवश्य होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इस खेल में मात्र कुलपति ही शामिल रहते है बल्कि इसमें विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर विश्वविद्यालय परिक्षेत्र के जुगाड़ू और लिफाफा लोलुप स्थाई शिक्षक भी शामिल है। जो लोग बिना नियम व मानक की परख किये घर बैठ कर संस्तुति प्रदान करते है।

लिफाफा लाओ, प्राचार्य/शिक्षक ले जाओ :-

यह लिफाफा लोलुप प्रवृत्ति का ही परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय प्रशासन, विश्वविद्यालय परिक्षेत्र के स्थायी शिक्षको और निजी महाविद्यालय प्रबन्धन की मिलीभगत से प्राचार्य शिक्षक अनुमोदन फर्जीवाड़े का खेल चल रहा है। विश्वविद्यालय अभिलेखो के अनुसार तो महाविद्यालयो में कागजी तौर पर प्राचार्य एवं शिक्षक भर पूर मात्रा में मिलते है लेकिन धरातल पर ढूंढने पर भी नहीं मिलते है। लेकिन ताज्जुब इस बात का कि ऐसे प्राचार्य व शिक्षक विहीन महाविद्यालय कुलपतियों के आशीर्वाद से दशको से उच्च शिक्षा के तथाकथित विकास में प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरुप चार चांद लगाते आ रहे हैं।


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