अंधों की सभा में कजरौटे का क्या काम?


sonia manmohanसुशील शुक्ल
यह बात तो बहुत बार कही जा चुकी है कि कांग्रेस पार्टी अपने जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं, लेकिन फिलवक्त उसके सामने बड़ा संकट यह है कि अपने को किस तरह मुट्ठी भर (44 लोकसभा सदस्यों को मुट्ठी भर ही बहा जायेगा) सांसदों के बूते सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में लोकसभा में और जनता की नजरों में प्रासंगिक बनाये रखा जाये। इस संकट से उबरने के लिए उसने सदन की कार्रवाई में व्यवधान डालने और संसदीय कामकाज ठप करने की जो रणनीति अख्तियार की है, उसे न तो उचित कहा जा सकता है और न ही बुद्घिमतापूर्ण। वह रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने के अपने वादे से साफ मुकर रही हैं। क्या कारण है कि यूपीए सरकार के दौर में कांग्रेस विपक्ष -खासकर भाजपा के खैये को लेकर जो शिकायतें किया करती थी, आज खुद वही सब कर रही है?
कहने को कहा जा सकता है कि कांग्रेस विपक्ष में आकर भाजपा को उसी के मुहावरे में जवाब दे रही है, लेकिन विचार करने की बात यह है कि क्या किसी गलती का प्रतिकार करने के लिए खुद गलती करना सही और तर्कसंगत है? महान यूनानी दार्शनिक सुकरात को जब वहां की सत्ता ने सजा-ए-मौत दी, तब सुकरात के शिष्यों ने उस जेल तक, जहां सुकरात कैद थे, एक सुरंग खोद डाली और सुकरात से कहा कि आप निकल चलिए। सुकरात ने कहा यह तो गलत होगा, मैं नहीं चलूंगा। शिष्यों ने तर्क दिया कि चूंकि शासन ने आपको मौत की सजा देकर खुद गलती की है, इसलिए जेल से भाग चलने में कोई हर्ज नहीं हैं। सुकरात ने कहा कि नहीं, यह कुतर्क है। शासन ने गलती की है, परन्तु इससे मुझे गलती करने का अधिकार कैसे मिल जाता है? गलती का प्रतिकार गलती करके नहीं किया जा सकता। सुकरात सिद्घान्त के पक्के थे। वह जेल से भागे नहीं। उन्होंने खुद मांगकर जहर का प्याला पी लिया।
आज राजनीति का जो घात-प्रतिघात वाला माडल प्रचलित है, उसमें सबसे जबर्दस्त घात सिद्घान्त पर ही हुआ है। सुकरात की बात तो दूर की बात है, खुद अपने गांधी भी इस दौर में, जब राजनीति का एकमात्र उद्देश्य सत्ता पर काबिज होना ही रह गया है, अप्रासंगिक हो गये हैं। वह कहा करते थे कि महत्वपूर्ण साध्य नहीं, महत्वपूर्ण होती है उस साध्य को साधने के साधनों की शुचिता।… खैर छोडि़ए इन बातों को। अंधों की सभा में कजरौटा कौन खरीदेंगा?
हम बात कर रहे थे कांग्रेस की संसदीय भूमिका की। माना कि राहुल गांधी पार्र्टी के भीतर अपनी नेतृत्व क्षमता को लेकर उठ रहे सवालों और परे खिसककर प्रियंका के लिए जगह बनाने की सलाहों के चलते भारी दबाव में होंगे, लेकिन यूपीए शासन के कार्यकाल में लोकसभा में शायद ही कभी बोलने वाले राहुल के पास अपनी लीडरशिप को असर्ट करने के लिए क्या अन्य कांग्रेसी सांसदों की नारेबाजी के बीच सदन के वेल में पहुंचकर स्पीकर पर पक्षपात का आरोप मढऩे के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है? आखिर वह कांग्रेस के उपाध्यक्ष हैं। उन पर पार्टी को इस संकट के दौर से उबारने और उसे सही दिशा देने की जिम्मेदारी है। सदन में हंगामे को प्रोत्साहित करके वह पार्टी को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? इस सवाल पर खुद उन्हें, उनकी मां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और अन्य कांग्रेसियों को भी विचार अवश्य करना चाहिए।
यह सही है कि विपक्ष को विरोध करने, आंदोलित होने का अधिकार है, लेकिन केवल विरोध के लिए विरोध करना लोकहित में नहीं कहा जा सकता। सच तो यह है कि कुछ मसलों पर कांग्रेस का विरोध हास्यस्पद प्रतीत होता है। मसलन बीमा (संशोधन) विधेयक को लें, जिसके जरिये बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी किए जाने की बात है। यह तो खुद कांग्रेसनीत यूपीए सरकार करना चाहती थी। अब अगर यह हो रहा है तो कांग्रेस को इसका विरोध करने का क्या नैतिक अधिकार है, विशेषकर तब जब सरकार उसकी बात सुनने और उसकी आपत्तियों (यदि कोई हैं) पर विचार करने को तैयार हो।
एक और मसला जिसको लेकर कांग्रेस का रूख विचित्र लगता हैं, वह है संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में सी सैट का मामला। सी सैट भी यूपीए के कार्यकाल में 2011 में लागू किया गया था। तब सत्तारूढ़ कांग्रेस को उसमें कोई खोट नहीं नजर आयी थी। आज उसके सांसद अंग्रेजी के सबसे बड़े विरोधी और देशी भाषाओं के युग प्रवर्तक चैम्पियन बनने को लालायित दिखलायी पड़ रहे हैं। गुजरे तीन सालों में अभ्यर्थियों ने भी इस पर कोई आपत्ति या आवाज नहीं उठायी थी, अब अचानक क्या हो गय? फिलहाल ऐसा लग रहा है कि आम आदमी पार्टी ने इस मसले को ”हाई जैक” कर लिया है। सवाल यह है कि इस मसले को लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकने से युवकों का कौन स हितसाधन हो रहा है? सवाल यह भी है कि क्या यह कोई इतना बड़ा या महत्वपूर्ण मसला है जिसके लिए संसद में हंगामा किया जाये और जनता की गाढ़ी कमायी का पैसा बरबाद किया जाये? क्या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी इतनी कि कर्तव्य विमूढ़ और नाकारा हो गयी है कि चर्चा के लिए न सही, विरोध के लिए ही सही, कोई सार्थक मुद्दा या मसला सोच नहीं पा रही? मुद्दों की कमी नहीं है। देखने के लिए आंखे चाहिए।
कांग्रेस शायद यह सोचती होगी कि जो काम वह अपने कार्यकाल में करना चाहती थी और कर नहीं सकी, उनको परवान चढ़ाने का श्रेय सत्तारूढ़दल को क्यों लेने दे। लेकिन क्या वह अपने अति आक्रमक रवैये से प्रचंड बहुमत वाली एनडीए सरकार को रोक पायेगी? कांग्रेस के लिए बेहतर तो यही होगा कि वह विरोध के लिए विरोध और अड़ंगेबजी की रणनीति को छोड़कर जनता को यह बताये कि देखिए हम खुद ही यह करना चाहते थे, परन्तु कर नहीं पाये थे। अब हो रहा है तो हम इसके पक्ष में हैं, क्योंकि यह देशहित और लोकहित में है। राहुल गांधी को प्रचलित पैंतरेबाजी का सहारा न लेकर अपनी पार्टी की सोच को इसी दिशा में मोडऩे का काम करना चाहिए ताकि वह रचनात्मक और सार्थक विपक्ष की भूमिका निभा सके। यह लोकहित में तो होगा ही, दीर्घावधि में उनकी पार्टी के हित में भी होगा।


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