मनोज दुबे
अमर सिंह हाथ-पांव डुलायें और राजनीतिक हलकों में हलचल न हो, यह नामुमकिन है। जनेश्वर मिश्र जयंती के मौके पर मंच पर मुलायम से दुर मगर शिवपाल से करीब उनकी मौजूदगी और हवाई अड्डे पर नेताजी के साथ अकेले में हुई तीस मिनट की गुफ्तगू ने सपा में, उम्मीदों के मुताबिक, अटकलों का ज्वार ला दिया है। आजम खां, राम गोपाल यादव, जया बच्चन, नरेश अग्रवाल जैसों के माथे पर बल पड़ गए हैं तो ठाकुर लोग मूद्दों में मुस्करा रहे हैं।
राजनीति की नटवरी नगरी में अमर सिंह का कभी कोई स्थायी पता नहीं रहा। फरवरी 2010 में अपनी एकमात्र स्थायी समर्थक पूर्व फिल्म अदाकारा और सांसद रह चुकी जयप्रदा के साथ पार्टी से बाहर का रास्ता दिखलाये जाने तक एक लंबा वक्त उन्होंने सपा में गुजारा। नेताजी के नाम की माला जपते हुए वहा एक तरह से पार्टी का राष्ट्रीय चेहरा बन गए थे। उन्होंने सिर्फ ठाकुरों को ही पार्टी से नहीं जोड़ा, बल्कि तमाम धन्नासेठों और ग्लैमर की दुनिया की चमकती हस्तियों को भी सपा की दालान में जमा किया था। सपा में वह ‘अमर काल’ ही था जब कल्याण सिंह भीतर आये थे और आजम साहब को वनवास में जाना पड़ा था। मगर समय किसी का सगा नहीं होता, उसने करवट ली और उन्हें वनवास में जाना पड़ा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों में तमाम ऐसे लोग मिलेंगे जो यह मानते हैं कि काश अमर सिंह उस वक्त पार्टी के साथ रहे होते जब भतीजा अखिलेश सपा का चेहरा बदलने की कवायद में लगे थे। भतीजे के गद्दीनशीन होते वक्त अमर सिंह की उपस्थिति अखिलेश के लिए निश्चय ही ज्यादा मददगार साबित हुई होती और उनकी सरकार का चेहरा कुछ दूसरा ही होता।
वनवास के दौर में अमर सिंह ने शारीरिक, मानसिक, राजनीतिक सभी तरह की तमाम मुसीबतें झेली। उन्हें यह अहसास भी शिद्दत से हुआ कि जिनसे वह बफा की उम्मीद लगाये बैठे थे, उन्हें पता ही नहीं था कि वफा होती क्या है। एक नामालूम सी पार्टी भी बनायी, मगर साथ चलने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। लोकसभा चुनाव की दस्तक सुनायी देने लगी तो वह रालोद के घाट लगे, मगर जय प्रदा के साथ वह खुद तो डूबे ही, रालोद भी डूब गयी।
राजनीतिक पार्टियों में अमर सिंह के दोस्तों और जानने वालों की कोई कमी नहीं हैं, लेकिन वक्त की चाल उलटी पड़ रही हो तो लोगों को आंख चुराने में कितनी देर लगती है। अक्टूबर 2014 में राज्य सभा का अपना कार्यकाल समाप्त होता देखकर उन्होंने दरवाजे तो कई खटखटाये, लेकिन माकूल जवाब कहीं से नहीं मिला। जय प्रदा वैसे ही खाली बैठी हैं। ऐसे में मुलायम का लखनवी न्यौता उनके लिए तिनके का सहारा बनकर सामने आया। सपा में इतनी कूवत तो है ही कि उन्हें फिर से राज्य सभा में भेज दे। अपनी कुण्ठा और क्रोध में अमर सिंह मुलायम सिंह यादव के लिए जो कड़वे वचन बोल चुके हैं, उनके मद्देनजर वह पहले जैसे प्रभामंडल की उम्मीद तो शायद नहीं कर सकते, लेकिन उम्मीद की किरण तो दिखलायी ही दे रही है। वैसे भी मुलायम सिंह तपे हुए सियासी खिलाड़ी हैं, दूर तक देखते हैं और राजनीति को संभावनाओं का संसार मानते हैं। शायद इसीलिए उनकी जुबान अमर सिंह के लिए कभी तल्ख नहीं हुई।
ऐसा भी नहीं है कि जरुरत का यह सौदा एक तरफा है। अमर सिंह को अगर अपने लिए एक और चाहिए तो मुलायम सिंह यादव को भी एक ऐसा सक्षम सिपहसालार चाहिए जो अगड़ों-खासकर ठाकुरों-को पार्टी के आंगन में फिर से इकट्ठा कर सके। मुलायम जानते हैं कि ठाकुरों में अमर सिंह की पैठ है। विधान सभा के लिए आसन्न उप चुनावों और 2017 की अगली लड़ार्ई के लिए तमाम ऐसे तबकों को पार्टी से जोडऩे की जरुरत होगी, जो हालिया बीते हुए वक्त में या तो पार्टी से दूर चले गये थे या फिर मुंह बनाये सुस्त पड़े हैं। अमर सिंह में इन हालात को बदलने की काबिलियत है। और यही क्यों, वह और भी तमाम आकस्मिकताओं में ‘सेतु’ की भूमिका बखूबी निभा सकते हैं। मगर लाख टके का सवाल यह है कि नेताजी का अमर प्रेम उनके अपने घर में कितने लोगों को रास आयेगा। जवाब के लिए वक्त की अगली करवट का इंतजार तो करना ही पड़ेगा।
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