बिजली इंजीनियर्स ने दी चेतावनी : संशोधन बिल पारित कराने की एकतरफा कोशिश हुई तो देशव्यापी बिजली हड़ताल


 

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इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 में प्रस्तावित संशोधन आम उपभोक्ता व् कर्मचारी विरोधी : बिजली इंजीनियर फेडरेशन ने केंद्रीय विद्युत् मंत्री को पत्र भेजकर दर्ज कराया विरोध :
lucknow | ऑल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने केंद्र सरकार द्वारा 07 सितम्बर को जारी किये गए इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 में प्रस्तावित संशोधन ड्राफ्ट को आम उपभोक्ता व् कर्मचारी विरोधी करार देते हुए 45 दिन की निर्धारित समय सीमा में अपना लिखित प्रतिवेदन  केंद्रीय विद्युत् मंत्री को भेज दिया है | फेडरेशन ने विद्युत् मंत्री से मांग की है कि आम लोगों को प्रभावित करने वाले इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर फेडरेशन से वार्ता की जाये और जल्दबाजी में बिल को संसद से पारित कराने की एकतरफा कोशिश न की जाए अन्यथा देश भर के तमाम 15 लाख बिजली कर्मचारी और इंजीनियर लाइटनिंग हड़ताल पर जाने को बाध्य होंगे जिसकी सूचना पहले ही केंद्र सरकार को दी जा चुकी है | फेडरेशन ने प्रस्तावित संशोधनों को आम जन विरोधी व् कर्मचारी हितों पर कुठाराघात बताया है | फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित देश के सभी प्रांतों के  मुख्यमंत्रियों से अपील की है कि वे व्यापक जनहित में इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट ) बिल 2018 का पुरजोर विरोध करें |

ऑल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन  के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने आज यहाँ बताया कि  प्रस्तावित संशोधन के जरिये केंद्र सरकार बिजली वितरण व् आपूर्ति को अलग अलग कर बिजली आपूर्ति के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त करने जा रही है और ऐसे प्राविधान किये जा रहे हैं जिससे निजी कंपनियों को बेजा मुनाफा कमाने का मौक़ा मिलेगा और आम लोगों के लिए बिजली महंगी होगी | इतना ही नही तो प्रस्तावित संशोधनों में बिजली के मामले में राज्यों के अधिकार क्षेत्र में कटौती कर केंद्र सरकार का वर्चस्व बढ़ाने के प्राविधान किये जा रहे हैं जबकि बिजली संविधान में समवर्ती सूची में है | टैरिफ पॉलिसी में बडे बदलाव किये  जा रहे है जिससे निजी घरानों को मनमाना मुनाफा कमाने की छूट मिल जाएगी और टैरिफ निर्धारण के मामले में केंद्र व् राज्य के विद्युत् नियामक आयोगों की स्वायत्तता समाप्त हो जाएगी |

केंद्र सरकार को सौंपे गए विरोध प्रतिवेदन में फेडरेशन ने लिखा है कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 के आर्टिकल 62 डी में लिखा है कि उपभोक्ता से चरणबद्ध तर्क सगत तरीके से  बिजली की लागत वसूली जाएगी | प्रस्तावित संशोधन में लिखा गया है कि उपभोक्ता से बिना किसी नुक्सान के बिजली की पूरी लागत वसूली जायेगी | उप्र का ही उदाहरण लिया जाए तो उप्र में बिजली की लागत रु 06. 74 प्रति यूनिट है जबकि किसानों , गरीबी रेखा के नीचे और घरेलू

उपभोक्ताओं को लागत से काफी कम मूल्य पर बिजली मिल रही है | प्रस्तावित संशोधनों के बाद इन सभी से बिजली की पूरी लागत वसूल की जाएगी अर्थात बिजली के  टैरिफ में भारी वृद्धि होगी |

उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 के अनुसार अभी टैरिफ तय करने में केंद्र व् राज्य के नियामक आयोग केंद्र सरकार की टैरिफ पॉलिसी से मार्गदर्शन लेकर टैरिफ तय करते हैं किन्तु प्रस्तावित संशोधनों में साफ़ लिखा है कि केंद्र व् राज्य के नियामक आयोग केंद्र सरकार की टैरिफ पॉलिसी को मानने हेतु बाध्य होंगे | यह स्पष्टतया केंद्र व् राज्य के नियामक आयोगों के कार्य क्षेत्र में दखलंदाजी है और उनकी स्वायत्तता का खुला हनन है |

उन्होंने आगे बताया कि प्रस्तावित संशोधन में क्रास सब्सिडी शनैः शनैः तीन वर्ष पूरी तरह समाप्त कर दी जाएगी जिससे आम उपभोक्ता और किसानों पर बड़ी बिजली दरों का बोझ आएगा | प्रस्तावित संशोधन में यह भी लिखा है कि सभी श्रेणी के उपभोक्ताओं को बिजली की  पूरी लागत का भुगतान करना होगा और यदि सरकार किसी श्रेणी के उपभोक्ता को सब्सिडी देना चाहती है तो सरकार सब्सिडी की धनराशि सीधे उसके बैंक खाते में जमा करे | फेडरेशन ने इसे  पूर्णतया अव्यवहारिक बताते हुए कहा है कि इससे किसानों , गरीबों और आम लोगों पर आफत का बोझ आ पडेगा | फेडरेशन ने कहा है कि सब्सिडी और क्रास सब्सिडी समाप्त करना , बिजली की पूरी लागत वसूल करना आदि यह सब इसलिए किया जा रहा है जिससे  निजी घरानों को कोई नुक्सान न हो क्योंकि बिजली आपूर्ति निजी घरानों को सौंपे जाने की योजना है |

बिल के अनुसार बिजली वितरण और विद्युत् आपूर्ति के लाइसेंस अलग अलग करने तथा एक ही क्षेत्र में कई विद्युत् आपूर्ति कम्पनियाँ बनाने का प्राविधान है | बिल के अनुसार सरकारी कंपनी को सबको बिजली देने (यूनिवर्सल पावर सप्लाई ऑब्लिगेशन ) की अनिवार्यता होगी जबकि निजी कंपनियों पर ऐसा कोई बंधन नहीं होगा | स्वाभाविक है कि निजी आपूर्ति कम्पनियाँ मुनाफे वाले बड़े वाणिज्यिक और औद्योगिक घरानों को बिजली आपूर्ति करेंगी जबकि सरकारी क्षेत्र की बिजली आपूर्ति कंपनी निजी नलकूप , गरीबी रेखा से नीचे के उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करने को विवश होगी | क्रास सब्सिडी समाप्त हो जाने के बाद सरकारी कंपनियों की वित्तीय हालत और खस्ता हो जाएगी | इस प्रकार प्रस्तावित संशोधन के जरिये केंद्र सरकार मुनाफे का निजीकरण और घाटे का सरकारीकरण करने जा रही है जो जनहित में नहीं है |

फेडरेशन ने बिजली उत्पादन के क्षेत्र में स्ट्रेस्ड असेट्स के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है की पूर्व की तरह केंद्रीय विद्युत् प्राधिकरण से क्लियरेंस लेने की अनिवार्यता पुनः की जानी चाहिए |


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