जीएसटी का फायदा गरीबों को मिलेगा, सिर्फ टैक्स चोर हो रहे परेशान: अरुण जेटली


 

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रायपुर. जीएसटी का फायदा गरीबों को मिलेगा. सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में 80 लाख करदाता हैं. वही परेशान हैें जो टैक्स देने से बचना चाहते हैं. सेना के लोग जब मेरे सामने मांगों की सूची रखते हैं तो मैं चुप हो जाता हूं. सोचता हूं कर देने वाले बढ़ें तो कुछ करूं. जीएसटी से छत्तीसगढ़ देश का लॉजिस्टिक हब बन सकता है. जिसे गोदाम बनाना है कि उसके लिए यहां से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती. छत्तीसगढ़ देश का दिल है. यहां से कुछ ही घंटों में कोई ट्रक किसी भी दूसरे राज्य में पहुंच सकता है.

उक्ताशय के विचार देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वाणिज्यिक कर विभाग छत्तीसगढ़ की ओर से आयोजित जीएसटी की कार्यशाला में व्यक्त किए. जेटली ने कहा आजादी के बाद राजनीतिक रूप से तो एक देश बनकर हम, उभरे लेकिन आर्थिक एकता नहीं बनी. देश और राज्यों को मिलाकर कुल 17 तरह के टैक्स थे और उस पर 23 तरह के सेस. इतने सारे टैक्स अदा करने के लिए अलग-अलग अफसर और विभाग. जो व्यवस्था बनाई थी उसके सफल होने की गुंजाइश कम थी. आयकर और कस्टम ड्यूटी को छोड़ दें, बाकी टैक्स रिग्रेसिव (गरीब से वसूले जाने वाले) टैक्स थे. इनकम टैक्स ऐसा है कि अमीर सबसे ज्यादा देगा, मध्यम वर्ग कुछ कम देगा और गरीब नहीं देगा. कस्टम तब लगता था जब देश में समान आया. अब देश के भीतर पैदावार हो. मेक इन इंडिया, मैन्युफैक्चरिंग हो और सेल्स, वैट, सर्विस, लग्जरी, ऑक्ट्राय, इंट्री टैक्स, मार्केट कमेटी के टैक्स लगें तो कैसे चलेगा?

 

जेटली ने कहा कि परोक्ष टैक्स प्रगतिशील नहीं होते. ये गरीब-अमीर में भेदभाव नहीं करते. मैं साबुन खरीदूं या गांव का गरीब आदमी, एक समान टैक्स लगेगा. तीन प्रमुख टैक्स ही लें, वैट, एक्साइज और सर्विस टैक्स. इनको भरने की प्रक्रिया में अलग-अलग अधिकारी और विभाग हैं. उतने ही स्तर हैं. यह सामाजिक सिद्धांत है कि कर देने में जितनी असुविधा होगी, कर देने की प्रवृत्ति कम होगी और भ्रष्टाचार भी होगा. हर राज्य की अलग-अलग दर, नाके आदि से मुद्रास्फीति भी बढ़ती है.

 

जेटली ने कहा-व्यवस्था ऐसी है कि किसी भी सामान पर शुरू से अंत तक हर स्तर पर टैक्स दें और उसका श्रेय भी उपभोक्ता को न मिले. हम आईटी सुपरपावर हैं. जो कर देने की श्रेणी में हैं वे समाज के उच्च वर्ग हैं. साधनहीन को कठिनाई हो सकती है. पर हम कैसे मान लें कि 1 प्रतिशत टैक्स देने वालों को कठिनाई होगी. नई व्यवस्था से सबको लाभ होगा. कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सर्विस और गुड्स दोनों हैं. जैसे रेस्टोरेंट में सामान का पैसा भी लग रहा और सर्विस का भी. दोनों पर अलग-अलग टैक्स संभव नहीं.

उनके अनुसार अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है तो सारे टैक्स एक हो जाएं. कुछ लोगों ने कहा एक या दो स्लैब रख दें. यह सुझाव उन वर्गों से था जो देश की आर्थिक असमानता नहीं समझते. एक दो स्लैब रखते तो कम से कम 15-16 प्रतिशत टैक्स रखना पड़ता तब उतना राजस्व मिल पाता. ऐसे करने पर जिन जरूरी चीजों पर शून्य या 5 फीसदी टैक्स रखा है, उसका फायदा उच्च वर्ग ले जाता. जिन जगहों पर उन्हें ज्यादा टैक्स लग रहा है,वह कम हो जाता. गरीब आदमी को कई जगहों पर ज्यादा देना पड़ता. यह व्यवस्था और रिग्रेसिव हो जाती. इसलिए जीएसटी काउंसिल ने मौजूदा रेट को जोड़कर नजदीकी स्लैब में जोड़ दिया.

 

उन्होंने कहा कि देश में सौ करोड़ मोबाइल फोन हैं. 40 करोड़ स्मार्ट फोन हैं. 80 लाख करदाता तो समाज के सबसे ऊपर के लोग हैं वे इंटरनेट पर अपना नंबर नहीं डाल सकते. हर महीने एक एसएमएस जैसी व्यवस्था का पालन नहीं कर सकते. इंकम टैक्स में 99 प्रतिशत करदाताओं को ऑनलाइन किया गया है. कम्प्यूटर सब तय करता है. एक प्रतिशत केस जो स्क्रूटनी में निकलते हैं, उसे बाद में देखा जाता है. लोगों को पता नहीं कि किस अफसर के पास टैक्स भरा गया. जीएसटी का सॉफ्टवेयर ऐसा है जो 320 करोड़ वाउचर को हर महीने देखेगा. अपने आप यह तय हो जाएगा कि डीलर और डिस्ट्रीब्यूटर का रिटर्न मैच हो रहा या नहीं.


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