
नेतागीरी के कारण उद्योगों के पलायन का सिलसिला जारी
रुद्रपुर। औद्योगिकीकरण के साथ ही तराई में लाल झंडे वालों ने आंदोलन का रास्ता अख्तियार कर लिया, जिससे अन्य श्रमिकों में भी आंदोलन की चिंगारी लग गई। नतीजा यह हुआ कि कुछ फैक्ट्रियों ने तो पलायन कर लिया और कुछ ने अपनी यूनिट अन्यत्र शिफ्ट कर दी। आंदोलन का यह सिलसिला आज तक जारी है, जिस कारण लगातार उद्योग उत्तराखंड का मोह छोड़ रहे हैं। इसका प्रमुख कारण नेतागीरी तो है ही, साथ ही अफसरों की कोताही से भी इंकार नहीं किया जा सकता। श्रमिकों की समस्याओं अथवा उत्पीडऩ के मामलों में प्रशासन तत्परता दिखाता तो शायद आंदोलन की नौबत नहीं आती और न ही फैक्ट्रियां पलायन करती। तराई से यदि उद्योग उजड़ गए तो यहां न फिर वीरानी छा जाएगी, वरन बेरोजगारी की समस्या भी गंभीर हो जाएगी। शासन प्रशासन को समय रहते चेतने की जरूरत है।
तराई में जिस वक्त औद्योगिकीकरण की शुरूवात हुई, उसी समय डाबर फैक्ट्री के आगे आंदोलन की नींव पड़ गई थी। उसके बाद लगातार फैक्ट्रियों में आंदोलन हुए। कई मामलों में समझौते हुए तो कुछ मामलों में फैक्ट्रियां अड़ गई। नेतागीरी के कारण ही तराई से श्रीराम होंडा कंपनी ने नाता तोड़ लिया और हमेशा के लिए वह यहां से चली गई। इसके अलावा सिडकुल में लगी कई फैक्ट्रियों ने भी नेतागीरी और आंदोलनों से मुक्ति पाने के लिए फैक्ट्रियां ही बंद कर दी। करीब एक दर्जन फैक्ट्रियों पलायन कर चुकी हैं। कई फैक्ट्रियां बंदी के कगार पर हैं। हाल में टाटा फैक्ट्री ने टाटा सूमो का प्लांट बंद कर दिया। एक नहीं अनेक ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने अपने कई उत्पादों का उत्पादन ठप कर दिया है और वह सिर्फ नाम के लिए कोई एक प्रोडक्ट बना रही हैं। आंदोलन से आजिज आकर महिंद्रा एंड महिंद्रा भी पलायन के मूड में है, क्योंकि उसके तीनों प्लांटों के श्रमिक लंबे समय से हड़ताल पर हैं। दरअसल, फैक्ट्री प्रबंधन जब जब फैक्ट्री में माहौल खराब करने वाले श्रमिकों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं तो आंदोलन शुरू हो जाते हैं। इसमें जिला प्रशासन एवं श्रम विभाग के अफसरों की जो भूमिका होनी चाहिए, उस भूमिका पर अफसर खरे नहीं उतरते।
ऐसा नहीं है कि फैक्ट्रियों में श्रमिकों का शोषण नहीं होता। कई फैक्ट्रियों में श्रम कानून का खुला उल्लंघन होता है, मगर उसे रोकने के लिए बनाए श्रम विभाग के अधिकारी निजी स्वार्थ के कारण अपनी आंखें मूंदे रहते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषण की चिंगारी आंदोलन के रूप में फूट जाती है। जहां जहां प्रशासनिक अफसरों ने ईमानदारी से हस्तक्षेप करके त्रिपक्षीय वार्ता कराई है, वहां मामले हल भी हुए हैं। सवाल यह है कि श्रमिक असंतोष को पनपने ही क्यों दिया जाता है। समय रहते श्रमिकों की समस्याओं पर श्रम विभाग के अफसर गौर क्यों नहीं करते। आंदोलन को लंबा क्यों खिचने दिया जाता है। व्यवस्था पर अनेक सवाल हैं, जो अनुत्तरित हैं। यदि आंदोलन ऐसे ही होते रहे तो आने वाले वक्त में उत्तराखंड से अन्य फैक्ट्रियां भी पलायन कर जाएंगी। इस ओर न जनप्रतिनिधियों का ध्यान है और न ही सरकार का। यदि फैक्ट्रियां पलायित होती रहीं तो उसका असर यहां के कारोबार पर भी पड़ेगा, साथ ही बेरोजगारी की जो समस्या खड़ी होगी उससे अपराधों में भी बढ़ोत्तरी होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
जरूरत है श्रमिक असंतोष को खत्म करने की। इसके लिए जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरों तक को पहल करनी होगी तथा वार्ता के जरिए ही समस्या का समाधान कराना होगा। अन्यथा विकसित हो रही तराई फिर पिछड़ जाएगी।
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