
उप्र में पदोन्नति में आरक्षण देने की कोशिश हुई तो सीधी कार्यवाही की चेतावनी
lucknow |सर्वजन हिताय संरक्षण समिति, उप्र ने आज गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह को ज्ञापन देकर मांग की कि पदोन्नति में आरक्षण देने हेतु केन्द्र सरकार द्वारा 15 जून 2018 को जारी किये गये आदेश को तत्काल निरस्त किया जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि उप्र सरकार पदोन्नति में आरक्षण देने हेतु कोई नया आदेश जारी न करे अन्यथा प्रदेश के 18 लाख कर्मचारी, अधिकारी व शिक्षक सीधी कार्यवाही करने हेतु मजबूर होगें जिसकी सारी जिम्मेदारी केन्द्र व राज्य सरकार की होगी।
ज्ञापन में कहा गया है कि केन्द्र सरकार ने मा0 सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की गलत व्याख्या करते हुए 15 जून 2018 को आदेश जारी कर सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था कर दी है जिससे देश भर के कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों में भारी रोष व्याप्त है। केन्द्र सरकार द्वारा जारी आदेश से यह ध्वनित होता है कि पदोन्नतियों में आरक्षण देने हेतु एम नागराज मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाई गयी तीन बाध्यकारी शर्तों को शिथिल कर दिया गया है। ध्यान रहे कि 05 जून 2018 को मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि कानून के अनुसार केन्द्र सरकार पदोन्नतियां कर सकती हैं। कानून का तात्पर्य बिलकुल साफ है कि एम नागराज के प्राविधानों के तहत पदोन्नतियां की जायें किन्तु केन्द्र सरकार के आदेश से यह प्रतीत होता है कि एम नागराज के प्राविधानों को नजरअंदाज कर पदोन्नतियों के आदेश जारी कर दिये गये हैं। यह आदेश पूरी तरह असंवैधानिक है और इससे कर्मचारियों में जबरदस्त गुस्सा व्याप्त हो गया है।
ज्ञापन में आगे कहा गया है कि इसके पूर्व भी मा सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को निष्प्रभावी करने हेतु चार बार संविधान संशोधन किये जा चुके हैं। 77वां संविधान संशोधन 17 जून‘1995 को, 81वां संविधान संशोधन 09 जून‘2000 को, 82वां संविधान संशोधन 08 सितम्बर‘2000 को, और 85वां संविधान संशोधन 04 जनवरी‘2002 को किया गया। इस प्रकार विगत में किये गये चार संविधान संशोधन में से तीन संविधान संशोधन एन0डी0ए0 सरकार द्वारा किये गये हैं। इन सभी संविधान संशोधनों के जरिये मा0 सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को निष्प्रभावी किया गया है। पांचवीं बार राज्यसभा में किये गये 117वें संविधान संशोधन से देश भर के सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के 78 प्रतिशत कर्मचारियों-अधिकारियों-शिक्षकों व समाज के बड़े हिस्से में पहले से ही भारी आक्रोश व्याप्त है। केन्द्रीय मंत्री श्री पासवान द्वारा दिये गये वक्तव्य से कार्मिकों और शिक्षकों का गुस्सा और बढ़ गया है। पदोन्नति में आरक्षण व परिणामी ज्येष्ठता के कारण अनुसूचित जाति/जनजाति के 20-25 साल कनिष्ठ कार्मिक अपने से वरिष्ठ सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के कार्मिकों के बाॅस व सुपरबाॅस बन जाते हैं जिससे सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के 78 प्रतिशत कार्मिकों के पदोन्नति के अवसर समाप्त हो जाते हैं, उनमें भारी कुण्ठा उत्पन्न होती है और उनकी तथा विभाग की कार्यक्षमता पर भारी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
समिति के पदाधिकारियों ने गृहमंत्री से कहा कि सामाजिक न्याय के नाम पर पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने से अनुसूचित जाति/जनजाति के 20-25 साल कनिष्ठ कार्मिक अपने से 20-25 साल वरिष्ठ सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के कार्मिकों के बाॅस व सुपरबाॅस बन रहे हैं जो सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के लिये रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन साबित हो रहा है। यह व्यवस्था सरासर अन्यायपूर्ण है। 117वां संविधान संशोधन 17 जून‘1995 अर्थात लगभग 19 वर्ष पूर्व से लागू होगा। इसका अर्थ यह है कि 19 वर्ष पूर्व से देश के कई करोड़ कर्मचारियों, अधिकारियों व शिक्षकों की वरिष्ठता सूची बदली जायेगी। जूनियर कर्मचारी व शिक्षक सीनियर बनाये जायेंगे। इस प्रक्रिया से न केवल सामाजिक समरसता बिगड़ेगी, आपसी मुटाव बढ़ेगा, अपितु व्यापक प्रशासनिक अराजकता व्याप्त हो जायेगी जो राष्ट्रहित में नहीं है।
सर्वजन हिताय संरक्षण समिति, उप्र के प्रतिनिधि मण्डल में शैलेन्द्र दुबे, ए ए फारूकी, एच एन पाण्डेय, राजीव सिंह, एस एस निरंजन, देवेन्द्र द्विवेदी, राजीव श्रीवास्तव, अजय तिवारी, रीना त्रिपाठी, आर के पाण्डेय, प्रेमा जोशी, राम प्रकाश, पवन सिंह, अजय सिंह, आरती प्रसाद सिंह, अजय द्विवेदी, शिव प्रकाश दीक्षित, ओ पी सिंह मुख्तया उपस्थित थे।
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