
मुख्य अभियन्ता स्तर कई अधिकारी है जो खाली घर बैठे हैं
लखनऊ । लोक निर्माण विभाग में विकास की रफ्तार आज कल कुछ धीमी है क्यों कि मुख्य अभियन्ता स्तर के दो पद खाली चल रहे हैं , अभियंता होने के बाद भी इन पदों पर पिछले तीन माह से तैनाती नहीं की जा रही है । यह तैनाती अब तक क्यों नहीं की गई है इस पर पूरे विभाग में तरह तरह की चर्चाएं हैं ।
यूपी के सीएम योगी का पूरा जोर विकास की रफ्तार तेज करने पर है जिससे की प्रदेश का विकास तेज गति से हो और आमजनता को सरकार और सरकारी सुविधाओं का पूरा फायदा मिल सके । इसके लिए उनके और मुख्य सचिव के निर्देश भी है कि खाली पदों को तुरंत भरा जाये और प्रमोशन भी किये जाये लेकिन लोक निर्माण विभाग में केवल कुछ अधिकारियों की वजह से सीएम का यह आदेश पूरी तरह से अमल में नहीं लाया जा रहा है ।
प्रदेश की सड़कों को बनाने की जिम्मेदारी लोकनिर्माण विभाग के पास है पिछले तीन माह से मुख्यालय पर मुख्य अभियन्ता – मुख्यालय एक, और मुख्य अभियन्ता, परिवाद का पद खाली चल रहा है । यह विभाग के महत्वपूर्ण पद है ।मुख्य अभियन्ता विश्व बैंक के पद पर तैनात जे के श्रीवास्तव को पिछले दिनों सेतु निगम के एमडी का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है । सेतु निगम अपने आप में एक बड़ा विभाग है , जे के श्रीवास्तव , दोनो प्रभार के बीच फंसे हुए हैं ।विश्व बैंक की अरबों की धनराशि की परियोजनाओं को प्रारम्भ कराने तथा उनकी स्वीकृति कराने एवम स्वीकृत परियोजनाओं की प्रगति की मॉनिटरिंग नहीं की जा पा रही है।
मुख्य अभियन्ता, मुख्यालय एक, द्वारा मुख्यालय स्तर से चल रही योजनाओं की देख रेख व मागदर्शन किया जाता है और मुख्य अभियन्ता परिवाद, विभाग के अभियंताओं की आने वाली शिकायतों पर नजर रखते हैं ।
पर आश्चर्य की बात यह है कि लोक निर्माण विभाग में यह दो पद खाली चल रहे हैं , ऐसा नहीं है कि विभाग में इन पदों के लिए मुख्य अभियन्ता नहीं है । मुख्य अभियन्ता स्तर कई अधिकारी है जो खाली घर बैठे हैं उसके बाद भी उनकी तैनाती नहीं की जा रही है आखिर क्यों ?
सोचनीय तथ्य तो यह है जिस विभाग में दो मुख्य अभियन्तताओ के पद खाली चल रहे हो वहां पर विकास की रफ्तार धीमी हो ही जायेगी ?
इतना ही नहीं विभाग में आधा दर्जन से अधिक अभियंता प्रोन्नति पा कर अधीक्षण अभियंता बन चुके हैं पर उनकी भी तैनाती अधीक्षण अभियंता के पद पर नहीं की जा रही है बल्कि वह अधिशासी अभियंता के पद पर ही काम करने पर मजबूर हैं ।
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