सुशील शुक्ल
पहले केन्द्र और अब एक-एक कर राज्य धीरे-धीरे देश का भाजपाकरण होता जा रहा है। यह परिवर्तन देश के लिए कितना अच्छा होगा और कितना बुरा, इसका ठीक-ठीक पता चलने में कुछ समय लगेगा। सरकार से बाहर रहकर विपक्ष में रहते हुए बिना किसी परिभाषित उत्तरदायित्व के कुछ भी बोलते रहने और सरकार में आकर शासन चलाने की जिम्मेदारी से उपजी चुनौतियों से दो-चार होने के संकट सामने आने ही लगे हैं। कभी-कभी तो लगता है कि सरकार सरकार होती है, चाहे वह किसी भी पार्टी या गठबंधन की हो। उसकी भाषा, उसकी चाल और उसके चरित्र में कोई बहुत अंतर नहीं आता। इसके बावजूद सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के बदलने से कुछ न कुछ बदलाव तो नजर आने ही लगते हैं। कुछ लोगों और संगठनों की गतिविधियां अचानक बढ़ जाती हैं तो कुछ दूसरे नजर से ओझल हो जाते हैं। वे नेपथ्य में पड़े रहकर समय काटते हैं। भाजपा के केन्द्र में सत्तारूढ़ होने और राज्यों में हाथ-पांव पसारने के उपरान्त एक उल्लेखनीय बात जो नजर आ रही है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगी संगठनों का खुलकर सामने आना और अपनी गतिविधियों का विस्तार करना। यह खुलापन कुछ इस कदर उभरा है कि संघ अब पहले की तरह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर शर्माता या सकुचाता नहीं।
सच तो यह है कि संघ भाजपा के राजनीतिक चढ़ाव के दौर के चलते राष्ट्रवाद के छाते तले भगवाकरण के अपने एजेंडों को मूर्तिमान कर लेना चाहता है। अपने इस अभियान की चौहद्दी में उसने साहित्य को भी घसीट लिया है। वह राष्ट्रवादी साहित्य को प्रायोजित और प्रोत्साहित करने में जुट गया है। लेखकों को संगठित किया जा रहा है, उन्हें देश-विदेश के दौरे करवाये जा रहे हैं और उनसे राष्टï्रवादी साहित्य लिखवाया जा रहा है। खतरा यहीं पर है। अन्धा राष्टï्रवाद अधिनायकवाद की ओर ले जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह यात्रा जरा सुगम ही हो जाती है। कला साहित्य लेखन को किसी खास रंग में रंगवाने का आग्रह कभी रचनात्मकता की ओर नहीं ले जा सकता। हां, रचनात्मक स्वतंत्रता का अपहरण अवश्य कर सकता है। राष्टï्रवाद के चोले में साहित्य का भगवाकरण उतना ही आपत्तिजनक और अवांछित है जितना कि उसका रक्तवर्णीकरण। इससे पहले कि कला, साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में ‘डिक्टेशनÓ की यह मुहिम और ठोस रूप ग्रहण करे, लेखकों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों को सतर्क हो जाना चाहिए।
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