
lucknow | गाजियाबाद प्राधिकरण में पिछले सात साल के दौरान सरकारी स्तर पर हुई खरीदारी, प्लाट आवंटन और बांटे गए मुआवजे की जांच होगी मंडलायुक्त ने शनिवार को जीडीए पहुंचकर इस मामले में पूछताछ की। साथ ही इन मामलों से जुड़ीं पिछले सात साल की फाइलें भी तलब कर लीं। दरअसल अधिग्रहण, आवंटन और मुआवजा वितरण में घोटाले की आशंका है।
सूत्रों की मानें तो जांच में कई अधिकारियों की गर्दन फंसना तय माना जा रहा है। जीडीए बोर्ड अध्यक्ष और मंडलायुक्त डॉ. प्रभात कुमार को शिकायते मिली कि पिछले सात साल में प्राधिकरण ने जितनी जमीनें खरीदी हैं या इससे पूर्व में खरीदी गई जमीन का मुआवजा दिया है, उसमें घोटाला हुआ है। इन शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए मंडलायुक्त ने शनिवार को जीडीए परिसर में समीक्षा बैठक के दौरान प्राधिकरण उपाध्यक्ष से पिछले सात साल की फाइलें तलब की। मंडलायुक्त ने कहा कि किसानों से ली गई जमीन के मुआवजे की सभी फाइलों की जांच होगी। गौरतलब है कि प्राधिकरण ने साल 2010 से लेकर अभी तक विभिन्न स्थानों पर जमीने खरीदी हैं। इसमें मुख्य रूप से राजनगर एक्सटेंशन का क्षेत्र है।
मंडलायुक्त ने प्राधिकरण के अधिकारियों से कहा कि जिन स्थानों पर प्राधिकरण के प्लाट खाली हैं। उनकी रिपोर्ट बनाकर तैयार की जाए। इन स्थानों पर क्या बनाना चाहिए इसकी भी प्लानिंग की जाए। दिल्ली-मेरठ और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे की सभी फाइलें मांगी दिल्ली-मेरठ और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे की सभी फाइलें भी मंडलायुक्त ने तलब कर ली हैं। जमीन अधिग्रहण मुआवजे में करोड़ों का खेल हुआ है। मंडलायुक्त ने पहले भी 200 फाइलें जांच के लिए मंगाई थी। सूत्रों ने बताया कि उनमें कुछ गड़बड़ी मिली है। इस कारण अब सभी फाइलें मंगा ली गई है।
गौरतलब है कि दिल्ली से मेरठ तक एक्सप्रेस वे बनाया जा रहा है। यह डासना से निकाला जाएगा। इसके लिए 17 गांवों के किसानों की जमीन अधिग्रहीत की गई है। यूपी गेट से मेरठ तक के प्रोजेक्ट की लागत 7620 करोड़ है। नहाल और कुशालिया गांव के कुछ किसानों ने गलत तरीके से अधिक मुआवजा उठा लिया। इसके बाद ही यह मामला पकड़ में आ सका। ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे के मुआवजे भी घोटाले की आशंका है। यह मामला है एक्सप्रेस वे लिए वर्ष 2008 में नोटिफकेशन हुआ था। शासनदेश के अनुसार इसके बाद भूमि के खसरों की रजिस्ट्री पर रोक लगा दी जाती है। इसके बाद भी कुशालिया और नहाल गांव के कुछ किसानों ने जमीन की रजिस्ट्री जिलाधिकारी की तरफ से तय सर्कल रेट से कई गुना रेट पर करा ली। यह गलत है।
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