नई दिल्ली: भाजपा नेताओं को अब व्यापम के सियासी नुकसान का डर सताने लगा है। पार्टी को आशंका है कि कहीं व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) घोटाला शिवराज सिंह चौहान के लिए उत्तर प्रदेश के एनआरएचएम घोटाले की तरह कुर्सी छीनने वाला साबित न हो जाए।दोनों को एक साथ जोड़ कर देखा जाने लगा है। मायावती की सरकार के समय एनआरएचएम घोटाला खुला था। इस घोटाले की वजह से उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की छुट्टी हुई थी और स्वास्थ्य सचिव रहे प्रदीप शुक्ला पर कार्रवाई हुई थी। जितने दिन एनआरएचएम घोटाले का हल्ला रहा, मायावती की सरकार बैकफुट पर रही और आखिरीकार 2012 का चुनाव हारी।
इस घोटाले से जुड़े छह अहम लोगों की हत्या हो गई थी। बिल्कुल यहीं कहानी मध्य प्रदेश में दोहराई जा रही है। एनआरएचएम घोटाले में लखनऊ के तीन चीफ मेडिकल ऑफिसर, सीएमओ मारे गए थे और वाराणसी में एक डिप्टी सीएमओ की हत्या हुई थी। लखनऊ में दो सीएमओ विनोद आर्य और बीपी सिंह की गोली मार कर हत्या की गई थी, जबकि वाईएस सचान बहुत रहस्यम तरीके से जेल के टॉयलेट में मृत पाए गए थे। वाराणसी के डिप्टी सीएमओ रहे शैलेश यादव की भी हत्या हुई थी।इसी तरह एक के बाद एक लोग व्यापमं घोटाले में मरते जा रहे हैं।
इसका राजनीति पहलू यह है कि कांग्रेस नेताओं को उत्तर प्रदेश जैसे नतीजे की उम्मीद बंधी है। एनआरएचएम घोटाला उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार की ताबूत का आखिरी कील साबित हुआ था, उसी तरह कांग्रेस नेताओं को लग रहा है कि व्यापमं घोटाला शिवराज सिंह चौहान के लिए भारी पडऩे वाला है। हालांकि मध्य प्रदेश में अभी चुनाव तीन साल बाद होने वाले हैं। लेकिन कांग्रेस अभी से चुनावी मोड़ में आ गई है।
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