ऊंची भूमि व दोमट मिट्टी में करें दलहन की खेती


झारखंड में वर्ष 2007-08 में उड़द की फसल का क्षेत्रफल, उत्पादन व उत्पादकता क्रमश: 98,500 हेक्टेयर; 52,090 टन एवं 529 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था. वही मूंग के लिए क्षेत्रफल, उत्पादन व उत्पादकता क्रमश: 14,530 हेक्टेयर; 7,180 टन एवं 494 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था. अब वर्ष 2012-13 में बढ़कर उड़द का क्षेत्रफल, उत्पादन तथा उत्पादकता क्रमश: 106,298 हेक्टेयर; 96,242 टन एवं 905 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया. वहीं मूंग की फसल का क्षेत्रफल, उत्पादन तथा उत्पादकता क्रमश: 26,096 हेक्टेयर, 16,358 टन एवं 627 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया है. उड़द व मूंग की खेती मिश्रित और शुद्ध दोनों रूपों में की जाती है. खरीफ के मौसम की ये दोनों महत्वपूर्ण फसल हैं. इसे खेत सुधारने वाली फसल भी कहते हैं तथा जानवर के चारा के रूप में भी प्रयोग करते हैं.

उड़द में प्रोटीन की मात्र 23.5 प्रतिशत, काबरेहाइड्रेट 71 प्रतिशत, वसा 18 प्रतिशत और मूंग में प्रोटीन की मात्र 25.6 प्रतिशत, काबरेहाइड्रेट 69. 2 प्रतिशत, वसा 1. 3 प्रतिशत के अलावा अन्य पोषक तव जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा, पोटाश पाया जाता है. यह ऊर्जा का प्रमुख श्रोत है. उड़द में 38. 5 किलो और मूंग में 38.1 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है. झारखंड राज्य के वैसे हिस्सों में जहां पानी की सुविधा हो वहां गरमा मूंग की खेती करनी चाहिए और खरीफ मौसम में उड़द की खेती ज्यादा लाभकारी होती है. उड़द और मूंग की भरपूर पैदावार के लिए निम्नलिखित उत्पादन कारकों एवं विधियां को ध्यान में रखकर उड़द व मूंग की अच्छी पैदावार की जा सकती है :

भूमि का चुनाव : उड़द व मूंग की खेती विभिन्न प्रकार कीजमीन पर की जा सकती है. लेकिन अच्छे जल निकासी वाली ऊंची भूमि, दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6. 0 से 6. 5 के बीच हो, वह उड़द व मूंग की खेती के लिए उपयुक्त है.

खेत की तैयारी : खेत की 2-3 बार देसी हल से जुताई करने के बाद पाटा आवश्यक है. खेत की अंतिम जुताई के समय क्लोरपायरीफॉस पांच प्रतिशत, धूल 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें, ताकि दीमक का प्रकोप कम हो सके. जरूरत के अनुसार ग्रीष्मकालीन फसल में 10 किलो फोरेट प्रति हेक्टेयर की दर से डालने से कीड़े के प्रकोप को कम किया जा सकता है़

बीजोपचार : बीज जनित एवं मृदा जनित रोगों से फसल के बचाव के लिए बोने से पहले बीज को दो ग्राम बैविस्टीन प्रति किलोग्राम की दर से शोधित करना चाहिए़ इसके पश्चात कम से कम आंधे घंटे बाद कीटनाशक दवा इमिडाक्लोपरीड तीन मिलीलीटर या डाइमिथोएट पांच मिलीलीटर की मात्र को 50 मिलीलीटर पानी में घोल बना कर उसे एक किलोग्राम बीज में अच्छी तरह मिलाने के बाद छाया में सुखाकर बोआई करनी चाहिए़ इससे मृदा में उपस्थित हानिकारक कीटों से बचा जा सकता है. दीमक से बचाव के लिए छह मिलीलीटर क्लोरपायरीफॉस तरल का 50 मिलीलीटर पानी में घोल बनाकर उसे एक किलोग्राम बीज में अच्छी तरह मिलाने के बाद छाया में सुखाकर बोआई करनी चाहिए़

उड़द और मूंग की अच्छी पैदावार के लिए बीजों का राइजोबियम कल्चर तथा जहां पर भूमि में फॉस्फोरस की कमी है, वहां पर पीएसबी कल्चर 20 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचार करना चाहिए़ राइजोबियम कल्चर के बीज से मिलाने के लिए आधा लीटर पानी में 100 ग्राम गुड़ डालकर घोल बनाकर उबाल लें और ठंडा कर लें. घोल ठंडा होने के बाद इस घोल में राइजोबियम कल्चर का एक पैकेट मिला दें तथा 10 किलो बीज के ऊपर से मिश्रण को मिलायें. इसके बाद उपचारित बीज को दो से तीन घंटे छाया में सुखाकर बोआई करें़ बीज उपचार करने का सही क्रम पहले फंफूदी, कीटनाशी, जीवाणुनाशी फिर राइजोबियम कल्चर तथा अंत मे पीएसबी कल्चर है़

उन्नत किस्में

मूंग : झारखंड में इसकी खेती खरीफ तथा जायद (बसंत एवं ग्रीष्मकालीन) मौसम में होती है. पूसा विशाल व एसएमएल. 668 अच्छी किस्में हैं.

उड़द : बिरसा उड़द 1, पंत उड़द 19, उत्तरा.

बुआई एवं बीज दर : खरीफ उड़द एवं खरीफ मूंग की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए. बीज दर 25 किलो प्रति हेक्टेयर होना चाहिए तथा बोआई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई मध्य तक की जानी चाहिए़ बसंतकालीन या ग्रीष्मकालीन मूंग को पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी आठ सेंटीमीटर होती है. बीज दर 30 किलो प्रति हेक्टेयर उपयोग की जाती है. बसंतकालीन फसल की बोआई मार्च के प्रथम पखवारा में की जाती है तथा ग्रीष्मकालीन फसल की बोआई अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक की जाती है.

उर्वरक की मात्र : उड़द और मूंग की अच्छी पैदावार लेने के लिए 20 किलोग्राम नेत्रजन, 40 किलोग्राम फॉस्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश तथा 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए़ उर्वरकों की यह मात्र 100 किलोग्राम डीएपी, 33 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश व 125 किलोग्राम फास्फोजिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए़ यदि फॉस्फोरस सिंगल सुपर फॉस्फेट के रूप में खेत में देते हैं तो फसल को सल्फर भी उपलब्ध हो जाता है. तब फसल को 33 किलोग्राम यूरिया, 250 किलोग्राम एसएसपी तथा 33 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए़ जिन खेतों की मिट्टी अम्लीय हो उसमें चूना तीन-चार क्विंटल प्रति हेक्टेयर को कूड़ों में मिला कर प्रयोग करना चाहिए़

खर-पतवार नियंत्रण : खर-पतवार से 30 से 40 प्रतिशत तक की उपज में कमी होती है. उड़द और मूंग की निकाई-गुड़ाई दो बार करनी चाहिए़ पहली बोआई के 20 दिनों बाद व दूसरी 40 दिनों के बाद करनी चाहिए़. खरपतवारनाशी रसायन पेंडीमिथेलिन 2.5-3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी का घोल बनाकर बोआई के तुरंत बाद छिड़कना चाहिए. इससे नियंत्रण नहीं होने से इमाजेथापायर 400 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से 20 दिनों के बाद छिड़काव करना चाहिए़

उड़द और मूंग के साथ मिश्रित खेती : उड़द और मूंग फसल एक साथ अन्य दलहनी व खाद्यान्न फसलों के साथ मिश्रित या मिलवा खेती की जा सकती है. उड़द और मूंग को मक्का तथा अरहर के साथ अंत: फसली के रूप में लिया जाता है.

कीट प्रबंधन

भूआ पिल्लू : यह कीट सड़ी पत्तियों को खासकर नुकसान पहुंचाता है. इसे खत्म करने प्रारंभिक अवस्था में कीट ग्रसित पौधों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें या डायक्लोरफॉस 0. 5-1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल बनाकर छिड़काव करें. घोल में टिपाल या साबुन का घोल मिलाना लाभप्रद होता है.

रस चूसक कीट : इस वर्ग में सफेद मक्खी, थ्रीपस तथा माहू कीट आते हैं. ये कीट पौधों की कोमल टहनियों, पत्तियों एवं फूलों से रस चूसते हैं, जिसके पौधे कमजोर होकर सूखने लगते हैं. सफेद मक्खी से बचाव के लिए रोग ग्रसित पौधे खेत में दिखते ही उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा फसल पर 15 दिन के अंतराल पर आक्सीमिथाइलडेमेटान दवा एक मिली प्रति घोल छिड़काव करना लाभप्रद रहता है.

रोग प्रबंधन

पीला मोजौक रोग : यह एक विषाणु रोग है़ रोग से ग्रसित पौधे की कोमल पत्तियों पर पीले रंग के चितकबरे धब्बे हो जाते हैं और अंत में सारी पत्तियां पीली हो जाती है. खड़ी फसल में लक्षण दिखने पर ग्रसित पौधे को नष्ट कर देना चाहिए़.

पत्ती का चीत्ती रोग : इस रोग से ग्रसित पौधे की कोमल पत्तियों पर छोटे-छोटे गोल या कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं. धब्बों का मध्य भाग भूरा या धूसर रंग का हो जाता है. बाद में धब्बे आपस में मिलकर अनियमित आकार के बड़े-बड़े धब्बे बना लेते हैं. परिणामस्वरूप पत्तियां झुलस का गिर जाती हैं. ये धब्बे शाखाओं व फलियों पर दिखायी पड़ते हैं. लक्षण दिखायी पड़ने पर इंडोफिल एम 45 नामक दवा का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव कर दें. आवश्यकता पड़ने पर 10 से 12 दिनों के अंतराल दूसरा छिड़काव करें.

फसल की कटनी तथा दौनी : जब फलियों के रंग भूरे होने लगे तब उसे तोड़ लेना चाहिए़ फसल को तीन से चार दिनों तक धूप में अच्छी तरह सूखाएं, ताकि बीज की नमी प्रतिशत से कम हो जाए तथा साफ कर भंडारण करना चाहिए़

उपज क्षमता : गरमा मूंग के लिए उपज क्षमता 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं खरीफ उड़द के लिए उपज क्षमता 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.


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