
सीए सिंघई संजय जैन——-
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का सबसे बड़ा लाभ जो इस देश को मिला वह यह है कि वे सारे दो कौड़ी के लोग पूरे नंगेपन से देश के सामने बेनकाब हो गये जो अब तक धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर देश को जाति और धर्म के नाम पर विभाजित करके सत्ता सुख भोगते आए हैं. इन छद्म बुद्धिवादियों का स्तर इतना निम्न है कि तर्क के बजाय दूसरे के मुंह पर कालिख पोत कर ये गोरे बनते आये हैं. हमारे देश को बाहरी तत्वों और हथियारबन्द आतंकियों से उतना खतरा नहीं है जितना घर में बैठे इन घरफोड़वा लोगों से है जो देश को दीमक की तरह खाते आये और खोखला करने का प्रयास करते रहे. आजादी से अब तक इनका पूरा प्रयास रहा कि इस देश का मुसलमान गरीब और मजलूम रहे ताकि उसकी हिमायत की आड़ में इनकी दुकान चलती रहे. क्या कारण है कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमान का बतलाने वाले लोगों के साठ साल के शासनकाल में इस देश का मुसलमान मैकेनिक और मजदूर ही बना रहा. अरबों रुपयों की बन्दरबांट मुल्लों और इन नेताओं में होती रही और वह मुसलमान जिसने 1947 में इस धरती को अपनी मादरे-वतन माना अपने ही घर में चोर की तरह दिखाई दिया ? अल्लाह का इस्लाम मानने वाला जबरन मुल्ला का इस्लाम मानने को बाध्य किया गया. आज जब एक सरकार इस मिजाज़ से काम करने आगे आई कि सबका साथ हो सबका एक सा विकास हो तो इन्हे अपनी खैरात खतरे में लगने लगी. षायद यही कारण है कि आज फिर कुछ लोग इस्लाम की हिमायत और रक्षा की आड़ में इस देश की एक बांह को लकवाग्रस्त करने की हिमाकत कर रहे हैं.
2016 का भारत एक सशक्त राष्ट्र है जो अब विकसित देशों की मेहरबानी के लिये हाथ फैलाता नहीं, मित्रता के लिये हाथ बढ़ाता है. सारे विश्व ने उसकी ताकत को पहचाना है और सबको कहीं न कहीं अंदेशा है कि आने वाला वक्त भारत का ही है. सो समझदार इससे दोस्ती के तलबगार हैं और नासमझ अभी भी इससे लड़ने की बाते करते हैं. सर्जिकल स्ट्राइक की क्रेडिट के लिये देश के प्रधानमंत्री की मजम्मत करने वाले कायरों से कोई यह पूछे कि सेना की हार का जिम्मेदार कौन होता? देश की हार और जीत दोनों का जिम्मा सेनानायक का ही होता है. किसी का कद बड़ा न स्वीकार पाने वाले ये वे चन्द सफेदपोश हैं जिन्होने अब तक की अपनी राजनीतिक अथवा प्रभावनीतिक यात्रा आलाकमान के चरण-चुम्बन से ही तय की है. क्योंकि अब सत्ता के इन दलालों की एन्ट्री सत्ता के गलियारों में प्रतिबन्धित है इसलिये इनकी छटपटाहट उस नशेड़ी की तरह है जो नशा न मिलने पर अपने बाप को भी तमाचा जड़ देता है. बरसों की स्वस्फूर्त विकास यात्रा के बाद आज यह मुल्क ऐसे मकाम पर पहुंचा है जहां से वह अपनी शक्ति और सामर्थ्य की हुंकार कर सकता है. और प्रारब्ध से यदि ऐसे समय में दैवयोग ने उसकी कमान कमजोर हाथों से छीन कर मजबूत हाथों में सौंपी है तो इन मौकापरस्तों का विधवा विलाप क्यों ? सामर्थ्य का अभाव दीनता का द्योतक होता है और सामर्थ्य का प्रभाव सम्मान दिलाता है. यदि विश्व में हमारे प्रधानमंत्री का प्रभाव बढ़ता है तो भारत का ही प्रभाव बढ़ता है. ऐसे में मात्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अन्दर के गटर का दरवाजा खोल कर मैला फेंकने वालों को अलग-थलग करने का काम हम सभी को करना ही होगा. मुसलमानों के तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले सम्भवतः नहीं जानते कि अब इस देश का मुसलमान भी उनको अच्छी तरह पहचान चुका है और वह यह जानता है कि उसके नाम पर तरह-तरह के प्रपंच रचने वालों का असली मकसद क्या है. इस देश के मुसलमान देश की कमजोरी नहीं देश की ताकत हैं. सरहद पर लड़ने वाले अब्दुल हमीद से लेकर देश के सिरमौर डॉ. कलाम तक राष्ट्रवादी मुसलमानों की एक बहुत बड़ी जमात है जो अब तक दबाई जाती रही पर अब दबने तैयार नहीं है. स्मरण रहे कि सबसे पहले देश है उसके बाद हमारी अपनी मान्यताऐं और फिर धर्म! धर्म का काम राष्ट्र को मजबूत करना ही है, क्योंकिः-
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