अटल की ‘‘प्याज’’ की राह पर मोदी का ‘‘तेल’’


PIC- PETAROL

lucknow \‘‘प्याज’’ का इतिहास पुराना है अटल बिहारी बाजपाई की सरकार को यही प्याज ले डूबी थी और बी जे पी को सत्ता से बेदखल कर दिया था । प्याज की कीमतों ने आम आदमी को खून के आंसू रुला दिये थे। प्याज की कीमतों ने पहले भी कई बार तख्त पलटे हैं। चाहे आपातकाल के बाद आई जनतापार्टी की सरकार हो या इसके बाद 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार। संसद से लेकर विधानसभाओं में कई बार नेता प्याज की बढ़ी हुई कीमतों के विरोध में प्याज की माला पहनकर भी पहुंचे। आपातकाल के बुरे दौर के बाद जब देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। सत्ता से बेदखल हो चुकी इंदिरा गांधी के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। अचानक ही प्याज की कीमतें बढ़ने लगीं तो उन्हें एक मुद्दा मिल गया। कहा जाता है कि जनता पार्टी की सरकार भले ही अपनी वजहों से गिरी हो, लेकिन कांग्रेस ने उसके बाद का चुनाव प्याज की वजह से जीत लिया। केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो 1998 में प्याज की कीमतों ने फिर रुलाना शुरू कर दिया और भाजपा चुनाव हारी थी। आज देश में वही संकट है। बस उसका रूप बदल गया है। प्याज की जगह पेट्रोल और डीजल की मूल्य वृद्धि प्याज का इतिहास याद कराती दिख रही है। भले ही कई मोर्च पर मोदी की सरकार इतिहास रच रही हो लेकिन जैसे ही यह बढ़ोत्तरी जनता के सिर पर भूत बनकर सवार हो जाएगी यह तय माना जाए कि मोदी सरकार की सारी उपलब्धियाॅ धरी रह जाएगी।

 

अच्छे दिन लाने के वादे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के लिए देश में अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतें सिरदर्द साबित हो सकती हैं।मोदी सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल में डीजल की कीमत 20 प्रतिशत की छलांग लगा चुकी है, वहीं पेट्रोल के दाम में भी आठ प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है। डीजल के दाम बढ़ने से ट्रांसपोर्टरों ने अगर मालभाड़ा बढ़ाया तो खाद्य वस्तुओं की ढुलाई महंगी होगी जिसका बोझ कारोबारी आम आदमी पर ही डालेंगे। मोदी की अगुवाई में राष्ट्रीय जनताांिक गठबंधन (राजग) की सरकार 26 मई 2014 को सत्तारुढ़ हुई थी। उसके सत्ता में आने के बाद पहले पेट्रोल पर से प्रशासनिक मूल्य प्रणाली हटाया गया। कुछ समय बाद तेल विपणन कंपनियों को डीजल के दाम भी अंतरराष्ट्रीय मूल्य के आधार पर तय करने की छूट दे दी गई। पिछले साल 16 जून से दोनों ईधन के दाम विश्व बाजार की कीमतों के अनुसार दैनिक आधार पर तय किए जाने लगे। तेल कंपनियां वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों के अनुरूप रोजाना पेट्रोल और डीजल के दामों में संशोधन करती हैं। महंगाई का संवदेनशील मुद्दा पिछले आम चुनाव में राजग के चुनावी प्रचार का मुख्य हथियार बना था और जब आम चुनाव में एक साल का समय रह गया है तो यह मुद्दा फिर से गरमाने लगा है। पिछले चार साल की कीमतों का आकलन किया जाए तो डीजल 19.64 प्रतिशत अर्थात 11.25 रपए प्रति लीटर की छलांग लगा चुका है। एक जून 2014 को दिल्ली में एक लीटर डीजल की कीमत 57.28 रपए थी जो आज बढ़ती हुई 68.53 रपए प्रति लीटर पर पहुंच चुकी है।

 

डीजल की कीमत में भारी उछाल मोदी सरकार के लिए चुनावों में भारी दिक्कत का सबब बन सकता है। देश के कई राज्यों में अभी भी सिंचित भूमि क्षेत्रफल कम है और वष पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में डीजल किसान की सिंचाई के लिए मुख्य ईंधन है। देश की करीब दो तिहाई आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और डीजल के दाम इसी तरह बढ़ते रहे तो आने वाले दिनों में सरकार की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। पेट्रोल की कीमत भी मोदी के चार वर्ष के कार्यकाल की समाप्ति पर 8.33 प्रतिशत अर्थात 5.96 रपए प्रति लीटर बढ़कर दिल्ली में 71.51 रपए से 77.47 रपए पर पहुंच चुकी हैं। पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाने पर राज्यों के बीच सहमति नहीं बनी है और दोनों ईधन के दाम तेजी से ऊपर जा रहे हैं। जीएसटी से बाहर होने के कारण पेट्रोल-डीजल पर अलग-अलग राज्यों में अलग टैक्स है जिससे हर राज्य में कीमतें अलग हैं। जैसे मुंबई में पेट्रोल 85 रूपये तो दिल्ली में 80 रूपये ।

यहां पर सबसे दिलचस्प तय यह है कि मोदी सरकार के शुरुआती तीन साल के कार्यकाल के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में रिकार्ड गिरावट रही लेकिन सरकार ने इसका लाभ देश के आम आदमी को नहीं दिया और इसका ज्यादा फायदा अपने खजाने को भरने में लिया। जबकि देश की मोदी सरकार एक देश एक टैक्स के नाम पर वाहवाही लूटने से परहेज नही कर रही वही पेट्रोल डीजल पर जीएसटी न लगाकर सीधे सीधे जनता के साथ धोखाधड़ी की जा रही है। प्रश्न यह उठता है कि जब जीएसटी की बाॅत की जाती है तो बड़ी सफाई से राज्यों के उपर जिम्मेदारी धकेल दी जाती है। जब देश के अधिकत्तर राज्यों में भाजपा की सरकारें सत्तासीन है तो सीधे प्रधानमंत्री राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सीधे यह निर्देश क्यो नही देते कि वे पेट्रोल के दाम नियंत्रित करें।‘लोकतंत्र और संसद कोई रोडवेज बस की सीट नहीं है, जिसने रूमाल रख दिया, उसकी हो जाएगी.’ 28 मई, 1996 को लोक सभा में यह बात तत्कालीन वाजपेयी सरकार में संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन ने कही थीजो गलत परंपरा कभी वाजपेयी सरकार को 13 महीने में ले डूबी थी, भाजपा अब उसे आगे बढ़ाती दिखती है। लगातार पेट्रोल के दाम जिस तरह से बढ़ रहे है वह इस बाॅत का संकेत है कि सरकार महंगाई को लेकर गम्भीर नही है।


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