दिल्ली का सबसे जोरदार चुनावी मुकाबला शीला के गढ़ में


नई दिल्ली । दिल्ली विधानसभा की चुनावी लड़ाई का सबसे दिलचस्प और रोचक मुकाबला नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है। यहां सूबे की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनौती देने के लिए आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अरविन्द केजरीवाल तथा भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता चुनाव मैदान में उतरे हैं। शहर की सियासत में अलग-अलग वजहों से महत्वपूर्ण इन तीनों हस्तियों की चुनावी जंग पर समूची दिल्ली की निगाहें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि दीक्षित का यह पहला विधानसभा चुनाव होगा जिसमें उन्हें विपक्ष की धमक का अहसास भी करना होगा।

मुख्यमंत्री दीक्षित ने दिल्ली में अपनी सियासत की शुरुआत पराजय से की थी। वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली से बतौर कांग्रेस प्रत्याशी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन इस पराजय के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने एक बार नई दिल्ली का रुख क्या किया, सत्ता मानों उन पर बरस ही पड़ी। तब से अब तक वह बेखटके लगातार तीन जीत दर्ज कर चुकी हैं।

नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र सही मायनों में देश की सत्ता का गढ़ है। यही वह इलाका है जहां से पूरे देश की हुकूमत चलती है। शुरू में इसे गोल मार्केट विधानसभा क्षेत्र के तौर पर जाना जाता था। जब वर्ष 1993 में पहली बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए, तो भाजपा प्रत्याशी के तौर पर कीर्ति आजाद ने कांग्रेस के बृजमोहन भामा को मात दी थी। इस क्षेत्र से भाजपा की यह एकमात्र जीत थी। उसके बाद वर्ष 1998 में हुए चुनाव में दीक्षित ने सीधे मुकाबले में कीर्ति आजाद को हराया। वर्ष 2003 के चुनाव में आजाद की पत्‍‌नी पूनम आजाद बतौर भाजपा प्रत्याशी, दीक्षित के सामने पराजित हो गई और 2008 में दीक्षित ने भाजपा के विजय जॉली को 11 हजार से अधिक मतों से मात दे दी। याद रहे कि वर्ष 2008 में ही परिसीमन के बाद इस क्षेत्र का स्वरूप भी बदला और इसका नाम गोल मार्केट से बदलकर नई दिल्ली कर दिया गया।

मुख्यमंत्री दीक्षित का निर्वाचन क्षेत्र कितना हाई प्रोफाइल है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, सहित देश की सत्ता के शिखर पर बैठे तमाम वीवीआईपी इस क्षेत्र के वोटर हैं।

दिल्ली चुनाव कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या करीब 1 लाख, 18 हजार है। सियासी पंडितों की मानें, तो यहां वीवीआईपी मतदाताओं के अलावा बहुत बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी हैं। इनमें भी दक्षिण भारतीय लोगों की अच्छी-खासी संख्या है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार इस विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले लोगों की संख्या लगभग 40 हजार है। सभी सांसदों की कोठियों व फ्लैटों के साथ साथ उनके कर्मचारियों के रहने की भी व्यवस्था है और यहां ऐसे कर्मचारी व उनके परिजन बड़ी तादाद में हैं। इस इलाके में बड़ी संख्या में धोबी घाट भी बने हुए हैं। उत्तरांचल व पूर्वाचल से ताल्लुक रखने वाले मतदाता भी यहां बड़ी संख्या में हैं।

सियासी जानकारों का कहना है कि अब तक मुख्यमंत्री दीक्षित का सीधा मुकाबला भाजपा उम्मीदवारों से होता रहा है। इस बार अरविन्द केजरीवाल भी सामने हैं। ऐसे में यहां लड़ाई त्रिकोणात्मक होने के आसार हैं। यही वजह है कि इस बार का चुनाव बेहद दिलचस्प माना जा रहा है।


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