बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का नया हथकंडा : सशक्तीकरण की आड़ में स्त्री को बंधुआ बनाने की साजिश


अर्थयुग में आदमी के जीवन को प्रभावित करने वाले नित नए प्रपंच रचे जा रहे हैं। इस सिलसिले में फेसबुक और एपल ने स्त्री सशक्तीकरण की आड़ में स्त्री के नैसर्गिक अधिकार-मातृत्व के अधिकार-को अपने दखल में लेने की कोशिश शुरू कर दी है। उन्होंने स्त्रियों के सामने धन और करियर में प्रगति का प्रलोभन रखकर करियर और मातृत्व के बीच चुनाव करने का सवाल पैदा कर दिया है। इस तरह की कोशिशें प्रकृति के स्वाभाविक प्रवाह में व्यवधान तो बनेंगी ही, बड़ा सवाल स्त्री सशक्तीकरण की आड़ में मानवाधिकार के हनन का भी है। इस बार सरोकार में हम इसी प्रपंच पर दो महिला लेखिकाओं का नजरिया पेश कर रहे हैं-

वन्दना मिश्र

working ladyफेसबुक ने इस वर्ष के प्रारंभ से अपनी महिला कर्मचारियों को ‘एग फ्रीजिंगÓ के लिए 20 हजार डालर तक अदा करने की योजना शुरू कर दी है। अंडों को स्टोरेज के लिए भी लगभग 500 डालर दिये जायेंगे। एपल भी अगले साल यानी जनवरी 2015 से यह योजना अपने यहां शुरू करने जा रहा है। ये कंपनियां इस कदम को महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया जाने वाला कदम बताकर अपनी पीठ खुद ठोंक रही हैं। इस घोषणा के निहितार्थ क्या है यह समझने की कोशिश करने से पहले यहां हम संक्षेप में जान लें कि एग फ्रीजिंग से तात्पर्य क्या है, यह तकनीक क्या है? डिम्ब हिमीकरण (एग फ्रीजिंग) मेडिकल साइंस की एक नई तकनीक है जिसका इस्तेमाल 1986 से शुरू हुआ। यह तकनीक उन महिलाओं के लिए उपयोगी थी जो कैंसर जैसी किसी बीमारी के परिणामस्वरूप गर्भधारण में असमर्थ हो सकती थीं। ऐसी महिलाओं के लिए यह तकनीक एक वरदान की तरह आयी, इसके तहत स्त्री के अंडाशय से अंडे निकालकर उनका हिमीकरण किया जाता है। हिमीकृत अंडे-126 सेल्सियस तापमान पर स्टोर किये जाते हैं। बाद में जब स्त्री गर्भधारण करना चाहे इन अंडों को पिघलाकर शुक्राणु के साथ संयुक्त कर उन्हें भ्रूण में बदलकर उसके गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इस प्रकार कोई स्त्री न केवल गर्भधारण में असमर्थ होने के बावजूद मां बन सकती है, बल्कि वह इस तकनीक द्वारा अपने बच्चे के जन्म को अनेक वर्षों के लिए टाल भी सकती है।
यह प्रक्रिया बहुत जटिल है और उसमें अनेक खतरे भी निहित हैं। स्त्री के डिंब में पानी ज्यादा होता है इसलिए हिमीकरण के दौरान उसके भीतर बर्फ के क्रिस्टल बन सकते हैं जिससे डिंब की नाजुक आंतरिक संरचना विकृत हो सकती है। ये क्रिस्टल उसके भीतर के क्रोमोसोम को भी प्रभावित कर सकते हैं। गर्भाशय से डिंब निकालने की प्रक्रिया भी बहुत जटिल और कष्टïदायक है। इसमें अंडाशय को ओषधियों द्वारा उत्तेजित किया जाता है ताकि अंडे अधिकतम संख्या में बाहर आ सकें। चिकित्सकों की कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा अंडे मिल सकें लेकिन महिलाओं को इस प्रक्रिया के दौरान घोर शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इस प्रक्रिया के चलते उन्हें संक्रमण, कमर, कूल्हों का दर्द जैसी अनेक शारीरिक तकलीफें भी हो सकती हैं। कृत्रिम ढंग से अंडे निकलवाने के लिए प्रयोग की गई ओषधियों का भी अंडों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इस तरह प्राप्त अंडों की संख्या प्राय: दस से बीस तक होती है।
अब देखा जाय कि इतने कष्टï सहकर, इतना पैसा खर्च कर और इतना जोखिम उठाकर एक प्रकृति विरोधी कार्य कर जो एग फ्रीजिंग करायी जाती है वह तकनीक दरअसल कितनी सफल है और उसके बारे में विशेषज्ञों की क्या राय है। अमेरिकन सोसायटी आफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि डिंब प्रशीतन (एग फ्रीजिंग) एक उत्साहित करने वाली और निरंतर बेहतर होती तकनीक है और अब इस प्रक्रिया से प्रायोगिक का लेबल हटा दिया जाना चाहिए लेकिन साथ ही उसने इस बात पर जोर दिया कि यह निर्णय इस बात की तसदीक नहीं करता कि स्वस्थ औरतें अपने डिंब भविष्य के लिए फ्रीज करायें। उसने यह भी कहा कि अभी इस समय हम बच्चों का जन्म टालने के लिए इस तकनीक के व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किये जाने का समर्थन नहीं कर सकते। इस तकनीक की मार्केटिंग स्त्रियों को झूठी उम्मीदें बंधा सकती हैं। इसी तरह ब्रिटिश फर्टिलिटी सोसायटी की सचिव डॉ. जेन स्टुअर्ट भी मानती हैं कि एग फ्रीजिंग को प्रोत्साहन देने वाला यह कदम स्त्रियों, उनके अधिकारों अथवा उनके कैरियर की दृष्टिï से कोई सकारात्मक कदम नहीं है।
अनेक अध्ययनों से भी यह बात सामने आ चुकी है कि एग फ्रीजिंग तकनीक से गर्भधारण होगा ही, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। 30 वर्ष की उम्र में इस तकनीक से गर्भधारण के 76 प्रतिशत मामले सफल नहीं रहे। 40 की उम्र में असफलता की दर 91 प्रतिशत रही।
इस तरह यह साफ है कि एग फ्रीजिंग इस बात की कतई गारंटी नहीं है कि संरक्षित अंडे से बच्चे का जन्म होगा ही। तब ये कंपनियां युवतियों को उनके नैसर्गिक अधिकार से वंचित करने का षडयंत्र क्यों कर रही हैं? इसके पीछे बाजारवाद का पूरा तंत्र हैं। महिला कर्मियों को इतनी आजादी और सुकून भरा माहौल क्यों नहीं देती जिसमें वह जब चाहे अपने बच्चे के बारे में सोच सकें, उनको कब बच्चा चाहिए इसका फैसला कर सके बिना इस बात से डरे कि इस समय बच्चा होने से उनका करियर, उनकी प्रोन्नति बाधित होगी, उन्हें यह डर न हो कि इस समय छुट्टïी लेने से कंपनी को परेशानी होगी। कंपनी को चाहिए कि वह एग फ्रीजिंग के लिए बीस हजार डालर और स्टोरेज के लिए कुछ सौ डालर देने के बजाय अपनी महिलाकर्मियों को बेहतर और लंबा मातृत्व अवकाश प्रदान करें, उनकी प्रोन्नति नियत समय पर अपने आप हो जाये ऐसी व्यवस्था करे तथा कार्यालय परिसर में ही एक बेहतरीन, हर सुविधा से लैस, बच्चों के लिए सुखद और मां को संतोष देने वाले क्रेश की व्यवस्था करें। सबसे बड़ी बात यह है कि कंपनियां स्त्रियों के कैरियर में आने वाली एक बड़ी बाधा शीशे की छत (ग्लास सीलिंग)को दूर करे जो दिखाई तो नहीं देती लेकिन स्त्रियों को करियर में बहुत ऊपर पहुंचने भी नहीं देती।
एग फ्रीजिंग में केवल कंपनी का ही निहित स्वार्थ नहीं है बल्कि यह तमाम अन्य धंधे वालों की भी बढिय़ा कमाई का जरिया बन गया है। एग फ्रीजिंग को औरतों की आजादी का प्रतीक बताने वालों में तमाम ड्रग कंपनियां, फर्टिलिटी क्लीनिक, एग बैंक, फर्टिलिटी फार्मेसी आदि शामिल हैं जो इस अत्यंत महंगी तकनीक को बेंचकर अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं। दरअसल सूचना तकनीक की इन कंपनियों में स्त्री कर्मचारियों की संख्या पुरूष कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम है। वे स्त्रियों की कार्यक्षमता, उनके काम के प्रति समर्पण और योग्यताओं को अच्छी तरह जानती है लेकिन उन्हें यह भी लगता है कि स्त्रियों के अपने परिवारिक दायित्वों तथा परिवार से लगाव के कारण उनका सर्वश्रेष्ठï अथवा उनकी संपूर्ण क्षमता का लाभ कंपनी को नहीं मिल पाता। अत: कंपनियों ने स्त्रियों की उस उम्र, जिसमें वे सबसे जयादा मेहनत कर पाती हैं या जिसे उनकी सर्वाधिक उत्पादक क्षमता वाली उम्र कहा जा सकता है, उसे अपने ही लिए आरक्षित करने के लिए इस तरह की ‘सुविधाÓ का प्रलोभन दिया है।
यहां यह प्रश्न भी उठता है कि इस योजना से क्या महिलाओं को वाकई कोई लाभ होगा? क्या मां बनने की उस आदर्श उम्र में, जो बच्चे और मां के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टिï से दुनिया भर में मान्य है मां बनकर मातृत्व को (अगर मातृत्व चाहिए, क्योंकि यह उसका अपना निजी फैसला है) भविष्य के लिए टालना, वह भी करियर के लिए बहुधा एक कभी न खत्म होने वाली दौड़ है, क्या उनके और भावी बच्चे के स्वास्थ्य तथा बच्चे के लालन पालन की दृष्टिï से यह सही फैसला होगा? क्या चिकित्सीय दृटि से अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठï समय कंपनी के व्यावसायिक हितों को समर्पित कर वे दरअसल लाभ की स्थिति में होंगी या इस मृग मरीचिका में फंसकर बाद में उन्हें पछतावा ही हाथ लगेगा? दरअसल इस तरह का प्रस्ताव स्त्रियों को एक दुविधा की स्थिति में डाल देगा क्योंकि यह स्त्री को बताता है कि यह समय दरअसल कैरियर बनाने का है, अधिक से अधिक पैसे कमाने का है, शिखर पर पहुंचने का, चांद को मु_ïी में पकड़ लेने का समय है न कि बच्चे पैदा कर, उनकी परवरिश में समय ‘बरबादÓ करने का। यहां यह भी नहीं भूलना चहिए कि अमरीका में एग फ्रीजिंग का व्यवसाय करने वाली कंपनियां एग फ्रीजिंग क्लीनिकों के जरिये इस तकनीकी के अधिक इस्तेमाल के उद्देश्य से प्रचार-प्रसार के ऐसे तमाम हथकंडे अपना रही हैं जो अब तक बाजार अपनाता रहा है। ‘इवेंटÓ आयोजित किये जाते हैं, अब आपकी बायोलाजिकल क्लाक आपके अपने नियंत्रण में जैसे आकर्षक, लुभावने नारे तैयार किये जाते हैं और एग फ्रीजिंग के दो या तीन राउंड करवाने के लिए ‘डिस्काउंटÓ (छूट) का भी आफर दिया जाता है। इन आयोजनों में यह नहीं बताया जाता कि एग फ्रीजिंग के बाद हिमीकृत अंडे से गर्भधारण होगा ही इस बात की कोई गारंटी है अथवा नहीं बाजारवाद के इस युग में बड़ी बड़ी कारपोरेट कंपनियां अपने कर्मचारियों से हफ्ते के सातों दिन, 24 घंटे काम लेती हैं। उन्हें यह भी लगता है कि स्त्रियां परिवार से अपने लगाव और परिवार की अपनी चाहत के कारण अपना सर्वश्रेष्ठï अपनी कंपनी को नहीं दे पाती। इसीलिए उनके प्रति भेदभाव का रवैया आम है। इसीलिए इन कंपनियां के कर्मचारियों में स्त्रिी-पुरूष अनुपात बेहद खराब है। पहले तो वे स्त्रियों को नौकरी देने में ही कंजूसी करती हैं फिर उन्हें फिक्र सताती हैं कि जिस उम्र में स्त्रियां स्वास्थ्य, उत्साह शारीरिक और मानसिक क्षमता आदि की दृष्टिï से सर्वाधिक चुस्त-दुरूस्त होती हैं, जिसका पूरा लाभ उनकी कंपनी को मिलना चाहिए उसी उम्र में वे विवाह कर लेती हैं, अपना परिवार बनाती हैं, मां बनती हैं। कंपनियों को लगता है कि महिलाओं का पूरा ध्यान जो कंपनी को मिलना चाहिए वह परिवार में बंट जाता है। ऐसा न हो, उनका पूरा श्रम, उनका सर्वश्रेष्ठï कंपनी को मिल सके, वे बच्चों के जन्म और उनकी परवरिश की फिक्र से मुक्त हो पूरे जी-जान से कंपनी की सेवा में लग जायें इसीलिए इस तरह की सुविधाओं का जाल। वहां इस बात की भी कोई चर्चा नहीं होती कि बच्चा चाहे सही उम्र में पैदा हो या एग फ्रीजिंग के जरिये देर से, उसके लालन-पालन के लिए मां को अवकाश तो चाहिए ही। हां, यह बात और है कि उम्र की ढलान पर बच्चों को जन्म देने वाली मां से शायद कंपनी का कोई लेना-देना नहीं रहेगा। यह बात भी विचारणीय है कि एक युवा मां अपने बच्चे का पालन-पोषण जिस उत्साह, और उछाह के साथ करती है उम्रदराज मां के लिए अपने बच्चे के लिए वह उछाह और फुर्ती जुटा पाना मुश्किल होगा। एग फ्रीजिंग का एक गंभीर पहलू यह भी है उससे जन्मे बच्चे यों तो ऊपरी तौर पर स्वस्थ लगते हैं लेकिन उनको लेकर कोई गंभीर अध्ययन अभी नहीं हुआ है और इस तकनीक से कई बार जुड़वा और तीन बच्चे एक साथ भी जन्मे हैं।
एग फ्रीजिंग की अगर मजबूरी है तब तो उसका सहारा लिया ही जाता है लेकिन एक स्वस्थ युवती के लिए अपने इच्छित मातृत्व को इस तकनीक के सहारे टालने का औचित्य इसलिए भी नहीं है क्योंकि तकनीक बच्चे का जन्म सुनिश्चित नहीं करती। कुल मिलाकर फेसबुक का यह कदम इस सोच का आईना है कि बाहर काम करना स्त्री का सहज, स्वाभाविक काम नहीं है, वह पुरुषों का काम है। अगर स्त्री बाहर काम करने आती है तो उसका मातृत्व उसके करियर में आड़े आयेगा और अपनी इसी सोच में कि स्त्री कैरियर को वरीयता दे ताकि उसका एक श्रमिक के रूप में पूरा इस्तेमाल हो सके कंपनी ने एग फ्रीजिंग जैसा प्रकृति विरोधी कदम उठाया है।

 

मातृत्व बनाम करियर : सवाल मानवाधिकार का

डा. अलका सिंह

pregnantपूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने मध्यकालीन समाज, उसके तौर तरीकों और सोच में आमूल चूल परिवर्तन किया है। इस अर्थव्यवस्था ने सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं के जीवन, उनकी सोच और रहन सहन के तरीके पर डाला है। बेहद जकड़े मध्यकालीन समाज में रह रही महिलाओं ने अपनी स्थिति को अधिकतर अपने हिसाब से बदलने में कामयाबी हासिल की है। महिलाओं के जीवन में बदलाव व इस कड़ी का अगला पड़ाव फेसबुक और एपल कम्पनियों की नयी एच आर नीति है। खबर है कि एपल और फेसबुक कम्पनियों ने अपनी सबसे तेज-तर्रार और मेहनती महिला कर्मचारियों के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि अगर महिला कर्मचारी चाहे तो वह अपने काम को बिना बाधा करने के लिए अपने डिम्ब को डिम्ब बैंक में सुरक्षित रख सकती है। जिसका खर्च कम्पनी उठायेगी। पहली नजर में कम्पनी का यह प्रस्ताव महिला कर्मचारियों के लिए एक खुशी की खबर हो सकती है क्योंकि महिलाओं, खासकर महिला कर्मचारियों, की दुनिया में मातृत्व एक बेहद चुनौती पूर्ण दौर होता है। अक्सर वे यह तय नहीं कर पाती कि वे काम को जारी रखे या मां बने। इस लिहाज से यह खबर महिलाओं को थोड़ा सुकून दे सकती है, किन्तु यदि कम्पनी की इस नीति को ध्यान से समझा और विश्लेषित किया जाये तो आने वाले दिनों में कम्पनी की इस नीति के परिणाम बहुत सकारात्मक नजर नहीं आते। इसके कई कारण है।
(1) कम्पनी की यह नीति कामकाजी महिलाओं को मां बनने के लिए एक विकल्प देती है ताकि वे अपने काम के चुनौतीपूर्ण दिनों में मां बनने की प्रक्रिया को टाल सकने का निर्णय ले सके। लेकिन आनेवाले दिनों में इस विकल्प के प्रस्ताव का प्रारूप क्या होगा, यह किसी को पता नहीं है।
(2) कम्पनी इस प्रस्ताव के दुरूपयोग के तरीके भी इख्तियार कर सकती है जो महिला कर्मचारियों के लिए आने वाले दिनों में बड़ी चुनौती बनकर उभर सकते हैं।
(3) भारत जैसे देश में छोटी कम्पनियां अपनी एच आर नीति बनायेंगी तब इस प्रस्ताव की शक्ल क्या होगी यह किसी को पता नहीं।
(4) इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने वाला बिन्दु यह है कि महिलाओं के श्रम उनके मातृत्व, उनके मां बनने के अधिकार, मातृत्व के सही समय के चुनाव और काम करने और न करने की कर्मचारी की इच्छा में कम्पनियों का अतिक्रमण होगा।
देखा जाये तो कामकाजी महिलाओं की दुनिया में मातृत्व बेहद चुनौती पूर्ण दौर होता है। अक्सर कामकाजी महिलायें यह तय नहीं कर पाती कि वे मां बनने का फैसला कब लें? कई बार महिलायें जब अपने करियर के सबसे महत्वपूर्ण दौर में होती हैं तब उनके सामने यह चुनौती आ खड़ी होती है कि काम और मां बनने की राह में किसका चुनाव करें और अक्सर उन्हें कई दबावों के नीचे आकर यह फैसला करना पड़ता है कि मां बनने को प्राथमिकता दें। इस राह में बड़ी बाधा डाक्टरों द्वारा यह बताया जाना भी है कि उम्र बढऩे के साथ मां बनने की संभावना धीरे-धीरे कम होने लगती है, ऐसे में महिलाओं के ऊपर खासा दबाव होता है कि वे अपने करियर का सबसे महत्वपूर्ण फैसला लें कि उन्हें मां बनना है । इस तरह से दोनों कम्पनियों का यह प्रस्ताव महिला कर्मचारियों के हित में नजर आता है, किन्तु कम्पनी के इस प्रस्ताव को अगर आने वाले दिनों की व्यापक एच.आर. नीति के रूप में देखा जाये तो यह महिलाओं के लिए कई अन्य चुनौतियों को जन्म देने वाला है। अगर महिलाओं के कामकाज के व्यावसायिक इतिहास और व संघर्ष पर नजर डाली जाये तो उनके श्रम और उनके घर से बाहर काम करने की मजबूरी और उनके मनोविज्ञान को कम्पनियों ने हर दौर में बहुत बारीकी से समझा और जाना है। यही वजह है कि हर दौर में कम्पनियों ने इसके तहत अपनी एच आर नीति में महिलाओं को जगद दी है। इसके पहले महिलाओं को मातृत्व अवकाश का प्रावधान भी दिया गया था, किन्तु इस मातृत्व अवकाश को हर कम्पनी ने अपनी एच.आर. नीति के अनुसार थोड़े बहुत फेर बदल के साथ अपने हित में ही रखा। ऐसा देखने में आया है कि निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के सामने मातृत्व काल में तरह-तरह की अघोषित शर्तें रखी जाती हैं। अक्सर उन्हें लंबे अवकाश पर चले जाने की सलाह दी जाती रही है, जबकि भारत जैसे दुनिया के तमाम देशों में महिलाओं के मातृत्व को गम्भीरता से लेते हुए लंबे समय की छुट्टी का प्रावधान किया गया है किन्तु इन प्रावधानों की भी अपनी चुनौतियां और परेशानियां हैं।
महिलाओं का घर से निकलना और कामकाज की दुनिया में एक कर्मचारी के रूप में कदम रखने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उसका प्रसव काल ही रहा है। काम के दौरान मां बनने की स्थिति में महिलाओं के सामने आने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखकर इस संबंध में कई देशों में कई तरह के कानून बनाये गये। भारत जैसे देशों में सरकार ने मातृत्व अवकाश जैसे प्रावधान किये। भारत के उच्च न्यायालयों ने अपने फैसलों में महिलाओं के इस अधिकार को स्थापित किया किन्तु इतने प्रावधानों और निर्देशों के बाद भी महिलाओं को प्रसव काल की कई दिक्कतों का सामना करना होता है। कई कम्पनियां अपनी महिला कर्मचारियों को प्रसव काल में यह सलाह देती है कि वे लम्बी छुट्ïटïी पर चली जायें। कई बार जो महिला कर्मचारी संविदा पर काम करती हैं, उन संविदा को रद्ïद कर दिया जाता है। ऐसे में यह एच.आर. पालिसी में इस तरह की विकट स्थितियां नहीं रखेंगी, इसमें शह है। महिलाओं के ऊपर भविष्य के नागरिक लाने उसको बेहतर नागरिक बनाने की एक बेहद गम्भीर और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। और इस जिम्मेदारी को निभाने मं नैतिक रूप से हमारे समाज, सरकार और इस तरह के व्यावसायिक प्रतिष्ठïानों की सकारात्मक भूमिका होनी चाहिए थी। इन सभी को मिलकर महिलाओं की इस प्राकृतिक जिम्मेदारी को सामूहिक रूप से निभाना चाहिए था ताकि महिलाओं की बौद्घिक क्षमता का भी भरपूर इस्तेमाल किया जा सके किन्तु इस सन्दर्भ में सरकारी और निजी कम्पनियों का इतिहास बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। इतिहास गवाह है कि अपने एक एक अधिकारों और शोषण के लिए पूरी दुनिया की महिलाओं को हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा है। तब जाकर वह बाहर की दुनिया में अपनी पहचान बना पायी है। उनके विकास के लिए होना तो यह चाहिए था कि उनके मातृत्व के दिनों को उनके लिए सुखद अनुभूति बनाने के लिए इस तरह उनके मानवाधिकारों का हनन ना हो। होना तो यह भी चाहिए था कि उन्हें उनके मातृत्व के लिए बेहतर सुविधायें दी जायें। बहरहाल, कम्पनी के इस प्रस्ताव के किस तरह के परिणाम सामने आयेंगे, यह आने वाला दिन बतायेगा।


बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का नया हथकंडा : सशक्तीकरण की आड़ में स्त्री को बंधुआ बनाने की साजिश


अर्थयुग में आदमी के जीवन को प्रभावित करने वाले नित नए प्रपंच रचे जा रहे हैं। इस सिलसिले में फेसबुक और एपल ने स्त्री सशक्तीकरण की आड़ में स्त्री के नैसर्गिक अधिकार-मातृत्व के अधिकार-को अपने दखल में लेने की कोशिश शुरू कर दी है। उन्होंने स्त्रियों के सामने धन और करियर में प्रगति का प्रलोभन रखकर करियर और मातृत्व के बीच चुनाव करने का सवाल पैदा कर दिया है। इस तरह की कोशिशें प्रकृति के स्वाभाविक प्रवाह में व्यवधान तो बनेंगी ही, बड़ा सवाल स्त्री सशक्तीकरण की आड़ में मानवाधिकार के हनन का भी है। इस बार सरोकार में हम इसी प्रपंच पर दो महिला लेखिकाओं का नजरिया पेश कर रहे हैं-

वन्दना मिश्र

working ladyफेसबुक ने इस वर्ष के प्रारंभ से अपनी महिला कर्मचारियों को ‘एग फ्रीजिंगÓ के लिए 20 हजार डालर तक अदा करने की योजना शुरू कर दी है। अंडों को स्टोरेज के लिए भी लगभग 500 डालर दिये जायेंगे। एपल भी अगले साल यानी जनवरी 2015 से यह योजना अपने यहां शुरू करने जा रहा है। ये कंपनियां इस कदम को महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया जाने वाला कदम बताकर अपनी पीठ खुद ठोंक रही हैं। इस घोषणा के निहितार्थ क्या है यह समझने की कोशिश करने से पहले यहां हम संक्षेप में जान लें कि एग फ्रीजिंग से तात्पर्य क्या है, यह तकनीक क्या है? डिम्ब हिमीकरण (एग फ्रीजिंग) मेडिकल साइंस की एक नई तकनीक है जिसका इस्तेमाल 1986 से शुरू हुआ। यह तकनीक उन महिलाओं के लिए उपयोगी थी जो कैंसर जैसी किसी बीमारी के परिणामस्वरूप गर्भधारण में असमर्थ हो सकती थीं। ऐसी महिलाओं के लिए यह तकनीक एक वरदान की तरह आयी, इसके तहत स्त्री के अंडाशय से अंडे निकालकर उनका हिमीकरण किया जाता है। हिमीकृत अंडे-126 सेल्सियस तापमान पर स्टोर किये जाते हैं। बाद में जब स्त्री गर्भधारण करना चाहे इन अंडों को पिघलाकर शुक्राणु के साथ संयुक्त कर उन्हें भ्रूण में बदलकर उसके गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इस प्रकार कोई स्त्री न केवल गर्भधारण में असमर्थ होने के बावजूद मां बन सकती है, बल्कि वह इस तकनीक द्वारा अपने बच्चे के जन्म को अनेक वर्षों के लिए टाल भी सकती है।
यह प्रक्रिया बहुत जटिल है और उसमें अनेक खतरे भी निहित हैं। स्त्री के डिंब में पानी ज्यादा होता है इसलिए हिमीकरण के दौरान उसके भीतर बर्फ के क्रिस्टल बन सकते हैं जिससे डिंब की नाजुक आंतरिक संरचना विकृत हो सकती है। ये क्रिस्टल उसके भीतर के क्रोमोसोम को भी प्रभावित कर सकते हैं। गर्भाशय से डिंब निकालने की प्रक्रिया भी बहुत जटिल और कष्टïदायक है। इसमें अंडाशय को ओषधियों द्वारा उत्तेजित किया जाता है ताकि अंडे अधिकतम संख्या में बाहर आ सकें। चिकित्सकों की कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा अंडे मिल सकें लेकिन महिलाओं को इस प्रक्रिया के दौरान घोर शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इस प्रक्रिया के चलते उन्हें संक्रमण, कमर, कूल्हों का दर्द जैसी अनेक शारीरिक तकलीफें भी हो सकती हैं। कृत्रिम ढंग से अंडे निकलवाने के लिए प्रयोग की गई ओषधियों का भी अंडों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इस तरह प्राप्त अंडों की संख्या प्राय: दस से बीस तक होती है।
अब देखा जाय कि इतने कष्टï सहकर, इतना पैसा खर्च कर और इतना जोखिम उठाकर एक प्रकृति विरोधी कार्य कर जो एग फ्रीजिंग करायी जाती है वह तकनीक दरअसल कितनी सफल है और उसके बारे में विशेषज्ञों की क्या राय है। अमेरिकन सोसायटी आफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि डिंब प्रशीतन (एग फ्रीजिंग) एक उत्साहित करने वाली और निरंतर बेहतर होती तकनीक है और अब इस प्रक्रिया से प्रायोगिक का लेबल हटा दिया जाना चाहिए लेकिन साथ ही उसने इस बात पर जोर दिया कि यह निर्णय इस बात की तसदीक नहीं करता कि स्वस्थ औरतें अपने डिंब भविष्य के लिए फ्रीज करायें। उसने यह भी कहा कि अभी इस समय हम बच्चों का जन्म टालने के लिए इस तकनीक के व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किये जाने का समर्थन नहीं कर सकते। इस तकनीक की मार्केटिंग स्त्रियों को झूठी उम्मीदें बंधा सकती हैं। इसी तरह ब्रिटिश फर्टिलिटी सोसायटी की सचिव डॉ. जेन स्टुअर्ट भी मानती हैं कि एग फ्रीजिंग को प्रोत्साहन देने वाला यह कदम स्त्रियों, उनके अधिकारों अथवा उनके कैरियर की दृष्टिï से कोई सकारात्मक कदम नहीं है।
अनेक अध्ययनों से भी यह बात सामने आ चुकी है कि एग फ्रीजिंग तकनीक से गर्भधारण होगा ही, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। 30 वर्ष की उम्र में इस तकनीक से गर्भधारण के 76 प्रतिशत मामले सफल नहीं रहे। 40 की उम्र में असफलता की दर 91 प्रतिशत रही।
इस तरह यह साफ है कि एग फ्रीजिंग इस बात की कतई गारंटी नहीं है कि संरक्षित अंडे से बच्चे का जन्म होगा ही। तब ये कंपनियां युवतियों को उनके नैसर्गिक अधिकार से वंचित करने का षडयंत्र क्यों कर रही हैं? इसके पीछे बाजारवाद का पूरा तंत्र हैं। महिला कर्मियों को इतनी आजादी और सुकून भरा माहौल क्यों नहीं देती जिसमें वह जब चाहे अपने बच्चे के बारे में सोच सकें, उनको कब बच्चा चाहिए इसका फैसला कर सके बिना इस बात से डरे कि इस समय बच्चा होने से उनका करियर, उनकी प्रोन्नति बाधित होगी, उन्हें यह डर न हो कि इस समय छुट्टïी लेने से कंपनी को परेशानी होगी। कंपनी को चाहिए कि वह एग फ्रीजिंग के लिए बीस हजार डालर और स्टोरेज के लिए कुछ सौ डालर देने के बजाय अपनी महिलाकर्मियों को बेहतर और लंबा मातृत्व अवकाश प्रदान करें, उनकी प्रोन्नति नियत समय पर अपने आप हो जाये ऐसी व्यवस्था करे तथा कार्यालय परिसर में ही एक बेहतरीन, हर सुविधा से लैस, बच्चों के लिए सुखद और मां को संतोष देने वाले क्रेश की व्यवस्था करें। सबसे बड़ी बात यह है कि कंपनियां स्त्रियों के कैरियर में आने वाली एक बड़ी बाधा शीशे की छत (ग्लास सीलिंग)को दूर करे जो दिखाई तो नहीं देती लेकिन स्त्रियों को करियर में बहुत ऊपर पहुंचने भी नहीं देती।
एग फ्रीजिंग में केवल कंपनी का ही निहित स्वार्थ नहीं है बल्कि यह तमाम अन्य धंधे वालों की भी बढिय़ा कमाई का जरिया बन गया है। एग फ्रीजिंग को औरतों की आजादी का प्रतीक बताने वालों में तमाम ड्रग कंपनियां, फर्टिलिटी क्लीनिक, एग बैंक, फर्टिलिटी फार्मेसी आदि शामिल हैं जो इस अत्यंत महंगी तकनीक को बेंचकर अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं। दरअसल सूचना तकनीक की इन कंपनियों में स्त्री कर्मचारियों की संख्या पुरूष कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम है। वे स्त्रियों की कार्यक्षमता, उनके काम के प्रति समर्पण और योग्यताओं को अच्छी तरह जानती है लेकिन उन्हें यह भी लगता है कि स्त्रियों के अपने परिवारिक दायित्वों तथा परिवार से लगाव के कारण उनका सर्वश्रेष्ठï अथवा उनकी संपूर्ण क्षमता का लाभ कंपनी को नहीं मिल पाता। अत: कंपनियों ने स्त्रियों की उस उम्र, जिसमें वे सबसे जयादा मेहनत कर पाती हैं या जिसे उनकी सर्वाधिक उत्पादक क्षमता वाली उम्र कहा जा सकता है, उसे अपने ही लिए आरक्षित करने के लिए इस तरह की ‘सुविधाÓ का प्रलोभन दिया है।
यहां यह प्रश्न भी उठता है कि इस योजना से क्या महिलाओं को वाकई कोई लाभ होगा? क्या मां बनने की उस आदर्श उम्र में, जो बच्चे और मां के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टिï से दुनिया भर में मान्य है मां बनकर मातृत्व को (अगर मातृत्व चाहिए, क्योंकि यह उसका अपना निजी फैसला है) भविष्य के लिए टालना, वह भी करियर के लिए बहुधा एक कभी न खत्म होने वाली दौड़ है, क्या उनके और भावी बच्चे के स्वास्थ्य तथा बच्चे के लालन पालन की दृष्टिï से यह सही फैसला होगा? क्या चिकित्सीय दृटि से अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठï समय कंपनी के व्यावसायिक हितों को समर्पित कर वे दरअसल लाभ की स्थिति में होंगी या इस मृग मरीचिका में फंसकर बाद में उन्हें पछतावा ही हाथ लगेगा? दरअसल इस तरह का प्रस्ताव स्त्रियों को एक दुविधा की स्थिति में डाल देगा क्योंकि यह स्त्री को बताता है कि यह समय दरअसल कैरियर बनाने का है, अधिक से अधिक पैसे कमाने का है, शिखर पर पहुंचने का, चांद को मु_ïी में पकड़ लेने का समय है न कि बच्चे पैदा कर, उनकी परवरिश में समय ‘बरबादÓ करने का। यहां यह भी नहीं भूलना चहिए कि अमरीका में एग फ्रीजिंग का व्यवसाय करने वाली कंपनियां एग फ्रीजिंग क्लीनिकों के जरिये इस तकनीकी के अधिक इस्तेमाल के उद्देश्य से प्रचार-प्रसार के ऐसे तमाम हथकंडे अपना रही हैं जो अब तक बाजार अपनाता रहा है। ‘इवेंटÓ आयोजित किये जाते हैं, अब आपकी बायोलाजिकल क्लाक आपके अपने नियंत्रण में जैसे आकर्षक, लुभावने नारे तैयार किये जाते हैं और एग फ्रीजिंग के दो या तीन राउंड करवाने के लिए ‘डिस्काउंटÓ (छूट) का भी आफर दिया जाता है। इन आयोजनों में यह नहीं बताया जाता कि एग फ्रीजिंग के बाद हिमीकृत अंडे से गर्भधारण होगा ही इस बात की कोई गारंटी है अथवा नहीं बाजारवाद के इस युग में बड़ी बड़ी कारपोरेट कंपनियां अपने कर्मचारियों से हफ्ते के सातों दिन, 24 घंटे काम लेती हैं। उन्हें यह भी लगता है कि स्त्रियां परिवार से अपने लगाव और परिवार की अपनी चाहत के कारण अपना सर्वश्रेष्ठï अपनी कंपनी को नहीं दे पाती। इसीलिए उनके प्रति भेदभाव का रवैया आम है। इसीलिए इन कंपनियां के कर्मचारियों में स्त्रिी-पुरूष अनुपात बेहद खराब है। पहले तो वे स्त्रियों को नौकरी देने में ही कंजूसी करती हैं फिर उन्हें फिक्र सताती हैं कि जिस उम्र में स्त्रियां स्वास्थ्य, उत्साह शारीरिक और मानसिक क्षमता आदि की दृष्टिï से सर्वाधिक चुस्त-दुरूस्त होती हैं, जिसका पूरा लाभ उनकी कंपनी को मिलना चाहिए उसी उम्र में वे विवाह कर लेती हैं, अपना परिवार बनाती हैं, मां बनती हैं। कंपनियों को लगता है कि महिलाओं का पूरा ध्यान जो कंपनी को मिलना चाहिए वह परिवार में बंट जाता है। ऐसा न हो, उनका पूरा श्रम, उनका सर्वश्रेष्ठï कंपनी को मिल सके, वे बच्चों के जन्म और उनकी परवरिश की फिक्र से मुक्त हो पूरे जी-जान से कंपनी की सेवा में लग जायें इसीलिए इस तरह की सुविधाओं का जाल। वहां इस बात की भी कोई चर्चा नहीं होती कि बच्चा चाहे सही उम्र में पैदा हो या एग फ्रीजिंग के जरिये देर से, उसके लालन-पालन के लिए मां को अवकाश तो चाहिए ही। हां, यह बात और है कि उम्र की ढलान पर बच्चों को जन्म देने वाली मां से शायद कंपनी का कोई लेना-देना नहीं रहेगा। यह बात भी विचारणीय है कि एक युवा मां अपने बच्चे का पालन-पोषण जिस उत्साह, और उछाह के साथ करती है उम्रदराज मां के लिए अपने बच्चे के लिए वह उछाह और फुर्ती जुटा पाना मुश्किल होगा। एग फ्रीजिंग का एक गंभीर पहलू यह भी है उससे जन्मे बच्चे यों तो ऊपरी तौर पर स्वस्थ लगते हैं लेकिन उनको लेकर कोई गंभीर अध्ययन अभी नहीं हुआ है और इस तकनीक से कई बार जुड़वा और तीन बच्चे एक साथ भी जन्मे हैं।
एग फ्रीजिंग की अगर मजबूरी है तब तो उसका सहारा लिया ही जाता है लेकिन एक स्वस्थ युवती के लिए अपने इच्छित मातृत्व को इस तकनीक के सहारे टालने का औचित्य इसलिए भी नहीं है क्योंकि तकनीक बच्चे का जन्म सुनिश्चित नहीं करती। कुल मिलाकर फेसबुक का यह कदम इस सोच का आईना है कि बाहर काम करना स्त्री का सहज, स्वाभाविक काम नहीं है, वह पुरुषों का काम है। अगर स्त्री बाहर काम करने आती है तो उसका मातृत्व उसके करियर में आड़े आयेगा और अपनी इसी सोच में कि स्त्री कैरियर को वरीयता दे ताकि उसका एक श्रमिक के रूप में पूरा इस्तेमाल हो सके कंपनी ने एग फ्रीजिंग जैसा प्रकृति विरोधी कदम उठाया है।

 

मातृत्व बनाम करियर : सवाल मानवाधिकार का

डा. अलका सिंह

pregnantपूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने मध्यकालीन समाज, उसके तौर तरीकों और सोच में आमूल चूल परिवर्तन किया है। इस अर्थव्यवस्था ने सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं के जीवन, उनकी सोच और रहन सहन के तरीके पर डाला है। बेहद जकड़े मध्यकालीन समाज में रह रही महिलाओं ने अपनी स्थिति को अधिकतर अपने हिसाब से बदलने में कामयाबी हासिल की है। महिलाओं के जीवन में बदलाव व इस कड़ी का अगला पड़ाव फेसबुक और एपल कम्पनियों की नयी एच आर नीति है। खबर है कि एपल और फेसबुक कम्पनियों ने अपनी सबसे तेज-तर्रार और मेहनती महिला कर्मचारियों के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि अगर महिला कर्मचारी चाहे तो वह अपने काम को बिना बाधा करने के लिए अपने डिम्ब को डिम्ब बैंक में सुरक्षित रख सकती है। जिसका खर्च कम्पनी उठायेगी। पहली नजर में कम्पनी का यह प्रस्ताव महिला कर्मचारियों के लिए एक खुशी की खबर हो सकती है क्योंकि महिलाओं, खासकर महिला कर्मचारियों, की दुनिया में मातृत्व एक बेहद चुनौती पूर्ण दौर होता है। अक्सर वे यह तय नहीं कर पाती कि वे काम को जारी रखे या मां बने। इस लिहाज से यह खबर महिलाओं को थोड़ा सुकून दे सकती है, किन्तु यदि कम्पनी की इस नीति को ध्यान से समझा और विश्लेषित किया जाये तो आने वाले दिनों में कम्पनी की इस नीति के परिणाम बहुत सकारात्मक नजर नहीं आते। इसके कई कारण है।
(1) कम्पनी की यह नीति कामकाजी महिलाओं को मां बनने के लिए एक विकल्प देती है ताकि वे अपने काम के चुनौतीपूर्ण दिनों में मां बनने की प्रक्रिया को टाल सकने का निर्णय ले सके। लेकिन आनेवाले दिनों में इस विकल्प के प्रस्ताव का प्रारूप क्या होगा, यह किसी को पता नहीं है।
(2) कम्पनी इस प्रस्ताव के दुरूपयोग के तरीके भी इख्तियार कर सकती है जो महिला कर्मचारियों के लिए आने वाले दिनों में बड़ी चुनौती बनकर उभर सकते हैं।
(3) भारत जैसे देश में छोटी कम्पनियां अपनी एच आर नीति बनायेंगी तब इस प्रस्ताव की शक्ल क्या होगी यह किसी को पता नहीं।
(4) इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने वाला बिन्दु यह है कि महिलाओं के श्रम उनके मातृत्व, उनके मां बनने के अधिकार, मातृत्व के सही समय के चुनाव और काम करने और न करने की कर्मचारी की इच्छा में कम्पनियों का अतिक्रमण होगा।
देखा जाये तो कामकाजी महिलाओं की दुनिया में मातृत्व बेहद चुनौती पूर्ण दौर होता है। अक्सर कामकाजी महिलायें यह तय नहीं कर पाती कि वे मां बनने का फैसला कब लें? कई बार महिलायें जब अपने करियर के सबसे महत्वपूर्ण दौर में होती हैं तब उनके सामने यह चुनौती आ खड़ी होती है कि काम और मां बनने की राह में किसका चुनाव करें और अक्सर उन्हें कई दबावों के नीचे आकर यह फैसला करना पड़ता है कि मां बनने को प्राथमिकता दें। इस राह में बड़ी बाधा डाक्टरों द्वारा यह बताया जाना भी है कि उम्र बढऩे के साथ मां बनने की संभावना धीरे-धीरे कम होने लगती है, ऐसे में महिलाओं के ऊपर खासा दबाव होता है कि वे अपने करियर का सबसे महत्वपूर्ण फैसला लें कि उन्हें मां बनना है । इस तरह से दोनों कम्पनियों का यह प्रस्ताव महिला कर्मचारियों के हित में नजर आता है, किन्तु कम्पनी के इस प्रस्ताव को अगर आने वाले दिनों की व्यापक एच.आर. नीति के रूप में देखा जाये तो यह महिलाओं के लिए कई अन्य चुनौतियों को जन्म देने वाला है। अगर महिलाओं के कामकाज के व्यावसायिक इतिहास और व संघर्ष पर नजर डाली जाये तो उनके श्रम और उनके घर से बाहर काम करने की मजबूरी और उनके मनोविज्ञान को कम्पनियों ने हर दौर में बहुत बारीकी से समझा और जाना है। यही वजह है कि हर दौर में कम्पनियों ने इसके तहत अपनी एच आर नीति में महिलाओं को जगद दी है। इसके पहले महिलाओं को मातृत्व अवकाश का प्रावधान भी दिया गया था, किन्तु इस मातृत्व अवकाश को हर कम्पनी ने अपनी एच.आर. नीति के अनुसार थोड़े बहुत फेर बदल के साथ अपने हित में ही रखा। ऐसा देखने में आया है कि निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के सामने मातृत्व काल में तरह-तरह की अघोषित शर्तें रखी जाती हैं। अक्सर उन्हें लंबे अवकाश पर चले जाने की सलाह दी जाती रही है, जबकि भारत जैसे दुनिया के तमाम देशों में महिलाओं के मातृत्व को गम्भीरता से लेते हुए लंबे समय की छुट्टी का प्रावधान किया गया है किन्तु इन प्रावधानों की भी अपनी चुनौतियां और परेशानियां हैं।
महिलाओं का घर से निकलना और कामकाज की दुनिया में एक कर्मचारी के रूप में कदम रखने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उसका प्रसव काल ही रहा है। काम के दौरान मां बनने की स्थिति में महिलाओं के सामने आने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखकर इस संबंध में कई देशों में कई तरह के कानून बनाये गये। भारत जैसे देशों में सरकार ने मातृत्व अवकाश जैसे प्रावधान किये। भारत के उच्च न्यायालयों ने अपने फैसलों में महिलाओं के इस अधिकार को स्थापित किया किन्तु इतने प्रावधानों और निर्देशों के बाद भी महिलाओं को प्रसव काल की कई दिक्कतों का सामना करना होता है। कई कम्पनियां अपनी महिला कर्मचारियों को प्रसव काल में यह सलाह देती है कि वे लम्बी छुट्ïटïी पर चली जायें। कई बार जो महिला कर्मचारी संविदा पर काम करती हैं, उन संविदा को रद्ïद कर दिया जाता है। ऐसे में यह एच.आर. पालिसी में इस तरह की विकट स्थितियां नहीं रखेंगी, इसमें शह है। महिलाओं के ऊपर भविष्य के नागरिक लाने उसको बेहतर नागरिक बनाने की एक बेहद गम्भीर और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। और इस जिम्मेदारी को निभाने मं नैतिक रूप से हमारे समाज, सरकार और इस तरह के व्यावसायिक प्रतिष्ठïानों की सकारात्मक भूमिका होनी चाहिए थी। इन सभी को मिलकर महिलाओं की इस प्राकृतिक जिम्मेदारी को सामूहिक रूप से निभाना चाहिए था ताकि महिलाओं की बौद्घिक क्षमता का भी भरपूर इस्तेमाल किया जा सके किन्तु इस सन्दर्भ में सरकारी और निजी कम्पनियों का इतिहास बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। इतिहास गवाह है कि अपने एक एक अधिकारों और शोषण के लिए पूरी दुनिया की महिलाओं को हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा है। तब जाकर वह बाहर की दुनिया में अपनी पहचान बना पायी है। उनके विकास के लिए होना तो यह चाहिए था कि उनके मातृत्व के दिनों को उनके लिए सुखद अनुभूति बनाने के लिए इस तरह उनके मानवाधिकारों का हनन ना हो। होना तो यह भी चाहिए था कि उन्हें उनके मातृत्व के लिए बेहतर सुविधायें दी जायें। बहरहाल, कम्पनी के इस प्रस्ताव के किस तरह के परिणाम सामने आयेंगे, यह आने वाला दिन बतायेगा।


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