फिल्मों की दुनिया: जानें कहां गये वो दिन


इक्कीसवीं शताब्दी में एक बिलकुल नया बालीवुड उभरकर सामने आया है। हिन्दी फिल्मों की कथावस्तु, शैली, शिल्प और तकनीक तो बदली ही है, उनके अर्थशास्त्र में भी बड़ा बदलाव आया है। फिल्मों का बाजार देश की सीमाएं फलांग कर दूसरे देशों तक पहुंच गया है। साथ ही साथ फिल्म देखने और उनका मजा लेने के तरीकों में बड़ा बदलाव आया है।
filmइस शताब्दी के डेढ़ दशक में हमारी दुनिया बहुत बदल गयी है। फिल्मे भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही है। फिल्मों का बाजार, उनकी तकनीक, कथावस्तु, शिल्प और पहुंच सभी में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलता है। फिल्मों का पुराना जमाना समय के सफर में कहीं बहुत पीछे छूट गया है। आज फिल्मों की सफलता-असफलता हफ्तों में हीं नापी जाती। बाक्स आफिस पुराने वक्तों में भी अहमियत रखता था, लेकिन अब फिल्मों की सफलता करोड़ों के पैमाने पर आंकी जाती है। इस बात की चर्चा कम होती है कि फिल्म कैसी है, चर्चा इस बात की ज्यादा होती है कि फिल्म ने पहले दिन या पहले हफ्ते में बाक्स आफिस पर कितने करोड़ बटोरे और पिछली कमाई का रिकार्ड तोड़ पायी या नहीं। इस आपा-धापी के बीच अनेक फिल्में कब लगीं और कब उतर गयीं, यह पता ही नहीं चलता। मोटी कमाई करने वाली फिल्में भी रजत पट पर दीर्घजीवी नहीं होती। कई बार ऐसा होता है कि जब तक आप कोई फिल्म देखने का मूड बनायें और सुविधा तताशें तब तक वह सिनेमा हालों से गायब हो चुकी होती है। यह जमाना जुबलियों और जुबली कुमारों का नहीं, विशुद्घ बिजनेस और सुपर स्टारों का है। पहले जहां फिल्मों का बजट लाखों में होता था, वहीं अब फिल्मों की लागत करोड़ों में आती है। दिलीप कुमार-मधुबाला की प्रमुख भूमिकाओं वाली के आसिफ की मशहूर फिल्म मुगले आजम ही शायद करोड़ की लागत वाली पहली बम्बईया फिल्म थी। तब इस बात की चर्चा खूब हुई थी। यही फिल्म की यूएसपी भी बन गयी थी। इस फिल्म ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये थे। उस जमाने में फिल्मों की सफलता 25 हफ्तों की सिल्वर जुबिली, 50 हफ्तों की गोल्डन जुबिली और 75 हफ्तों की डायमंड जुबिली से आंकी जाती थी। वह जमाना सिंगल स्क्रीन थियेटर का था और कुछ फिल्में तो साल-दर-साल सिनेमाघरों में चलती रहती थीं। मुगले आजम, शोले, हम आपके हैं कौन आदि इसी दर्जे की फिल्में थीं। बम्बई (आज की मुम्बई) का सिनेमा घर मराठा मन्दिर इस मामले में चैंपियन हुआ करता था।
उस दौर में फिल्म देखना एक ‘एक्सक्लयूसिवÓ गतिविधि हुआ करती थी। मल्टीप्लेक्स और सिनेप्लेक्स के इस जमाने में फिल्म देखने के साथ विंडो शापिंग और फूड कोर्ट का दौरा भी जुड़ गया है। उदारीकरण और मध्य वर्ग के उभार में फिल्म देखना मनोरंजन का सस्ता और सुलभ साधन न रहकर विलासिता हो गया है। जो बड़े पर्दे पर फिल्म देखने की विलासिता ‘अफोर्डÓ नहीं कर सकते, उनके नसीब में घर का कमरा और टीवी का छोटा पर्दा ही रह गये हैं। प्रौद्योगिकी के प्रसार ने आम आदमी को घर बैठे सस्ता मनोरंजन सुलभ जरूर करा दिया है, लेकिन पड़े पर्दे पर फिल्म देखने का रोमांच और थ्रिल उससे छीन लिया है। सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघरों के दौर में फिल्में ही मनोरंजन का एक मात्र सस्ता और सुलभ साधन हुआ करती थी। टीवी था नहीं और महानगरों (जो अब मेट्रो कहलाने लगे हैं) के अलावा अन्यत्र नाट्यशालाओं का होना सोचा भी नहीं जा सकता था। कैशोर्य का पाला फलांगकर यौवन की दहलीज छूते हुए फिल्मों के लिए दीवानगी चरम पर होती थी। कभी-कभी तो हालत यह होती थी कि अखबार देखने पर पता चलता कि शहर में चल रही सभी फिल्में देखी हुई हैं। ऐसे में मित्र मंडली में बहस चलती कि कौन सी फिल्म दुबारा या तिबारा देखी जा सकती है। इस तरह फिल्मों का सिनेमाघरों में लंबे समय तक टिके रहना जैसे एक वरदान ही हुआ करता था। फिल्म प्रदर्शन में यूएफओ के आने, फिल्मों के डिजिटल हो जाने तथा ‘रीलÓ और प्रोजेक्टर की विदाई के साथ-साथ ‘रि-रनÓ में फिल्म देखने के आनन्द की भी विदाई हो गयी है। कभी कोई फिल्म किसी वजह से ‘मिसÓ हो जाय या बहुत पसंद आने के बावजूद उसे दुबारा न देखा जा सका हो तो यह उम्मीद बनी रहती थी कि वह कुछ दिन बाद किसी न किसी सिनेमाघरों में दुबारा लगेगी और उसे देखा जा सकेगा, वह भी घटी दर पर। शहर के कुछ सिनेमाघर तो सिर्फ पुरानी फिल्में ही चलाते थे और अच्छी कमाई कर लेते थे। कभी-कभी तो ‘रि-रनÓ में चलने पर फिल्म का नसीब भी पलट जाता था। स्वर्गीय शैलेन्द्र और राजकपूर- वहीदा रहमान अभिनीत राष्टï्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘तीसरी कसमÓ एक ऐसी ही फिल्म थी। स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु की कथाकृति पर बनी यह फिल्म पहली बार प्रदर्शित होने पर बुरी तरह फ्लाप हुई थी। गीतकार शैलेन्द्र आर्थिक रूप से तबाह हो गये थे और अपने तरीके से अपनी मनपसंद फिल्म बनाने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। ‘तीसरी कसमÓ को समीक्षकों की प्रशंसा तो भरपूर मिली, लेकिन दर्शक नहीं मिले थे। लेकिन यही फिल्म शैलेन्द्र की मृत्यु के बाद जब ‘रि-रनÓ में लगी तब सिनेमाघर दर्शकों से भर गये। ‘रि-रनÓ का वह अवसर अब न दर्शकों को उपलब्ध है, न फिल्मों को।
फिल्मों में बड़ा बदलाव प्रेम दृश्यों के फिल्मांकन में आया है। उस जमाने में चुंबन दृश्य पर्दे पर नहीं, दर्शक की कल्पना में घटित होते थे। हवा में झूमते दो फूलों का एक दूसरे को छू लेना, नायिका के आंचल का तेज हवा के झोंके से उड़कर नायक-नायिका के सिरों पर लिपट जाना, दीपक की लौ का मंद पड़ते-पड़ते बुझ जाना या बिजली कड़कने के साथ नायिका का नायक से बरबस लिपटना और इसके साथ ही घुप अंधेरा हो जाना, यह बता दिया करते थे कि चुंबन और साथ में बहुत कुछ और भी घटित हो गया। इन दृश्यों के जरिए निर्देशक दर्शकों की कल्पना के घोड़ों को जिस दिशा में चाहें, जिस रफ्तार से चाहें, दौडऩे की आजादी दे देता था। लेकिन आज ‘इंटीमेटÓ सीन और चुम्बन बेहिचक घटित होते न केवल देख सकते हैं, बल्कि चुमकार की चटखार सुन भी सकते हैं। अब पहले की तरह दर्शक प्रेम दृश्यों की परछाई मन की अलगनी पर टांगे हुए थियेटर से बाहर नहीं निकलते। सब थियेटर में ही छूट जाता है। फिल्मों की बदली हुई दुनिया पर बात करते जायें तो वह बहुत लंबी खिंच जायेगी, लेकिन फिलहाल इतना ही। शेष फिर कभी।


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