चौपाल चर्चा ब्यूरो
सहारा इण्डिया परिवार के चेयरमैन सुब्रत राय सहारा पिछले 4 मार्च से न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में हैं और पता नहीं अभी और कितने दिन वहां रहेंगे। इस बीच उनकी हिरासत को लेकर कुछ कानूनी सवाल उठने लगे हैं। उधर, सिक्योरिटीज एण्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इण्डिया (सेबी) ने सहारा ग्रुप की दो कम्पनियों के निवेशकों से कहा था कि वह 30 सितंबर तक अपना पैसा वापस लेने के लिए सप्रमाण आवेदन करें इसके जवाब में कुल 4600 निवेशकों ने ही पैसा वापसी के लिए दावा पेश किए हैं और इन दावों की रकम दस हजार करोड़ की उस राशि से कम होने की उम्मीद है, जिसे सेबी के पास जमा करने की शर्त सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की रिहाई के लिए रखी है।
सुब्रत राय सहारा को किस जुर्म के लिए न्यायिक हिरासत में रखा जा रहा है, इसको लेकर कानूनविदों के बीच अजीब ऊहापोह की स्थिति है। सहारा को अगर न्यायालय की अवमानना के लिए जेल भेजा गया है तो वह इसके लिए निर्धारित अधिकतम सजा 6 माह के कारावास से अधिक समय जेल में गुजार चुके हैं। (सुब्रत राय अपनी मां की बीमारी की दलील पर नियत तिथि पर कोर्ट में हाजिर नहीं हुए थे)। जहां तक दस हजार करोड़ रुपए न चुका पाने की बात है तो वह जमानत राशि नहीं है। उन्हें करीब पांच महीने पहले ही जमानत दे दी गयी थी। लेकिन इस शर्त पर कि वह रिहाई के लिए दस हजार करोड़ की राशि सेबी के पास जमा करें। न्यायविद्ïों का मानना है कि यह एक अति असामान्य शर्त है। ऐसा नहीं कि सुब्रत राय यह शर्त मानने को तैयार नहीं हैं। पैसा जुटाने के लिए उन्होंने इंग्लैण्ड और अमेरिका के अपने तीन होटल बेचने की कोशिश की, मगर कामयाबी नहीं मिली। दरअसल, यह सभी जानते हैं कि वह एक विकट फंदे में फंसे हैं और इससे निकलने के लिए उन्हें होटलों को बेचना ही होगा। ऐसे में भला कौन खरीददार औने-पौने दाम न लगायेगा?
ये होटल सहारा समूह की मूल्यवान सम्पत्तियां हैं और सहारा के लिए इन्हें औने-पौने बेचना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। सुब्रत राय और उनके दो निदेशक अशोक राय चौधरी और आर.एस. दुबे जिस कानूनी मकडज़ाल में उलझ गये हैं उसकी नजीरें मिलनी मुश्किल हैं। कुछ कानूनविद्ïों का मानना है कि सुब्रत राय सहारा के मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है जो यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून सम्मत प्रक्रिया से इतर उसके जीवन या वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन फिलहाल तो यही लगता है कि सुब्रत राय सहारा और उनके साथी निदेशक दस हजार करोड़ की रकम दिये बिना जेल से बाहर न आ पायेंगे। पेंच यह है कि रकम जुटाने की उनकी कोशिशें तमाम कवायद के बावजूद कामयाब होती नहीं नजर आ रहीं। उधर, सेबी के बुलावे पर करीब 4600 निवेशक ही सहारा ग्रुप की दो कम्पनियों-सहारा इण्डिया रियल इस्टेट कारपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन से अपना निवेश वापस लेने के लिए सामने आये हैं। जानकार सूत्रों के मुताबिक प्रत्येक बांडधारक निवेशक की औसत मांग लगभग 20 हजार रुपये ही है। यानि कुल रकम दस हजार करोड़ से कम ही होगी।
उल्लेखनीय है कि सहारा ग्रुप यह दावा करता रहा है कि उन्होंने उपरोक्त दोनों कम्पनियों के बांडधारकों में से अधिकांश का पैसा पहले ही वापस कर दिया है। सेबी के पास जो दावे आये हैं उससे ग्रुप का यह दावा मजबूत होगा। सहारा गु्रप और सेबी के बीच पिछले कई साल से यह विवाद चलता रहा है कि सहारा ग्रुप की इन कम्पनियों ने करीब तीन करोड़ निवेशकों से अनियमित तरीके से 24 हजार करोड़ की रकम बजरिये बांड जुटाई। सहारा ग्रुप का कहना है कि उन्होंने 90 फीसदी से ज्यादा देय राशि का भुगतान निवेशकों को सीधे कर दिया है और उनके द्वारा अब सिर्फ 2500 करोड़ की रकम ही देय है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सहारा ग्रुप 5,120 करोड़ और 3,100 करोड़ की राशि दिसंबर 2012 और जून 2014 को सेबी के पास जमा कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक दस हजार करोड़़ की रकम का पेंच अभी भी फंसा हुआ है। रकम जुटाने की जी-तोड़ कोशिशों का कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है और इसीलिए यह सवाल हवा में झूल रहा है कि शानदार जिंदगी जीने के कायल सुब्रत राय सहारा तिहाड़ जेल से कब बाहर आ पायेंगे।
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