क्षेत्रीय क्षत्रपों को डरा रहा मोदी का हौव्वा: वजूद बचायें या पहचान


इस साल के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिली अभूतपूर्व सफलता और कांग्रेस के देश की राजनीति में अप्रासंगिक हो जाने से क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने अस्तित्व का गंभीर संकट पैदा हो गया है। एक के बाद एक राज्यों में भाजपा के पांव पसारते जाने से उनमें घबराहट और बेचैनी होना स्वाभाविक है। वे जानते हैं कि अलग-अलग रहकर अकेले अपने बलबूते नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपाई आंधी को झेल पाना उनके लिए नामुमकिन होगा। इसीलिए क्षेत्रीय पार्टियों के बिखराव को समेटने और एक तंबू के नीचे एकत्र करने के प्रयास शुरू हो गये हैं। बड़ी गांठ बांधकर भाजपा के मुकाबले एक मजबूत राजनीतिक विकल्प गढऩे की जिम्मेवारी मुलायम सिंह यादव के कंधों पर डाल दी गयी है। यह जिम्मेवारी चुनौतियों से भरी हुई है। भाजपा विरोधी विकल्प का सपना सच करने के लिए क्षत्रपों को अपना अहम तो ताक पर रखना ही होगा, साथ ही स्वार्थों और अपनी पहचान की कुर्बानी देने के लिए भी तैयार रहना होगा। प्रस्तुत है महागठबंधन की संभावनाओं और संकटों पर कुमार आशीष का बेबाक नजरिया-
महागठबंधन की बेदी पर किसकी चढ़ेगी बलि
cover cortoonजनता परिवार अब फिर से एकजुट होने जा रहा है, किसी मोर्चा के रूप में नहीं, यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा, तो एक दल के रूप में। ऐसे में अहम सवाल है कि अगर एक नये राजनीतिक दल का निर्माण होता है तो उसमें किसका कितना योगदान होगा। क्या मुलायम सिंह बड़ी मशक्कत से बनायी समाजवादी पार्टी को नये दल की नींव की ईंट बना देंगे? क्या शरद यादव और नीतीश कुमार जनता दल (यू) को हंसते-हंसते कुर्बान कर पायेंगे? सपा और जदयू के अलावा नये दल में शामिल होने वाले दलों की स्थिति डावांडोल है और उनका कुछ खास दांव पर नहीं लगा। ऐसे में बड़ा सवाल है कि नये दल की बलिवेदी पर सबसे बड़ी कुर्बानी कौन देगा?
देश की राजनीति में मौजूदा दौर में तीन बातें साफ नजर आती हैं। पहली यह कि आज भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है। दूसरी यह कि सवा सौ साल से ज्यादा पुरानी पार्टी कांग्रेस का जनाधार तेजी से सिकुड़ रहा है। तीसरी और अंतिम यह कि क्षेत्रीय दल अपनी साझा शक्ति से ही भाजपा का सामना कर सकते हैं। शायद इसी सत्य को पहचान कर समाजवादी पार्टी, जनता दल (यू), जनता दल (सेक्युलर), इंडियन नेशनल लोकदल, राष्टï्रीय जनता दल जैसे क्षत्रपों ने हाथ मिलाकर एक दल बनाने का संकल्प लिया है। पर यक्ष प्रश्न यह है कि अपना वजूद, अहंकार, सत्ता की भूख, परिवारवाद की राजनीति और तमाम निजी स्वार्थ त्यागकर एक नये झंण्डे के नीचे क्या ये इकट्ठे हो पाएंगे? असल में मोदी का डर और अपनी राजनीति को बचाने की जद्दोजहद इन दलों की एकता का पहला कारण है। दूसरा कारण यह है कि अगर इन दलों को अपने-अपने राज्यों में अपनी राजनीति को बचाना है, तो कें्रद्रीय राजनीति में भी तो कुछ न कुृछ करते दिखना पड़ेगा। आखिर, केंद्र की राजनीति का राज्यों की राजनीति पर असर पड़ता ही है। केन्द्र भी राज्यों की राजनीति से प्रभावित होता है। यह वह तथ्य है, जिससे ये सभी नेता भली-भांति परिचित हैं। अत: मोदी सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ करते दिखना इनकी राजनीतिक जरूरत और मजबूरी, दोनों हैं।
आज स्थिति विकट है। भाजपा के वेग और मोदी के प्रचारतंत्र का सामना करने के लिए कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी जैसा कोई सयाना और सशक्त नेता नहीं है। क्षेत्रीय दलों को भी चरण सिंह, देवीलाल, कर्पूरी ठाकुर, एनटी रामाराव जैसे कद्दावर नेताओं की कमी खल रही है। उसमें से अधिकतर कभी न कभी इन दोनों राष्टï्रीय दलों की छत्रछाया में सत्ता-सुख भोग चुकी हैं। इस पहल में दो नई बातें हैं। पहली यह कि वामदल इसमें शामिल नहीं है और दूसरी मोर्चे से उठकर एक पार्टी बनाने की हो रही है।
फिलहाल जो पार्टियां भाजपा के विरोध में एक गैर-कांग्रेस मंच तैयार करने में जुटी हैं, उसमें एक समानता है। सभी समाजवादी विचारधारा की कोख से जनमी हैं और कभी एकीकृत जनता दल परिवार का हिस्सा थीं। लेकिन बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस को साथ लिए बिना इस तीसरे मोर्चे को सम्मानजनक स्थान मिलना कठिन है। दक्षिण भारत से द्रमुक या अन्नाद्रमुक और तेलंगाना राष्टï्र समिति का सहयोग भी उनकी रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। नीतियों के आधार पर वाम मोर्चा उन्हें बाहर से समर्थन दे सकता है, लेकिन यह सारी कसरत विरोधाभासों से भरी है। भाजपा और कांग्रेस का विरोध करने वाली कई पार्टियां अपने इलाके में एक-दूसरे की जानी दुश्मन रही हैं। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का रिश्ता सांप-नेवले जैसा है। बिहार में राजद और जनता दल (यू) ने बरसों एक-दूसरे को जम कर कोसा है। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और द्रमुक की दोस्ती की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा और तृणमूल की रंजिश भी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में इन सब पार्टियों के साझा मोर्चा बनाने के प्रयास पर मौकापरस्ती का लेबल चस्पा करना आसान हो जाता है।
जनता दल के साझा इतिहास के अलावा इन नेताओं के लिए वर्तमान भी साझा है। इनके शासन वाले राज्यों में भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में बहुत प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। हालांकि मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार की पार्टियों की अपने-अपने राज्य में सरकार है, लेकिन लोकसभा चुनाव में इन्हें गिनती की सीटें मिली थीं। एचडी देवगौड़ा कर्नाटक के बहुत अनुभवी जमीनी नेता होने के बावजूद अपने राज्य में लगभग अप्रासंगिक हो गये हैं। बिहार में इसी परिस्थिति ने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव जैसे धुर विरोधी नेताओं को साथ ला दिया। यह प्रयोग इस मायने में सफल रहा कि जनता दल (यू) की सरकार भी राज्य में बनी रही और उपचुनावों में इस सहयोग की वजह से अच्छे नतीजे आए। चाहे उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी हो या बिहार की जनता दल (यू) और राष्टï्रीय जनता दल या कर्नाटक की जनता दल (सेक्युलर) येे सभी पार्टियां जनता दल से ही निकली हैं। अगर वे एक हो जाती हैं तो इन पार्टियों के नेताओं की यह घर वापसी होगी। मगर यह इतना आसान नहीं है, न ही जल्दी होने वाला है। इन नेताओं ने तय किया है कि अब से संसद में उनकी पार्टियां एक समूह की तरह काम करेंगी। लोकसभा में तो इन पार्टियों के सांसदों की कुल तादाद 15 है और उनका बहुत असर नहीं होगा, लेकिन राज्यसभा में इनके कुल मिलाकर 25 सांसद हो जाते हैं। राज्यसभा में भाजपा को बहुमत हासिल नहीं है, इसलिए ये 25 सांसद काफी प्रभावशाली हो सकते हैं।
असल में ये पाटियां अपने-अपने राज्य तक सिमटी हुई हैं, इसलिए एक-दूसरे के राज्य में इनका कोई स्वार्थ नहीं है। ये सभी एक नेता के इर्द-गिर्द बनी हुई पार्टियां हैं और राष्टï्रीय राजनीति में इनके हित जरूर टकराते थे। फिलहाल राष्टï्रीय महत्वाकांक्षा से ज्यादा इन्हें अपना वजूद व प्रभाव बनाये रखने की फिक्र है, इसलिए ये साथ आ सकते हैं। फिर गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इनता खराब रहा है कि वह भाजपा विरोधी दूसरे गठबंधन की धुरी बनने की हालत में भी नहीं है। तीसरा मोर्चा खड़ा करने की तमाम पूर्व कोशिशें नाकाम रही हैं। इसलिए ऐसी कवायद आसानी से भरोसा नहीं जगा सकती। सत्ता के लिए चंद नेताओं के हाथ मिला लेने मात्र से अलग-अलग पार्टियों के लाखों कार्यकर्ताओं के मन नहीं मिल जाते। 1977 में इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ संघटन कांग्रेस, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ और भारतीय लोकदल विलय कर जनता पार्टी बनायी गयी, लेकिन ढाई बरस के भीतर यह प्रयोग विफल हो गया। इस गठबंधन के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि मुलायम सिंह यादव और देवेगौड़ा पर भरोसा करना दूसरों के लिए मुश्किल है। दोनों को अपने परिवार से बाहर कोई राजनीतिक प्रतिभा नहीं दिखती, दोनों वादाखिलाफी के लिए भी जाने जाते हैं। मुलायम सिंह ने वाम मोर्चा को ही नहीं, राष्टï्रपति चुनाव के मौके पर ममता बनर्जी को दांव दिया था। देवेगौड़ा तो उस बीजेपी को ही धोखा दे चुके हैं, जिसके सहयोग से राज्य में उनके बेटे की सरकार चली। नीतीश कुमार तो पूरे 17 साल तक बीजेपी के साथी रहे हैं। वहीं नवीन पटनायक पूरे पांच साल तक भाजपा के साथ न सिर्फ राज्य, बल्कि केंद्र की सरकार में सहयोगी रहे हैं। लिहाजा गठबंधन के सामने मौजूद भरोसे के संकट को कम करके नहीं आंका जा सकता।
मौजूदा दौर में भाजपा को गठबंधन की जरूरत नहीं है। और कांग्रेस के पास ताकत नहीं है। भाजपा की महत्वाकांक्षा भी छोटी पार्टियों पर अपनी निर्भरता कम करने की है। ऐसे में, भाजपा के खिलाफ विपक्ष की जगह खाली है। ऐसी राजनीति में कई सवाल खड़े होते हैं और कई दिलचस्प संभावनाएं भी हैं। तीसरे मोर्चे के अनुभव अब तक जैसे भी रहे हों, लेकिन इन नेताओं का अपने-अपने राज्यों में जनाधार तो है ही, इसलिए साथ आने का उनका यह प्रयोग अगर चला तो दिलचस्प हो सकता है। यह एक तथ्य है कि लालू प्रसाद यादव का बिहार और मुलायम सिंह यादव का उत्तर प्रदेश में व्यापक जनाधार है। तथ्य यह भी है कि लालू का उत्तर प्रदेश व मुलायम सिंह का बिहार में बिलकुल भी जनाधार नहीं है। इसलिए इस वक्त का सच तो यही है कि संभावित नई पार्टी देश को तीसरा राजनीतिक विकल्प नहीं दे सकती है। भाजपा और कांग्रेस ही एक-दूसरे के राजनीतिक विकल्प बने रहेंगे। फिलहाल देश की जनता पर नरेन्द्र मोदी का असर सभी दलों के राजनीतिक अस्तित्व पर खतरा बनकर मंडरा रहा है। इसलिए निकट भविष्य में यह संभव है कि हम सभी गैर कांग्रेस, गैर भाजपा दलों को एक मंच पर देखें। मगर, फिलहाल इसकी कोई सूरत नहीं दिखती है। अभी यह बात कल्पना से बाहर की चीज है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक मंच पर आ जायेंगे, तमिलनाडु में दो धुर विरोधी जयललिता और करूणानिधि एक साथ होंगे या फिर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और वामदलों में एका हो जाएगा। हां, जब तक एक होता नहीं है, इनकी एकजुटता का भी कोई मतलब नहीं है। भाजपा की महत्वाकांक्षा भारत पर अकेले राज करने की है। इस अभियान की सफलता के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार को फतह करना और बंगाल, तमिलनाडु और केरल में पैर पसारना जरूरी है। तभी भगवा दल को राज्यसभा में भी स्पष्टï बहुमत मिल पाएगा। वैसे अगले साल बिहार, 2016 में पश्चिम बंगाल और 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा की भावी सफलता का अर्थ क्षेत्रीय दलों का देश के राजनीतिक नक्शे से साफ हो जाना होगा। इसीलिए इस बार उनका महागठबंधन करो या मरो की रणनीति पर टिकेगा। महागठबंधन और नये दल का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि महागठबंधन में शामिल दल और उनके नेता कितनी कुर्बानी देंगे।


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