नई दिल्ली : बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय ने आज अपना राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने का ऐलान किया। राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने वाली कला एवं साहित्य जगत की 24 हस्तियों में अब कुंदन शाह, अरूंधति रॉय और सईद मिर्जा भी शामिल हो गए हैं।
अरुधति राय को 1989 में फिल्म ‘इन विच एन्नी गिव्स इट दोज वन्स’ (In Which Annie Gives It Those Ones) के लिए बेस्ट स्क्रीनप्ले का नेशनल अवॉर्ड मिला था।
राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ बनाने वाले कुंदन शाह ने कहा कि आज के माहौल में नेशनल फिल्म अवार्ड जीतने वाली ‘जाने भी दो यारों’ बनाना नामुमकिन है। एक अंधकार-सा बढ़ता जा रहा है, और इससे पहले कि इस अंधकार की स्याही पूरे देश में छा जाए, हमें आवाज़ बुलंद करनी होगी। यह कांग्रेस या बीजेपी की बात नहीं, क्योंकि हमारे लिए दोनों एक जैसे हैं। मेरा सीरियल ‘पुलिस स्टेशन’ कांग्रेस ने बैन किया था।
वहीं, ‘अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ के निर्देशक सईद मिर्ज़ा ने भी असहिष्णुता के खिलाफ अपना अवार्ड वापस करने का ऐलान किया है। सईद मिर्ज़ा को ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’ और ‘नसीम’ फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गौरतलब है कि इन दोनों दिग्गजों से पहले दीपांकर बनर्जी, निष्ठा जैन तथा आनंद पटवर्धन समेत 11 अन्य फिल्मकार भी अपने अवार्ड वापस कर चुके हैं।
उधर, अरुंधति ने कहा कि पूरी जनता, लाखों दलित, आदिवासी, मुस्लिम और ईसाई आतंक में जीने को मजबूर हैं। उन्हें हमेशा यह डर रहता है कि न जाने कब-कहां से हमला हो जाए। उन्होंने कहा कि असहिष्णुता के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन में जुड़ने में वो फक्र महसूस करती हैं। बीफ बैन, अल्पसंख्यकों पर हमले और साहित्यकारों की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है, जो कि बेहद शर्मनाक है।
रॉय ने कहा कि उन्हें खुशी है कि वो राष्ट्रीय पुरस्कार लौटा कर साहित्यकारों, शिक्षाविदों के साथ जुड़ गई हैं, जो मौजूदा सरकार की चुप्पी का खुला विरोध कर रहे हैं। साहित्यकारों का विरोध ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। पुरस्कार लौटाने को लोग राजनीति से प्रेरित मान सकते हैं, लेकिन उनको अपने आप पर फक्र है। अरुंधति ने कहा कि उन्होंने 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटा दिया था. जब कांग्रेस सत्ता में थी।
गौरतलब है कि अरुंधति रॉय को ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ के लिए बुकर पुरस्कार से नवाजा गया था और 1989 में ‘इन विच एन्नी गिव्स इट दोज वन्स’ के लिए बेस्ट स्क्रीनप्ले का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। उन्होंने एक लेख लिखकर अवॉर्ड लौटाने के कारण बताए।
उनका यह लेख – मैं अवॉर्ड क्यों लौटा रही हूं – यहां पढ़ें।
हालांकि, मैं नहीं मानती कि कोई अवॉर्ड हमारे काम को आंकने का सही पैमाना है। मैं लौटाए गए अवॉर्ड्स की सूची में 1989 में प्राप्त नेशनल अवॉर्ड (बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए) को भी शामिल करती हूं। मैं यह साफ कर देना चाहती हूं कि मैं यह अवॉर्ड इसलिए नहीं लौटा रही, क्योंकि मैं उस बात से आहत हूं जिसे ‘बढ़ती कट्टरता’ कहा जा रहा है और जिसके लिए मौजूदा सरकार को जिम्मेदार बताया जा रहा है।
सबसे पहले तो पीट कर हत्या करने, जला कर मारने, गोली से उड़ा देने या नरसंहार के लिए ‘असहिष्णुता’ (इनटोलरेंस) सही शब्द ही नहीं है। दूसरी बात, हमारे पास पहले से इस बात के पर्याप्त संकेत होते हैं कि आगे क्या होने वाला है। इसलिए मैं यह नहीं कह सकती कि इस सरकार के भारी मतों से सत्ता में आने के बाद जो कुछ हो रहा है उसे देख कर मैं हैरान-परेशान हूं।
तीसरी बात, ये खौफनाक हत्याएं आगे की और बदतर स्थिति के लक्षण मात्र हैं। जिंदगी जीने लायक नहीं रह गई है। पूरी आबादी – करोड़ों दलित, आदिवासी, मुसलमान और ईसाई – खौफ में जीने के लिए मजबूर हैं। कब और कहां से हमला हो जाए, कुछ पता नहीं। आज हम ऐसे देश में रह रहे हैं जहां अगर ‘गैरकानूनी हत्या’ की बात करें तो वे समझते हैं कि किसी गाय की हत्या कर दी गई है, न कि किसी इंसान की। जब वे घटनास्थल से ‘फोरेंसिक जांच के लिए सबूत जुटाने’ की बात करते हैं तो इसका मतलब फ्रिज में रखा खाना होता है। पीट-पीट कर मार दिए गए शख्स की लाश नहीं।
हम कहते हैं कि हम बहुत आगे बढ़ गए हैं। लेकिन जब दलितों की हत्या की जाती है और उनके बच्चे जिंदा जला दिए जाते हैं तो कौन लेखक ऐसा है जो मार या जला दिए जाने के डर से मुक्त होकर बाबासाहेब अंबेडकर की तरह खुल कर कह सके, ‘अछूतों के लिए हिंदुत्व आतंक का घर है’? कौन लेखक आज वे बातें लिख सकता है जो सआदत हसन मंटो ने ‘लेटर्स टु अंकल सैम’ में लिखा? इस बात का कोई मतलब नहीं है कि जो कहा जा रहा है, हम उससे सहमत हैं या अहसमत। अगर हमें बेखौफ होकर बोलने की ही आजादी नहीं है तो हम उस समाज में लौट जाएंगे जो बौद्धिक रूप से दिवालिया होता है।
मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि मुझे कभी एक नेशनल अवॉर्ड मिला, जिसे मैं लौटा सकती हूं। यह मुझे उस राजनीतिक मुहिम का हिस्सा बनने का मौका दे रहा है जो लेखकों, फिल्मकारों और शिक्षाविदों ने शुरू की है। वे सैद्धांतिक शून्यता और सामूहिक बौद्धिकता पर हो रहे हमले के खिलाफ खड़े हुए हैं। अगर हम इसके खिलाफ अभी खड़े नहीं हुए तो यह हमें खंड-खंड कर देगा और पाताल में धंसा देगा।
मेरा मानना है कि कलाकार और बुद्धिजीवी लोग जो कर रहे हैं, आज की स्थिति में वह अपरिहार्य और अद्वितीय है। कुछ लोग इसे राजनीति भी मान रहे हैं। मुझे इसका हिस्सा बनने में काफी गर्व हो रहा है। इस देश में आज जो कुछ भी हो रहा है, उससे मैं शर्मिंदा हूं। जानकारी के लिए मैं यह भी बता दूं कि 2005 में जब कांग्रेस सरकार में थी, तब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी ठुकरा दिया था। इसलिए मुझे कृपा करके कांग्रेस बनाम भाजपा की पुरानी बहस में मत घसीटें। बात इस सबसे काफी आगे निकल चुकी है।
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