विद्युत सुरक्षा निदेशालय में विद्युत अधिनियम 1956 के नियम 63 की उड़ रही धज्जियाॅ


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लखनऊ,। प्रदेश में भाजपा की जीरो टारलेस प्राथमिकता वाली भाजपा की सरकार है लेकिन इस सरकार में भी सपा के खास रहे कार्यवाहक निदेशक जमकर मनमानी कर विद्युत अधिनियम की धज्जिया उड़ा रहे है। लगभग पाॅच वर्ष पूर्व एक महत्वपूर्ण सरकार की योजना के तहत गांवों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए ,दीन दयाल उपाध्याय ज्योति ग्राम योजना, राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना लागू हुई। इस योजना को धरातल में लाने के लिए विद्युत सुरक्षा निदेशालय महत्वपूर्ण कड़ी थी इसके कारण इस योजना को फलीभूत करने में विद्युत सुरक्षा निदेशालय की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन विद्युत सुरक्षा निदेशालय के कार्यवाहक निदेशक ने जिन गांवों को ऊर्जीकृत कराने के लिए जो हजारों एनओसी जारी कर दी है अगर उसकी जाॅच करा दी जाए तो सरकार को पता चल जाएगा कि कार्यवाहक निदेशक ने अपने पद का कितना दुरूपयोग किया। जिन गाॅवों में विद्युतकरण होना था उनकी जाॅच कितने मनमाने तरीके से की गई कि एक ही दिन में घर पर बैठे बैठे दस-दस गाॅवों की एनओसी दे दी गई। इस पर दावाॅ करने वाले यहाॅ तक दावा करते है कि विद्युतीकरण के लिए काम कर रही कार्यदायी संस्थाओं से बेहतर लेनदेन के चलते उक्त एनओसी बिना निरीक्षण परीक्षण के कार्यालय से ही उपलब्ध करा दी गई। पिछले पाॅच सालों में उक्त कार्यवाहक निदेशक ने जितनी भी एनओसी जारी की गई उनमें से कुछ एक का ही मौका मुआयना उनके द्वारा किया गया होगा। वास्तव में गांवों के विद्युतीकरण के लिए जो भी एनओसी कार्यवाहक निदेशक ने जारी की उसमें भारतीय विद्युत नियमावली 1956के नियम 63 का खुला उल्लंघन है।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रतिष्ठानों, सब स्टेशनों और जेनरेटर सेटों की स्थापना एवं गाॅवों में विद्युतीकरण के लिए विद्युत सुरक्षा निदेशालय को एनओसी देने से पूर्व निरीक्षण एवं परीक्षण करना होता है। इसके लिए गाॅव का क्षेत्रफल, जनसंख्या, लगाये जाने वाले पोलों की संख्या, ट्राॅसफार्मर, प्लेन्थ, गार्डिग एवं आर्थिग की विधिवत जाॅच की जाती है। इसके लिए बकायदा इन्स्ट्रूमेन्ट और सहयोगी की मदद से डिग्रीधारी इंजीनियर निरीक्षण एवं परीक्षण के उपरान्त एनओसी जारी करता है। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब एक ही दिन में बिना सहयोगी एवं बिना इन्स्ट्रूमेन्ट के दस-दस रिपोर्ट जारी कर दी गई तो यह जाॅच का विषय है। जबकि नियमानुसार निरीक्षण और परीक्षण के दौरान निरीक्षणकर्ता अधिकारी के साथ स्टूमेन्ट ही नही बल्कि उसके अधीनस्थ के डिग्रीधारी इंजीनियर्स एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का रहना अनिवार्य है लेकिन इन सब नियमों को धता बताते हुए टेबिल पर बैठकर ही हजारो एनओंसी जारी कर दी। विघुत सुरक्षा निदेशालय में उपभोक्ता को भारतीय विद्युत नियमावली 1956 के नियम 63 के अन्तर्गत उपभोक्ता/संस्थाओं को एनओसी दी जाती है। उक्त एनओसी देने की प्रक्रिया में साइट के ड्राइंग के अनुमोदन का स्पष्ट नियम नही है फिर भी कार्यवाहक निदेशक द्वारा किया जाता है जबकि शासनादेशानुसार उप निदेशकों एवं सहायक निदेशकों द्वारा जो निरीक्षण किये जा रहे है उसकी ड्राइंग का अनुमोदन सम्पूर्ण प्रदेश का संयुक्त निदेशक द्वारा किया जाना चाहिए। ऐसे में ऐसा प्रतीत होता है कि कार्यवाहक निदेशक के लिए शासनादेश भी बेकार है। यही नही गांवों के विद्युतकरण के लिए एनओसी देने की प्रक्रिया और आम उपभोक्ता को एनओसी देने की प्रक्रिया का कभी भी अवलोकन कर लिया जाए तो इसी कार्यालय में आम उपभोक्ता हो एक एनओसी पाने के लिये दस दस जाॅचों के साथ महीनों का समय लग जाता है। ऐसे में गाॅवों के मजरों के लिए विद्युतीकरण के लिए एक ही दिन में बिना जाचॅ परीक्षण/ निरीक्षण के दस दस एनओसी जारी कर देना जाॅच का विषय है।

शासनादेश के विपरीत अपना आदेश
हद तो तब हो गई जब कार्यवाहक निदेशक ने शासन द्वारा जारी शासनादेश संख्या उत्तर प्रदेश शासन अनुभाग-3,संख्या 898चैबीस/41-3-06- 25 ई-95 दिनांक 13 मार्च,2006 को तत्कालीन प्रमुख सचिव ऊर्जा अशोक कुमार खुराना द्वारा जारी अधिसूचना को अतिक्रमित कर नियम विरूद्ध तरीके से कार्यवाहक निदेशक का पदभार ग्रहण करने के मात्र एक माह में ही आदेश जारी कर ड्राइंग से लेकर एनओसी के सभी अधिकार अपने में निहित कर लिये गए है।कार्यवाहक निदेशक ने अपने पत्रांक संख्या 802 मु0/कार्य वितरण/2012 दिनाॅक 11.09.2012 को विभागीय आदेश जारी कर ड्राइंग सम्बंधित सभी काम अपने पास सोची समझी रणनीति के तहत करते हुए सिर्फ 3 मण्डलों के काम का बटवारा संयुक्त निदेशक के लिए छोड दिया ताकि कोई उगली न उठा सके और शेष 8 मण्डलों (लगभग 50 जनपदों) के ड्राइंग संबंधित कार्य वे स्वयं कर रहे हैं। इस पर विद्युत सुरक्षा निदेशालय इंजीनियर्स एसोसिएशन ने अपात्ति दर्ज कराते हुए मुख्य सचिव को पत्र भी लिखा था। यह पत्राचार कार्यवाहक निदेशक की कठपुतली बने सहायक समीक्षा अधिकारी दिलीप कुमार झा के इशारे में डास्टबिन में डाल दी गई। यह वही सहायक समीक्षा अधिकारी है जो पिछले बीस वर्षाे से एक ही पटल ऊर्जा -3 में कुण्डली मारे बैठे है। जबकि ऊर्जा अनुभाग 3 द्वारा जारी अधिसूचना में बकायदा सहायक निदेशक, उप निदेशक,संयुक्त निदेशक और निदेशक के लिए एनओसी से सम्बंधित कार्यो और निरीक्षणों का स्पष्ट बटवारा किया गया है।

जाॅच कराई जाएः सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

विद्युत सुरक्षा निदेशालय मिनिस्ट्रीरियल एसोसिएशन के प्रान्तीय अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव कहते है कि इस तरह के मामले उनके एसोसिएशन द्वारा पूर्व मे ंउठाए जा चुके है और उठाए जा रहे है इससे कार्यवाहक निदेशक काफी नाराज है। स्थानान्तरण मामले में भी कार्यवाहक निदेशक ने स्थानान्तरण में पाॅच वर्षो में जमकर मनमानी करते हुए पद का दुरूपयोग किया है और इनके काफी प्रमाण एसोसिएशन के पास मौजूद है। यही नही उपभोक्ता द्वारा एनओसी लेने के लिए जो ड्राइंग बाहर से बनवाकर लाई जाती है उसे नकार दिया जाता है और तो और उत्तर प्रदेश इंजीनियर्स एसोसिएशन ने अपने पत्रांक संख्या 226/यूपीई.ए./वि0सु0/2014, 09-7-14 में भी कार्यवाहक निदेशक की मनमानी के खिलाफ शासन से पत्राचार कर चुका है। इस पत्र में स्पष्ट रूप से शासनादेशानुसार संयुक्त निदेशक के कार्य आवंटन पर अतिक्रमण करने का विरोध दर्ज कराया गया था। अब पता नही क्या कारण है कि लगातार शासन को कार्यवाहक निदेशक की मनमानी और शासन की मंशा के विपरीत कार्य करने के बाद भी दण्डित नही किया जा रहा है। वैसे इनके कार्यकाल में हुई अनियमिताओं की सर्तकता जाॅच कराई जानी चाहिए।


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