
मुख्यमंत्री ने म्यांमार के यांगून नगर में आयोजित ‘संवाद’ कार्यक्रम को सम्बोधित किया
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज म्यांमार के यांगून नगर में आयोजित ‘संवाद’ कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में कर्म योग अथवा कर्म मार्ग अध्यात्म का मार्ग है, जो ‘आकांक्षा से रहित होकर उचित समय पर उचित कार्य करने’ पर बल देता है। मुक्ति के इस मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए आत्मचेतना तथा आत्मबोध की आवश्यकता होती है, और हम सभी को ज्ञान का मार्ग दिखाने के लिए तथागत, जिन्हें भगवान बुद्ध के रूप में पूजते हैं, से उत्तम मार्गदर्शक कौन हो सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भगवान बुद्ध के तीनों महत्वपूर्ण उपदेश धम्मम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि तथा बुद्धम् शरणम् गच्छामि तत्कालीन परिस्थितियों के साथ-साथ आज भी प्रासंगिक हैं। उत्तर प्रदेश के लिए यह गौरव का विषय है कि भगवान गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण स्थल यहां अवस्थित हैं। वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। तथागत की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर सहित श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कौशाम्बी, संकिसा आदि प्रसिद्ध बौद्ध धार्मिक स्थल भी हमारे प्रदेश में स्थित हंै। भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बनी एवं तपस्या स्थली बोधगया भी यहां से दूर नहीं हैं।
योगी ने कहा कि हमारी परंपरा में ऐसे अनेक उदारहण हैं, जहां तलवार की नोक पर किसी के विचार थोपने के स्थान पर विचारों के आदान-प्रदान को सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है। सभी जानते हैं कि अद्वैत दर्शन के अनुकरणीय प्रतिपादक आदि शंकराचार्य ने पूर्व मीमांसा परंपरा के अनुयायी एवं उद्भट विद्वान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया था। कहा जाता है कि दोनों के बीच शास्त्रार्थ कई महीनों तक चलता रहा था। विचारों के जीवंत एवं शांतिपूर्ण आदान-प्रदान की यही परंपरा हमें विरासत में प्राप्त हुई है, जो वर्तमान विश्व में दुर्लभ हो गई है। शांतिपूर्ण चर्चा को ही सदैव मार्गदर्शक सिद्धांत माना जाना चाहिए और चर्चा के सभी मार्ग खुले रखकर द्वंद्व से यथासंभव बचा जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने महाकाव्य महाभारत का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें उल्लिखित है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त शक्तियां एवं सिद्धियां होते हुए भी विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कौरवों को अंतिम क्षण तक मनाने का प्रयास किया। इसके लिए वे स्वयं दूत एवं मध्यस्थ बनकर हस्तिनापुर के राजदरबार में पहुंचे। वह भगवान थे, वह अकेले ही पांडवों की अभिलाषा पूरी कर सकते थे, किंतु वह झुक गए क्योंकि शांति का कोई विकल्प नहीं होता। भगवान जानते थे कि ऐसा कोई भी प्रयास करना ही चाहिए, जिसका परिणाम शांति हो। इसी प्रकार भगवान बुद्ध द्वंद्व टालने के प्रबल समर्थक थे। उनका सदियों पुराना संदेश था कि ‘हजारों युद्धों में विजय प्राप्त करने से श्रेयस्कर स्वयं पर विजय प्राप्त करना है’ और यह संदेश आज भी प्रासंगिक और सही है।
धम्म के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए भगवान बुद्ध के अष्टांग मार्ग को जानना और अपनाना जरूरी है। उनके द्वारा बताए गए अष्टांग मार्ग में सम्यक दृष्टि एवं सम्यक संकल्प सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। तथागत की इसी शिक्षा को अंगीकार करके आपसी विवादों को सुलझाने एवं पर्यावरण को सुधारने में मदद मिलेगी। पर्यावरण का संरक्षण व संवर्द्धन काफी व्यापक एवं बहुआयामी शब्द है। हमारे आसपास की वे सभी वस्तुएं, जो जीवन की उत्पत्ति एवं विकास के लिए सहायक होती हैं, वे पर्यावरण के तहत ही आती हैं। इनमें वातावरण, जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पतियां, जीव-जन्तु आदि सभी को समाहित किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि इस आयोजन से पूर्व 03 व 04 सितम्बर, 2015 को नई दिल्ली में इस श्रृंखला का पहला आयोजन सम्पन्न हुआ था, जिसमें भारत के आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी सम्मिलित हुए थे। इसके तत्काल बाद 05 सितम्बर, 2015 को आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने बोधगया के बौद्ध समागम में कहा था कि हिन्दू व बौद्ध दर्शन के मूल और समान सिद्धान्तों के अंगीकरण के कारण काॅन्फ्लिक्ट अवाॅयडेन्स तथा इनवाॅयरमेन्ट काॅन्शियसनेस जैसे विषयों का समाधान हो सकता है। इन सिद्धान्तों को अपनाकर विश्व में शान्ति एवं पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन सम्भव है।
योगी जी ने कहा कि म्यांमार की पावन धरती पर कदम रखकर वे गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि म्यांमार वह देश है, जिसे अब भी ब्रह्मदेश पुकारा जाता है, जो सभी भारतीयों के हृदय के बहुत निकट है। उन्होंने कहा कि हमारे देशवासी धम्म और धर्म द्वारा एक दूसरे से बंधे हैं। इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित विशिष्ट जनों तथा अन्य लोगों को विविधता एवं सद्भाव की विशिष्ट पहचान रखने वाले उत्तर प्रदेश के भ्रमण के लिए आमंत्रित भी किया।
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