भारत रत्न पर छिड़ी सियासत


नई दिल्ली। क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और वैज्ञानिक प्रोफेसर सीएनआर राव को भारत रत्न देने की घोषणा के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजने की मांग तेज हो गई। साथ ही इस पर सियासत ने भी तेजी पकड़ ली है। भाजपा की तरफ से उठाई गई मांग के साथ जहां हाल ही राजग से अलग हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खड़े हो गए हैं, वहीं केंद्र सरकार के दो मंत्रियों ने भी इसका समर्थन कर दिया है। हालांकि, सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने गुजरात दंगों के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म की नसीहत देने के बावजूद वाजपेयी द्वारा खुद इसका पालन नहीं करने का आरोप लगाकर इस सर्वोच्च सम्मान के लिए उनकी योग्यता पर सवाल जरूर उठा दिए हैं।

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सचिन की लोकप्रियता को भुनाने का सरकार के सियासी दांव में सियासत ने कई पेंच फंसा दिए हैं। करीब पांच साल पहले से वाजपेयी को भारत रत्न देने की मांग कर रही भाजपा ने इस मुद्दे को फिर से उठाया। भाजपा को सबसे पहले उसकी इस मुहिम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का समर्थन मिला। राजग छोड़ते हुए भी नीतीश ने नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए वाजपेयी की सबको साथ लेने की सियासत का हवाला दिया था। अपने राज्य के सियासी समीकरणों को साधते हुए नीतीश ने तत्काल इस मांग का समर्थन कर दिया। उन्होंने कहा कि वाजपेयी सही मायने में इसके लायक हैं। साथ ही उन्होंने राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर को भी भारत रत्न से नवाजे जाने की मांग की। राजग में शामिल शिवसेना ने भी अटल को भारत रत्न दिए जाने की मांग की है। शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि अगर राजीव गांधी को भारत रत्न मिल सकता है तो अटल को क्यों नहीं।

मोदी के मुकाबले वाजपेयी की सियासत को सही बताने वाली कांग्रेस से भी उनके समर्थन में आवाज उठ गई। कांग्रेस खाते से केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री पल्लम राजू के साथ-साथ संप्रग सरकार में मंत्री नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला खुलकर अटल के समर्थन में आ गए। फारूक ने वाजपेयी को भारत रत्न की उपाधि से ऊपर ठहराते हुए कहा कि वह व्यक्तिगत तौर पर उन्हें इस सम्मान से नवाजे जाने की सिफारिश करेंगे।

हालांकि, कांग्रेस का औपचारिक पक्ष रखते हुए केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने थोड़े सधे शब्दों में यह साफ कर दिया कि वाजपेयी का नाम जानबूझकर ही अलग रखा गया। उन्होंने कहा, वाजपेयी ने एक सीएम को राजधर्म की नसीहत दी थी। वक्त का तकाजा था कि वह उस सीएम को खुद ही बर्खास्त करते लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वाजपेयी को इसका मलाल भी था। ऐसे में भारत रत्न दिए जाने पर गंभीरता से सोचना जरूरी है।

हालांकि, केंद्र के एक वरिष्ठ मंत्री का मानना है कि कांग्रेस वाजपेयी को भारत रत्न देकर राजनीतिक पलटवार कर सकती थी, लेकिन वह चूक गई।

शिवानंद ने कराई जदयू की किरकिरी : जदयू के बड़बोले नेता शिवानंद तिवारी फिर से गलती कर बैठे। उनके नेता नीतीश कुमार ने जहां सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने का स्वागत किया, वहीं तिवारी ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि सचिन पैसे लेकर क्रिकेट खेलते थे और उससे अरबों कमाए। फिर भारत रत्न उन्हें देने का कोई औचित्य नहीं था। उन्होंने कहा कि हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर विचार किया जाना चाहिए था। वहीं, शिवसेना ने तिवारी के बयान को आड़े हाथ लिया है। संजय राउत ने कहा कि शिवानंद तिवारी को सचिन पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है। सचिन भारत की पहचान हैं, शिवानंद तिवारी नहीं।


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