स्व. राजीव गांधी ने कभी कहा था कि अगर दिल्ली से गांवों के विकास के लिए एक रुपया भेजा जाता है तो वह गांवों तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसे ही बचता है। उनके बेटे राहुल गांधी इसे घटाकर 10 पैसे ही करना उचित मानते हैं। बाकी के पैसे बीच के दलाल निगल जाते हैं। देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के मुंह से निकली इस बात को बीते हुए कमोवेश ढाई दशक हो चुके हैं। लेकिन स्थिति जस की तस है। बल्कि यह कहें कि उससे भी बदतर हो चुकी है तो शायद ज्यादा ठीक होगा। कभी गांवों के विकास का मानक शहरों से जोड़कर देखा गया था। यह माना गया कि देश के सभी गांव जब तक शहरों से नहीं जोड़े जाएंगे तब तक विकास संभव नहीं है। सीधे सड़क से जुड़ जाने से गांव आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक रूप से और सबल होंगे तथा किसान भी बिचौलियों के चंगुल से निकलकर अपनी फसल को शहरों में बेचेंगे और अधिक लाभ कमायेंगे। लेकिन हुआ क्या? जिन गांवों को शहर से जोड़कर विकसित करने का सपना देखा जा रहा था, आज उनका अस्तित्व ही संकट में है। गांवों के विकास के लिए सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। हर साल बजट में गांवों के लिए अच्छी खासी रकम रखी जाती है। राजीव गांधी के जमाने में गांवों के विकास के लिए इतना पैसा नहीं भेजा जाता होगा जितना आज आवंटित किया जाता है। चाहें वोट की मजबूरी कहें या विकास की चिंता, हर बजट में गांवों के लिए कुछ न कुछ नई योजनाएं मिलती हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इसका फायदा गांव के लोगों को मिल भी रहा है? अगर आप किसी गांव में मौके पर जाकर देखें तो जवाब निश्चय नहीं में मिलेगा, जबकि सरकारी आंकड़े और विकास दर के दावे कुछ अलग ही कहानी बयां करेंगे। सच्चाई की तह तक जाने के लिए चौपाल चर्चा टीम ने देश के सबसे बड़े सूबे की राजधानी से सटे एक गांव नौबस्ता कला का जायजा लिया। वहां जो देखा-पाया उसे पाठकों के लिए पेश किया जा रहा है- नौबस्तां कला लखनऊ-फैजाबाद राजमार्ग के चिनहट तिराहे से सुप्रसिद्ध देवाशरीफ जाने वाले मार्ग पर तकरीबन तीन किलोमीटर चलने पर बायें हाथ पर बसा है। करीब 3600 आबादी वाली इस ग्राम पंचायत में दो छोटे-छोटे मजरे मुरवन टोला और मजरा भेलू भी जुड़े हैं जिसमें तकरीबन 2400 मतदाता हैं। कुर्मी बहुल इस गांव में ब्राह्मïण और क्षत्रिय छोड़ लगभग सभी जातियां बसती हैं। ईंट-भट्ïठों के बीच बसी इस ग्राम पंचायत में तकरीबन 26 तालाब हैं। वैसे तो सभी तालाबों में पानी भी रहता है लेकिन इनकी साफ-सफाई न के बराबर है। गांव के लोगों की मानें तो पहले इन तालाबों का पानी बरसात के दिनों में एक-दूसरे से जुड़ते हुए गांव के बाहर निकल जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। सारे तालाब एक-दूसरे से अलग हो चुके हैं। वजह है ईंट-भट्ïठों के लिए मिट्ïटी की कटान। कहीं-कहीं तो तालाब के अगल-बगल उससे पांच-पांच फिट गहरे खेत देखने को मिल जाएंगे। गांव के विकास के लिए चलाई जा रही मनरेगा योजना से भी नौबस्तां कला महरूम रह गया है। वजह इस गांव में मजदूरों का न होना है। गांव के प्रधान की मानें तो उनके गांव में मजदूर हैं ही नहीं। ऐसी स्थिति में मनरेगा के तहत अगर कोई काम करवाया जाय तो मजदूर बाहर से लाने पड़ेंगे। जिनका मेहनताना मनरेगा मजदूरी से दो गुना होगा। विकास से महरूम इस गांव को हम बंदरों का गांव भी कह सकते हैं। गांव के हर छज्जे व पेड़ों पर आपको बंदरों की अच्छी खासी जमात देखने को मिल जाएगी। गांव में 76 इंडिया मार्का हैंडपम्प लगे हैं। ग्राम प्रधान के अनुसार यह सारे हैंडपम्प चल रहे हैं। इंदिरा आवास योजना के तहत गांव में महज पांच मकान बने हैं जिन्हें आवंटित कर दिया गया है। नौबस्तां कला में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल देखकर रोना आता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के नाम पर किराये के घर में चलने वाला मातृ शिशु चिकित्सालय है। जानवरों के लिए एक पशु चिकित्सालय भी है। दोनों चिकित्सालयों में सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति भी की गयी है, ज्यादातर दोनों अस्पतालों में ताला पड़ा रहता है। चौपाल चर्चा टीम जिस दिन वहां पहुंची थी वह कार्यदिवस था। दिन के 12.30 बजे तक दोनों अस्पतालों में ताला पड़ा मिला। पशु चिकित्सालय में पशुओं को बांधने की जगह तक तो पहुंचना ही मुश्किल प्रतीत होता है। तीन-तीन फिट ऊंची घास उगी थी, आसपास पानी लगा था और उस जगह को देखकर साफ पता चलता था कि महीनों से वहां किसी पशु का इलाज नहीं किया गया होगा। यह जरूर है कि यह जगह कुछ मौज-मस्ती करने वाले आवारा लोगों के काम आती होगी, क्योंकि चिकित्सालय के सामने शराब की कई बोतलें बिखरी पड़ी मिलीं। सरकार नौबस्तां कला में शिक्षा के प्रसार के लिए भी अपने तरीके से ‘प्रयासरतÓ है। गांव के बाहरी मुहाने पर ही जूनियर हाईस्कूल स्थित है।
स्कूल के गेट तक आप बिना कीचड़ मंझाये पहुंच ही नहीं सकते हैं। गेट तक पहुंच गये तो उस स्कूल के भीतर प्रवेश करने के लिए आपको नट-कला में माहिर होना चाहिए। क्योंकि जलभराव के कारण रास्ता तो बचा ही नहीं है। कुछ ईंटें बिछा दी गईं हैं जिनपर कूद-कूदकर स्कूल तक पहुंचा जा सकता है। बच्चे यह कवायद रोज करते हैं। खेलने-कूदने की कमी शायद इसी कवायद से पूरी हो जाती है क्योंकि खेल का मैदान तो जंगली घास से भरा हुआ है। इस घास के बीच घुसना खासा जोखिम का काम है। पूरा मैदान बरसाती पानी में डूबा हुआ है और जाहिर है कि मच्छरों के लिए स्वर्ग बना है। कहने को तो स्कूल में शौचालय है लेकिन उसके अंदर प्रवेश करना वीर से वीर व्यक्ति के लिए भी संभव नहीं। चारों तरफ उगी जंगली घास और झाडिय़ां जैसे चीख-चीखकर कहतीं हैं कि यहां प्रवेश वर्जित है। बच्चे तो बच्चे बड़े भी इस खतरनाक जंगल में पांव रखने से डरते हैं क्योंकि पता नहीं कौन सा जंगली कीड़ा या जानवर हमलावर हो जाय। मजे की बात यह है कि इस स्कूल में लड़कियां भी पढ़तीं हैं और तीन महिला अध्यापिकाएं इसे चलातीं हैं। स्कूल में कुल 54 बच्चे हैं। शौचालय की जो स्थिति है उससे महिला अध्यापिकाओं और लड़कियों को इतनी दिक्कत का सामना करना पड़ता होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। करीब चार साल पहले बने इस स्कूल भवन को देखने के बाद इस बात का अंदाजा सहज ही हो जाता है कि इसकी नींव में घपलों की भरमार है। अत्यंत जर्जर स्थिति में पहुंच चुके इस स्कूल के कमरों में फर्श धंस चुकी हैं। छत में दरारें पड़ चुकीं हैं, प्लास्टर उखड़ चुका है और एक तरफ नींव भी धंसने के साथ ही दरारें पड़ चुकी है। कभी भी यहां कोई हादसा हो सकता है। स्कूल प्रभारी से जब इन हालात का कारण जानने की कोशिश की गई तो वह सिर्फ इतना कह पाईं कि हम तो बराबर इन सब बातों को ग्राम प्रधान व सम्बन्धित अधिकारियों के सामने उठाते रहते हैं लेकिन हमारी सुनता कौन है? ग्राम प्रधान से जब इस स्कूल की बदहाली के बारे में बात की गई तो उन्होंने धन के अभाव की बात कहकर चुप्पी साध ली। गांव में एक प्राइमरी पाठशाला भी है। यह गांव के अंदर स्थित है। जिसमें 136 बच्चे पंजीकृत हैं। इनमें से 109 बच्चे उपस्थित बताए गए। हमें बताया गया कि दो शिक्षामित्रों सहित पांच अध्यापकों की नियुक्ति बच्चों को पढ़ाने के लिए की गई है। बहरहाल मौके पर स्कूल प्रभारी के अलावा दो शिक्षक ही और उपस्थित मिले। स्कूल के गेट पर कुछ बच्चे पेड़ की डलियां काट रहे थे। हमने उनसे पूछा कि क्या कर रहे हो तो उन्होंने कहा कि मास्टर साहब ने इसे काटने के लिए कहा है। यह स्कूल में पढ़ाई का समय था और हमने स्कूल प्रभारी डा. अमिता से जानना चाहा कि पढ़ाई के समय में बच्चों से इतर ‘श्रमदानÓ करवाने का औचित्य क्या है तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के सवाल की गंभीरता को यह कहकर दरकिनार कर दिया कि गेट पर टहनियां लटकी हुई थीं, बच्चों को आने जाने में चोट लगती थी इसलिए बच्चे खुद उन्हें काट रहे थे। हमने स्कूल में मिड-डे मिल की व्यवस्था का जायजा भी लिया। नियमानुसार 136 बच्चों के इस स्कूल में कम से कम तीन रसोइयों की नियुक्ति होनी चाहिए मगर वास्तव में यहां नियुक्त रसोइयों की संख्या महज दो है। इस कमी का ठीकरा प्रभारी महोदया ने ग्राम प्रधान के सिर फोड़ा और कहा कि इस बारे में मैंने प्रधानजी से कई बार अनुरोध किया है मगर प्रधानजी कुछ भी नहीं कर रहे। उधर प्रधानजी ने इस बयान को सिरे से खारिज किया और जल्द ही इस कमी को पूरा करने का आश्वासन दिया। बात-बात यह भनक भी लगी कि तीसरे रसोइए की नियुक्ति को लेकर स्कूल प्रभारी और प्रधान के बीच विवाद की जड़ में स्कूल की यह मंशा है कि उनकी पसंद की व्यक्ति को नियुक्त किया जाय। चौपाल चर्चा टीम गांव में आंगनबाड़ी केंद्रो के बारे में कुछ भी नहीं जान पाई। यों वहां तीन आंगनबाड़ी केंद्र हैं।
इनमें से एक सरकारी भवन में और दो किराये के भवनों में चलाये जाते हैं। सरकारी आंगनबाड़ी केंद्र में हमें ताला जड़ा मिला। आंगनबाड़ी केंद्र के भवन को एक शब्द में बताना हो तो उसके लिए खस्ताहाल शब्द उचित होगा। बरामदे का फर्श उखड़ा हुआ था और उस पर एक टूटा चूल्हा पड़ा था और जानवरों के खुरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे जिससे पता चलता था कि यहां इंसानों के बजाय मवेशियों की आवाजाही ज्यादा सुगम और सहज है। इस केंद्र को देखकर यह कहना मुश्किल था कि यहां कभी कुछ भी काम होता होगा। नौबस्तां कला में बिजली तो पहुंच चुकी है मगर यह बिजली किस दिन किसके लिए काल बन जायेगी यह कहना मुश्किल है। केवल पांच खंभों के सहारे गांव में बिजली पहुंचा दी गई। गांव के अंदर बिजली के तारों का संजाल बांस-बल्लियों के सहारे फैलाया गया है। यह बांस बल्लियां गांव की संकरी गलियों में दिखेंगी और गांव के बाहर के तालाब तक में भी। यह जर्जर बांस बल्लियां और उन पर फैले बिजली के तार किसी अनहोनी की आशंका की घोषणा करती प्रतीत होती है। सरकार द्वारा समाज के वंचित और अशक्त सदस्यों की सहायता के लिए अनेक पेंशन योजनाएं चलाईं जा रही हैं। लेकिन पेंशन योजनाओं को लेकर भी नौबस्तां कला बदहाल है। चाहें बात वृद्धावस्था पेंशन की हो, विधवा पेंशन की हो, किसी अन्य योजना की हो अथवा छात्रवृत्ति की हो कोई भी खुश और संतुष्टï नहीं है। गांव भर में केवल श्रीपाल पुत्र नत्था ही अकेले ऐसे वृद्ध हैं जिन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में पहले और लोगों को भी पेंशन मिलती थी लेकिन अब वो न जाने किस कारण से बंद हो चुकी है। खुद श्रीपाल के परिवार की कैलाशपति की पेंशन भी इस साल जनवरी महीने से बंद हो चुकी है। गांव के भोला पुत्र नंदा ने बताया कि उन्हें चार-पांच साल तक पेंशन मिलती रही, लेकिन पिछले कई महीनों से यह सिलसिला टूट चुका है। विधवा पेंशन पाने वाली महिलाओं के साथ भी घूम-फिरकर यही स्थिति बनी हुई है। चौपाल चर्चा टीम के आने की भनक पाकर ग्राम पंचायत सचिवालय में जगदा, गुरदेई, मेहरूननिशां, मुन्नी देवी, लक्ष्मी, जदुआ, रूपरानी, कमलावती, सावित्री आदि कई महिलाएं एकत्रित हो गईं। उनमें से हर-एक का यही दुखड़ा था कि सालों मिलने के बाद उनकी पेंशन न जाने किस कारण से बंद हो गई है। इन महिलाओं का कहना था कि ग्राम प्रधान और संबंधित अधिकारियों से बार-बार गुहार लगाने के बजावूद उनकी पेंशन बहाल नहीं हो पा रही। अब उनकी समझ में यह नहीं आता कि उनकी तकलीफ की सुनवाई कौन करेगा?
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