
लखनऊ | स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के प्राचार्य व शिक्षको की स्थिति से आखिर कौन परिचित नहीं है कि ऐसे महाविद्यालयों के प्राचार्य व शिक्षको की स्थिति गुलामो से भी बदतर है। उस पर भी योगी सरकार द्वारा कैबिनेट में प्राचार्य नियुक्ति नियमावली में शिथिलीकरण का प्रस्ताव लाकर भ्रष्टाचार की इन तथाकथित दुकानो के प्रश्रय पोषण एवं संरक्षण को ही एक नयी दिशा प्रदान कर दी गयी है|
योगी सरकार ने स्ववित्त पोषित अशासकीय महाविद्यालयों में प्राचार्यों की तैनाती में आ रही अड़चन दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
उप्र राज्य विश्वविद्यालयों के प्रथम परिनियमों में अशासकीय महाविद्यालयों के प्राचार्य की तैनाती की योग्यता नियमावली को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इससे 3500 से अधिक स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों में प्राचार्यों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया कि स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों की संख्या अधिक होने के कारण प्राचार्य के लिए पहले से निर्धारित योग्यता के अनुरूप प्राचार्य उपलब्ध नहीं हो पा रहे थे।
प्राचार्य की उपलब्धता न होने के कारण राज्य विश्वविद्यालयों द्वारा स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों की सम्बद्धता को बनाये रखने पर आपत्ति की जा रही थी। इस वजह से ऐसे महाविद्यालयों को संचालित किये जाने में संबंधित संस्थाओं को कठिनाई का सामना करना पड़ता था। इन अड़चनों को दूर करने के लिए प्रावधान में बदलाव किया गया है। इस फैसले के तहत स्ववित्तपोषित अशासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य के लिए पात्रता का मानदंड निर्धारित किया गया है।
इसके तहत किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि न्यूनतम 55 प्रतिशत अंकों के साथ जरूरी होगा। अगर ग्रेडिंग प्रणाली वाले विश्वविद्यालय हों तो समकक्ष ग्रेड। संबंधित संस्था में पीएचडी की उपाधि, प्रकाशित कार्य एवं शोध निर्देशन के साक्ष्यों समेत उच्च शिक्षा से जुड़े किन्हीं विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और उच्च शिक्षा के अन्य संस्थाओं में कुल 15 वर्षों का अध्यापन, शोध और प्रशासन का अनुभव होना चाहिए। इस पर कोई वित्तीय भार नहीं आएगा।
शासकीय महाविद्यालयों तथा अनुदान सूची वाले अशासकीय महाविद्यालयों के प्राचार्य के लिए चयन प्रक्रिया यथावत रहेगी।
इस फैसले से प्रदेश में 3500 से अधिक महाविद्यालयों में प्राचार्य के रिक्त पदों को भरने के लिए उनका किसी संस्थान में प्राचार्य या सह-प्राचार्य होना अनिवार्य नहीं होगा। यदि किसी का 15 साल का शिक्षण का अनुभव है और उसका रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुका है तो वह इसके लिए आवेदन कर सकता है। आवेदन के लिए पोस्ट ग्रेजुएशन में न्यूनतम 55 फीसद अंक के साथ ही उसका पीएचडी का रिसर्च पेपर प्रकाशित होना और प्रशासनिक अनुभव होना भी आवश्यक है। सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया कि मौजूदा समय में ऐसे 6500 महाविद्यालय हैं जिनमें 3500 से ज्यादा में प्राचार्य के पद रिक्त चल रहे हैं।
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