बोले PM मोदी, सुषमा जी सबके लिए प्रेरणा का स्रोत थीं


 

नई दिल्ली |  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को याद करते हुए कई बातें बताईं। उन्होंने कहा कि सुषमा जी सबके लिए प्रेरणा का स्रोत थीं। उन्होंने कहा कि व्यवस्था के तहत, अनुशासन के तहत, जो भी काम मिले उसे जी जान से करना और व्यक्तिगत जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने के बाद भी करना, कार्यकर्ता के लिए इससे बड़ी प्रेरणा कोई हो नहीं सकती है।

पीएम ने कहा कि इस बार उन्होंने (सुषमा) चुनाव न लड़ने का फैसला किया। एक बार उन्होंने पहले भी ऐसा किया था। तब मैं और वेंकैया जी उनसे मिले। उन्होंने मना किया, लेकिन जब उनसे कहा गया कि आप कर्नाटक जाइए और विशेष परिस्थिति में इस चुनाव में लड़िए। परिणाम करीब-करीब निश्चित था, लेकिन यह चुनौती भरा काम था, पार्टी के लिए उन्होंने यह काम किया। इस बार मैं उनको समझाता था कि सब संभाल लेंगे, लेकिन इस बार उन्होंने किसी की नहीं सुनी। वह अपने विचारों की पक्की थी।

पीएम ने कहा कि कोई सांसद जब सांसद नहीं रहता है, लेकिन सरकार को उसका मकान खाली कराने के लिए सालों तक नोटिस भेजना पड़ता है। सुषमा जी ने सब कुछ समेटने का तय कर लिया था। चुनाव परिणाम आए, उनका दायित्व पूरा हुआ तो उन्होंने पहला काम यह किया कि मकान खाली करके अपने निजी निवास पर चली गईं। मोदी ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में ये सब चीजें बहुत कुछ कहती हैं।
पीएम मोदी ने कहा कि उनका भाषण प्रभावी होने के साथ प्रेरक भी होता था। वे कृष्ण भक्ति को समर्पित थीं। हम जब भी मिलते थे वह मुझे जय श्रीकृष्ण कहती थीं, मैं उन्हें जय द्वारकाधीश कहता था, लेकिन कृष्ण का संकेत वह जीती थीं। उनके जीवन को देखें तो पता चलता है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते क्या होता है।

पीएम ने कहा कि अब जीवन की विशेषता देखिए, उन्होंने सैकड़ों फोरम में जम्मू-कश्मीर की समस्या पर बोला होगा। आर्टिकल 370 पर बोला होगा, एक तरह से उसके साथ वह जी जान से जुड़ी थीं। जब जीवन का इतना बड़ा सपना पूरा होता है और खुशी समाती न हो… सुषमा जी के जाने के बाद जब मैं बांसुरी से मिला तो उन्होंने कहा कि इतनी खुशी-खुशी वह गईं हैं कि उसकी कल्पना करना मुश्किल है। एक प्रकार से उमंग से भरा मन नाच रहा था और उस खुशी के पल को जीते-जीते वह श्री कृष्ण के चरणों में पहुंच गईं।

पीएम ने कहा कि सुषमा जी की एक खासियत थी, लेकिन यहां उसे बोलने की कोई हिम्मत नहीं कर रहा है शायद। वह मृदु थीं, नम्र थीं, ममता से भरी थीं, सब था, लेकिन कभी-कभी उनकी जुबान में हरियाणवी टच भी रहता था। हरियाणवी टच के साथ बात को फटाक से कहना और उससे टस से मस न होना भीतर से कन्विक्शन के रूप में प्रकट होता था। ये सार्वजनिक जीवन में बहुत कम होता है। अच्छी-अच्छी बात करने वाले लोग बहुत मिल जाते हैं लेकिन जब जरूरत पड़े तो कठोरतापूर्वक बोलना भी जरूरी है। मेरे लिए कोई क्या सोचेगा, यह सोचने की जगह सही निर्णय होना चाहिए, यह जरूरी है। इसके लिए कड़ाई के साथ हरियाणवी बोली का प्रयोग करना पड़े तो वह पीछे नहीं हटती थीं।


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