
आढ़तिए और बिचैलिए इसका पूरा फायदा उठा रहे हैं
लखनऊ,। अन्नदाता कहा जाने वाला किसान कालेधन के खिलाफ चल रहे अभियान से मुफलिस हो गया है। खास बात है कि उसका धान तैयार है। आलू का भंडार है मगर उसके खरीदार नदारद हैं। नतीजा यह है कि अगली फसल के बीज खरीदने के काबिल वह नहीं है। सरकार हर दूसरे साल समर्थन मूल्य बढ़ाने का दम भर कर अपनी पीठ ठोक रहीं है लेकिन अन्नदाता समर्थन मूल्य के आधे दाम पर ही फसल बेचने को मजबूर है। मगर देखने वाला कोई नहीं है। विधानसभा पर प्रदर्शन करने पहुंचे गणेशपुर के कैलाश ने बताया कि किसी मंडी में किसानों की फसल के खरीदार नहीं है। बिचैलिए ही दुकानें चला रहे हैं। किसान से दो रुपये किलो आलू खरीद कर उसे 15-20 रुपये किलो बेचा जा रहा है। लोग वहीं आलू खरीद रहे हैं लेकिन आलू पैदा करने वाला किसान पैसा न मिलने के कारण तंगी झेल रहा है। यही हाल धान का भी है। खेतों में धान तैयार है मगर उसका खरीदार नहीं मिल रहा है।
भारतीय किसान यूनियन भी किसानों की समस्या को बेहद गंभीर मानती है। यूनियन के जिलाध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा के मुताबिक सवाल किसान की तंगी का नहीं बल्कि सरकार के रवैये का भी है। एक तरफ सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 14.70 रुपये प्रति किलो तय कर रखा है लेकिन धान क्रय केंद्र बंद है। कारण बताया जा रहा है कि नई करेंसी नहीं है। इसमें किसान क्या दोष है। बावजूद इसके किसान की फसल बिक नहीं रही है। जो बड़ी कंपनियां व आढ़त हैं, वे औने पौने दाम किसान की उपज खरीद रहे हैं और फिर उसे महंगे दाम पर बेच रहे हैं। किसानों के मुताबिक किसानों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह खाद दृबीच तक खरीद सकें। इस समय रबी की बुआई शुरू हो जाती है लेकिन लखनऊ से लेकर प्रदेश के तमाम हिस्सों में गेहूं की बोआई शुरू नहीं हो सकी है। किसान अपनी पुरानी फसल आलू दृधान के बेचने की मशक्त में लगा है और इसका असर रबी पर पड़ रहा है। ऐसे में रबी की फसल प्रभावित होना स्वाभाविक है। इसका खामियाजा आखिर में आम लोग भुगतेंगे।
किसान भले परेशान हैं लेकिन मंडियों में दुकान करने वाले आढ़तिए और बिचैलिए इसका पूरा फायदा उठा रहे हैं। कारण है कि मंडियों में किसान से औने पौने दाम पर आलू व धान खरीदा जा रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि किसान आलू सौ रुपये क्विंटल के भाव बेच रहे हैं जबकि बिचैलिए वहीं आलू पंद्रहदृबीस रुपये किलो बेच रहे हैं। यही हाल धान का भी है। धान पांच से सात रुपये किलो के भाव बिक रहा है जो कि समर्थन मूल्य के आधे से भी कम है।
भारतीय किसान यूनियन के पदाधिकारियों के मुताबिक किसान दो सौ रुपये क्विटंल के भाव से अपना आलू बेचने को तैयार हैं लेकिन दिक्कत यह है कि उनके पास किसी मंडी में स्थान नहीं है। अगर प्रशासन या मंडी परिषद किसानों को मंडियों में जगह उपलब्ध कराएं तो किसान सीधे लोगों को अपनी फसल बेच सकेंगे। इससे उनकी समस्या कुछ कम होगी और लोगों को भी मुनासिब दामों पर आलू मिलने लगेगा, लेकिन यह करना प्रशासन को है जो हमेशा मुनाफाखोरों व कालाबाजारियों के आगे बेबस ही दिखता है।
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