
राज्य के भविष्य के लिए यह मील का पत्थर साबित होगा
देहरादून । उत्तराखंड सरकार जल्द ही कार्य कर रहे 100 से अधिक सरकारी विभागो के पुर्नगठन की तैयारी में है। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपने टनकपुर दौरे के दौरान इसके संकेत दे दिए है। उनका मानना है कि कई विभाग औचित्यहीन है। वैसे भी केन्द्र की रूलिग के हिसाब से राज्य में अधिकतम 33 विभागों का प्रावधान है। मुख्यमंत्री का मानना है कि ज्यादा विभाग होने से प्लान का बजट नॉन प्लान में खर्च हो जाता है जो कि राज्य हित में नहीं है। यदि प्रदेश सरकार वाकई में अपने इस कवायद में कामयाब होती है तो तय मानिए कि राज्य के भविष्य के लिए यह मील का पत्थर साबित होगा। सच्चाई यह है कि राज्य में साठ से अधिक विभाग और सौ से अधिक संस्थायें स्थापित हैं। एक ही प्रवृत्ति के कामों के लिए एकाधिक विभाग, संस्थाए व एकाधिक योजनाएं उत्तराखंड के लिए आज अभिशाप बने हुए हैं।
दरअसल उत्तराखंड का असल ‘मर्जÓ भी यही है और राज्य में प्रशासनिक अराजकता व भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण भी यही है। राज्य में आज हो यह रहा है कि विभाग पर विभाग बनते चले जा रहे हैं। उनमें भी आए दिन, परिषद, बोर्ड, निगम आदि स्थापित हो रहे हैं। काम भले ही कुछ भी न हो, लेकिन भारी भरकम ढ़ांचा और संसाधन हर किसी विभाग में खड़े हैं। एक एक अधिकारी एकाधिक संस्थाओं व विभागों का जिम्मा लिए बैठे हैं। दलील यह दी जा रही है कि अफसरों की प्रदेश में भारी कमी है, इसलिए एक अधिकारी कई जिम्मेदारियां संभाल रहा है।
सही तरह से आंकलन किया जाए तो प्रदेश में डेढ़ दर्जन के करीब संस्थाएं और विभाग अनावश्यक हैं। इनमें सालाना करोड़ों रूपये तो सिर्फ दफ्तरों और अफसरों के ठांट बांट पर फिजूल में खर्च हो रहे हैं। आलम यह है कि अफसरों की संख्या राज्य में कार्मिकों से बहुत ज्यादा हो गई है। बहरहाल बात विभागों के एकीकरण की हो रही है, तो यह निश्चित रूप से राज्य हित में है। राज्य में सिर्फ कृषि और उद्यान विभाग का ही नहीं, बल्कि तमाम महकमे ऐसे हैं, जिनका एकीकरण या संविलियन जरूरी है। मसलन, प्रदेश में सिंचाई व लघु सिंचाई दो अलग अलग विभागों की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह पेयजल में जल संस्थान और जल निगम का एकीकरण होना चाहिए। पशुपालन व डेरी दो अलग अलग विभाग हैं, तो वहीं मनोरंजन व कर के लिए भी अलग विभाग की जरूरत नहीं। इन्हें कर विभाग में ही शामिल किया जा सकता है। कल्याण सेक्टर में महिला कल्याण एवं बाल विकास विभाग व उनकी योजनाएं एक साथ शामिल की जा सकती है।
इस तरह अनुसूचित जाति एवं जनजाति निदेशालयों का अलग अलग होना भी व्यावहारिक नहीं है। पर्यटन विभाग के अंदर विभाग के अलावा दो दो निगम और बोर्ड तथा अलग से परिषद का होना भी तमाम मौकों पर अनावश्यक प्रतीत होता है। आवास और शहरी विकास विभाग भी अलग अलग हैं, जिनका एकीकरण संभव है। संस्कृति व अभिलेखागार को भी मिलाकर एक किया जा सकता है। रेशम विभाग को भी कृषि अथवा वन विभाग के साथ संविलियन किया जा सकता है। निर्माण एंजेंसियों का भी एकीकरण जरूरी है। इतना ही नहीं राज्य में विभागों के अंतर्गत 50 से भी अधिक परिषद व बोर्ड स्थापित हैं। विभागों की संख्या सीमित होगी तो जाहिर है उन पर नियंत्रण व उनका मूल्यांकन भी आसानी से हो सकेगा। योजनाओं की ओवरलेपिंग व उनमें होने वाले भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक अंकुश लग सकेगा।
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