क्या नई राजनीतिक जमीन तैयार कर पाएगा महागठबंधन?


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मुकेश भूषण

   चुनावी राजनीति को साधने में महारत हासिल कर चुके हमारे राजनेताओं से अक्सर एक भूल हो रही है. जनता      की    बेचैनी को अपनी ताकत समझने की भूल. दशकों से कांग्रेस शासन से परेशान जनता ने जब 2014 में नरेंद्र मोदी के नाम पर पूरा समर्थन देकर भाजपा को आजमाने का मन बनाया तो इसे आरएसएस-भाजपा की बढ़ती वैचारिक ताकत समझने की भूल की गई. अब जब बिहार के मतदाताओं ने भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को धूल चटाते हुए नीतीश-लालू-राहुल की तिगड़ी वाले महागठबंधन को आजमाने का फैसला किया है तो इसे कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत के रूप में देखने की भूल की जा रही है. न तो तब वह दक्षिणपंथ की जीत थी और न ही अब यह धर्मनिरपेक्षता की जीत है. दरअसल, लगातार चौंकानेवाले चुनाव नतीजे जनता की उस विवशता का प्रतीक हैं जो काफी बेचैनी से किसी वैकल्पिक राजनीति की तलाश कर रही है. इस तलाश में उसे जब वंशवाद में खोट नजर आता है तो कांग्रेस को बदलकर वंश-परिवार से दूर-दूर रहनेवाले नरेंद्र मोदी में अपना भाग्यविधाता खोजने लगती है तो नया चेहरा मिलते ही अरविदं केजरीवाल जैसे गैर-राजनीतिक को माथे से लगा लेती है और भगवा आडंबरों में फिर से ब्राह्मणवाद का खतरा महसूस कर सामाजिक न्याय के नाम पर ‘जातिवादी-परिवारवादी’ लालू यादव को अपना ‘चाणक्य’ बनने का अवसर भी दे देती है. यह जनता का धैर्य है जो लगातार ठगे जाने के बावजूद राजनीतिक पार्टियों को अपनी गलती सुधारने का अवसर दे रही है. जनता चुके हुए खोटे सिक्कों को घिस-घिसकर बार-बार इस उम्मीद में चला रही है कि शायद इसबार वह चल जाए और यह पार्टियों की हिमाकत है जो अपने मुगालते में बार-बार उस अवसर को गंवाने में कोई संकोच नहीं कर रही. संध-भाजपा के कर्ताधर्ता तो 2014 में मिले अवसर को करीब-करीब गंवाने की कगार पर आ चुके हैं, 2015 में मिले अवसर का महागठबंधन क्या करेगा, इसकी गणना भी 20 नवंबर को पटना के गांधी मैदान में आयोजित नीतीश कुमार कैबिनेट के शपथ ग्रहण के साथ ही शुरू हो चुकी है.

गांधी मैदान में मोदी विरोधी ताकतों के भव्य प्रदर्शन के बाद महसूस किया गया कि राजनीति नई करवट ले रही है. अब वह युग खत्म हुआ जिसमें देश की राजनीति कांग्रेस की धुरी पर घूमा करती थी. कांग्रेस का समर्थन या विरोध अन्य दलों की राजनीतिक ताकत का जरूरी पैमाना हुआ करते थे. कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देकर सत्ता हासिल करनेवाले नरेंद्र मोदी को बिहार चुनाव के नतीजों में खुश होने के लिए यह संकेत जरूर हैं कि कांग्रेस अब उस धुरी से बेदखल हो चुकी है और उसका स्थान भाजपा को मिल चुका है. भाजपा के विरोध में कांग्रेस आज उसी तरह अन्य दलों के साथ खड़ी है, जिसतरह कभी कांग्रेस के विरोध में भाजपा हुआ करती थी. देश की भावी राजनीति अब भाजपा के समर्थन और विरोध के आधार पर तय होनेवाली है. हालांकि भाजपा और मोदी के लिए यह चिंता की बात भी होनी चाहिेए कि महज दो साल के भीतर ही भाजपा विरोध का ऐसा घ्रुवीकरण होना उन मतदाताओं पर कुठाराघात हैै जिन्होंने मोदी से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं. भाजपा के लिए जहां यह भूल सुधार का मौका है, वहीं नीतीश-लालू-राहुल की तिगड़ी के लिए नई राजनीतिक जमीन तैयार करने का. जाहिर है यह नई जमीन जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के वैचारिक खाद को मिलाकर ही तैयार की जा सकती है. बिहार का जनादेश ऐसे ही किसी विकल्प की बेचैन तलाश का नतीजा है. क्या जदयू, राजद और कांग्रेस के साथ-साथ गांधी मैदान में उपस्थित अन्य क्षत्रप ऐसी किसी गंभीर कोशिश के प्रति तत्पर होंगे?

नेहरू को आधुनिक भारत के निर्माण का श्रेय जाता है तो जेपी को देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने का. और लोहिया समाज में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति की आवाज माने जाते हैं. बिहार का जनादेश हमें यही तो बताना चाह रहा है कि सबसे पीछे छूट गए व्यक्ति की चिंता करो, लोकतांत्रित मूल्यों को हमेशा याद रखो और देश को विकास के नए प्रतिमान गढ़ने का रास्ता बुलंद करो. हालांकि, इतिहास में ये तीनों बातें टकराती रही हैं. नेहरू मॉडल का विकास पीछे छूट गए व्यक्ति को और पीछे धकेलनेवाला साबित होता रहा है तो जेपी का लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आग्रह अंतरविरोधों के कारण अपने ही शासन के दुराग्रहों से टकराता रहा है. और लोहिया तो अबतक ठीक से सामने आ ही नहीं पाए. हालांकि बिहार में जिस तरीके से चुनाव लड़े और जीते गए उसमें नेहरू-जेपी-लोहिया किसी की भी दूर-दूर तक छाप नहीं थी. चुनाव जीतने के बाद भी इनके विचारों की चिंता करनेवाली कोई बात नजर नहीं आ रही है, सिर्फ इसके कि नीतीश-लालू व राहुल एकमंच पर हाथ मिलाते हुए साथ-साथ दिखने का प्रयास कर रहे हैं, जो जेपी-लोहिया और नेहरू के वैचारिक झंडाबरदार हैं. यदि आसन्न चुनावों और संसद में भी वे ऐसा दिखाने में सफल होते हैं, तभी राजनीति वह करवट ले पाएगी जिसकी उम्मीद की जा रही है. हालांकि, तब भी आम आदमी के हाथ कुछ आएगा, यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि, वर्तमान राजनीति में अक्सर ताकत की गलत व्याख्या कर ली जाती है और ‘कॉमन मैन’ को दरकिनार कर दिया जाता है.

बिहार के जनादेश को सांप्रदायिक शक्तियों पर धर्मनिपरेक्ष ताकतों की जीत बताया जा रहा है. जबकि, हकीकत में यह एक तरह के जातिवाद पर दूसरे तरह के जातिवाद की जीत ज्यादा है. पहले तरह का जातिवाद ब्राह्मणवाद (इसे सनातन धर्म न समझा जाए) की गाय पर सवार है तो दूसरे तरह का जातिवाद कथित समाजवाद की भैंस पर. हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी स्थापनाओं में जिन जातियों को लाभ होता रहा है स्वाभाविक तौर पर वे अपनेे आप को उन स्थापनाओं को बरकरार रखने वाली वैचारिक जमात के करीब पाते हैं. उसीतरह उन स्थापनाओं के कारण समाज में पिछड़ गई जातियां किसी भी कीमत पर उसे फिर से बहाल होने का खतरा नहीं मोल ले सकती. यह समझना होगा कि जिन्होंने महागठबंधन को वोट दिया है वे अपने जीवन-दर्शन में आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे भाजपा-मोदी को सत्ता सौंपनेवाले ज्यादातर वोटर ब्राह्मणवादी नहीं थे. यह समझना भूल होगी कि महागठबंधन के वोटरों को अपने धर्म या पंथ के मान-अपमान से कोई फर्क नहीं पड़ता. सिर्फ इतना भर है कि उन्होंने उस कुटिलता को समझ लिया है जिसकी बदौलत लंबे समय तक भारतीय समाज में ‘ब्राह्मणों’ ( सिर्फ एक जाति नहीं, वैसे तमाम लोग जो कर्मना के स्थान पर जन्मना जातिप्रथा स्थापित करने के जिम्मेदार है) का परोक्ष शासन रहा है और वे सनातनी होने और ब्राह्मणवादी होने के फर्क को एक हदतक समझने लगे हैं. पर नेहरू-जेपी-लोहिया की धारा तो इन बातों से कहीं बहुत दूर तक जानेवाली हैं. जिनके कंधों पर ऐसा करने का दायित्व जनता ने दिया है, क्या वे वाकई इसमें रुचि लेंंगे. समय के साथ इसका आंकलन भी किया ही जाने लगेगा कि महागठबंधन ने हाथ आए मौके को किस तरह फिसल जाने दिया.

पहली परीक्षा तो बिहार में सबसे बड़े दल के सर्वेसर्वा लालू यादव की होनी है, जिन्हें राजनीतिक परिस्थितियों ने ‘चाणक्य’ बनने का मौका दे दिया है. इससे पहले 1990 में उन्हें ‘चंद्रगुप्त’ बनने का मौका उस समय मिला था जब उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोककर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दमदार पहचान बनाई थी. हालांकि तब वे उस पहचान को दागदार बनाने के अतिरिक्त कुछ खास नहीं कर पाए थे. अपने परिवार और जाति के प्रति उनकी प्रतिबद्धताएं अन्य सभी प्रतिबद्धताओं पर भारी साबित हुई थीं. आखिर में वे भ्रष्टाचार के पर्याय बनकर रह गए. अब दूसरी बार जनता ने उन्हें ‘मोदी-रथ’ को रोकने का गंभीर काम सौंपा है. देखना होगा कि मसखरे स्वभाव वाले लालू क्या चुनावी जोड़-घटाव से इतर जाकर ‘मोदी-रथ’ को रोकने की राजनीतिक बेचैनी को वाकई समझ पाते हैं या अपने परिवार का मोह फिर उन्हें ले डूबेगा. जिसतरह पहली बार विधायक बननेवाले अपने बेटों को उन्होंने न सिर्फ मंत्री बनवाने की हडबड़ी दिखाई बल्कि, कैबिनेट में वरीयता का भी कोई ख्याल नहीं रहने दिया, उससे तो यही लगता है कि वह जनता की उम्मीदों को एकबार फिर धता बताने का मन बना चुके हैं. दूसरी परीक्षा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की होनी है कि जिस साफ-सुथरे चेहरे को बिहार की जनता ने अपना माना, वह दागदार परिवार के वर्चस्व वाले महागठबंधन का किस तरह नेतृत्व करता है. इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश को अपने चेहरे की काफी परवाह है और लालू को अपनी राजनीतिक विरासत की. उम्मीद कर सकते हैं कि दोनों की यह चिंता ही उनके आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करेगी. तीसरी परीक्षा राहुल गांधी की होनी है क्योंकि, जिनके साथ उन्हें आगे बढ़ना है, उन्होंने ज्यादातर समय कांग्रेस विरोध की राजनीति ही की है. जाहिर है कि कांग्रेस को एक नए रूप में लाने के लिए उन्हें न सिर्फ ज्यादा मशक्कत करनी होगी बल्कि सहिष्णुता भी दिखानी होगी. राहुल के सामने भी इसके अलांवा कोई विकल्प नहीं हैं. इन तीनों की विकल्पहीनता से जनता राजनीति की वैकल्पिक जमीन तैयार होने की आस लगा सकती है. केरल, पश्चिम बंगाल. तमिलनाडू, पुडुचेरी और असम में अगले साल चुनाव हैं और उसके बाद उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल, गुजरात और गोवा में होंगे. इन चुनावों में भाजपा की परीक्षा तो होगी ही, भाजपा-विरोधी ताकतों की परिपक्वता भी नापी जाएगी और उन्हें उन संदेशों की कसौटी पर कसा जाएगा जो बिहार चुनाव से मिले हैं. खासतौर से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में, जहां महागठबंधन के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा अभी ‘काशी-करवट’ लेती नजर नहीं आ रही है.

 


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