लखनऊ। जी हाॅ देर सबेर और काफी सोच विचार के बाद गिरफ्तार यादव सिंह की गिरफ्तारी के बाद उसकी डायरी को लेकर यूपी के कुछ नेता डरे सहमें और खौफ खाये हुए है। हालाॅकि एनआरएचएम घोटाले की तरह इस मामले में भी कई को समझौते चलते इस मामले में भी कई के नाम आने के बाद उन्हें क्लीन चिट मिल जाएगी। धनकुबेर इंजीनियर यादव सिंह की गिरफ्तारी से यूपी के कुछ ताकतवर नेताओं की परेशानी पर बल पडना शुरू हो गया है। छह दिन के सीबीआई रिमांड में लिए गए यादव सिंह ने छापेमारी के दौरान मिली डायरी में दर्ज कोड नेम के बारे में औपचारिक बयान दर्ज करवाया है। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक डायरी के कोड नेम भाईसाहब बसपा के एक बड़े नेता के अति नजदीकी रिश्तेदार के लिए लिखा गया है, जबकि पंडितजी नोएडा-एनसीआर के बसपा के सक्रिय राजनीतिक शख्स का नाम है। डायरी के मुताबिक इन दोनों के नाम पर लंबे समय तक करोड़ों के लेनदेन हुए।यह डायरी यादव सिंह के घर से आयकर विभाग की छापेमारी के दौरान बरामद की गई थी।
सूत्रों के मुताबिक डायरी लंबे समय तक वित्त मंत्रालय के कब्जे में थी। सीबीआई मायावती के दिल्ली स्थिति आवास पर करीब तीन माह पहले एनआरएचएम घोटाले के बारे में की गई पड़ताल के वक्त इन नामों के बारे में उनसे पूछताछ कर चुकी है। उधर सीबीआई यादव सिंह के पार्टनर राजीव मिनोचा की कंपनी एमएन बिल्डवेल के 9995 शेयर के मामले को भी रिकॉर्ड पर ले लिया है। ये शेयर सपा के सांसद के नाम हैं। यह सांसद सपा के कद्दावर नेता के नजदीकी रिश्तेदार हैं। मिनोचा की कंपनी में यादव सिंह की पत्नी बराबर की हिस्सेदार हैं। सूत्रों ने बताया कि भाईसाहब और पंडितजी का नोएडा समेत पूरे एनसीआर में रियल एस्टेट का बड़ा धंधा है। सीबीआई को शक है यादव सिंह के नेतृत्व में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेस वे से संबंधित घोटाले और राजनीतिक शीर्ष के बीच पंडितजी और भाईसाहब अहम कड़ी थे। चर्चा है कि यादव सिंह के घोटाले के पुख्ता तंत्र में जिसने भी रोड़ा अटकाने की कोशिश की, उसके तबादले का फरमान सीधे लखनऊ के मुख्यमंत्री दफ्तर से जारी होता था।
2011 में इसका शिकार बने नोएडा अथॉरिटी के सीईओ बलविंदर कुमार जिनका कार्यकाल बमुश्किल 100 दिन चल पाया। कुमार ने नोएडा के किसानों को अधिग्रहित जमीन के बदले आबादी वाली जमीन देने का आदेश जारी कर दिया था। इसके अलावा कुमार ने नोएडा की संपत्ति की पारदर्शिता के लिए आनलाइन सुविधा की व्यवस्था शुरू की थी। कुमार का यह काम यादव सिंह के काम में बड़ी अड़चन पैदा कर रहा था। कुमार के बाद नोएडा के सीईओ कैप्टन एसके द्विवेदी का भी यही हश्र हुआ। इनका कार्यकाल चार महीने का था। मार्च 2012 में इनका तबादला हो गया, जब अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली थी। द्विवेदी ने यादव सिंह को अति ताकतवर प्लानिंग विभाग समेत दो बड़े प्रोजेक्ट से हटा दिया था। सीबीआई की जांच के मुताबिक द्विवेदी को भी लखनऊ से फोन आए और उन्हें नोएडा में रह रहे सपा के बड़े नेता से मिलने को कहा गया।उधर सीबीआई जल्द ही नोएडा अथॉरिटी के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह के करीबी चार्टर्ड अकाउंटेंटों से पूछताछ करने की तैयारी कर रही है। हालांकि, यादव सिंह की करोड़ों की संपत्ति के बारे में आयकर विभाग और सीबीआई जानकारी जुटा चुकी हैं, पर अब उस रकम के प्रमाण जुटाए जा रहे हैं, जिसे विदेश में निवेश करने का अंदेशा है।
आयकर विभाग के साथ ही सीबीआई को भी इसके प्रमाण मिल चुके हैं कि यादव सिंह ने अपने व परिवार के लोगों के नाम से जो निजी कंपनियां बनाईं, उनसे कोलकाता की 35 कंपनियों के कारोबारी रिश्ते हैं। जांच एजेंसियों के सामने यह तथ्य भी आ चुका है कि कोलकाता की जिन कंपनियों से यादव सिंह की कंपनियों के रिश्ते हैं, उनका विदेश में कारोबार है। इसी वजह से प्रवर्तन निदेशालय भी यादव सिंह के खिलाफ पूर्व में दो मामले दर्ज कर चुका है। दोनों ही मामले मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की धाराओं के तहत दर्ज हुए हैं। ईडी के सूत्रों की मानें तो जांच एजेंसी यादव सिंह की सभी चल व अचल संपत्ति के बारे में जानकारी जुटा रही है। यादव सिंह ने सिर्फ आगरा व नोएडा में ही अचल संपत्ति नहीं बनाई, बल्कि अन्य शहरों में उसके फ्लैट, बंगले व प्लाट होने की सूचना है। सीबीआई ने इसके लिए यादव सिंह के कई करीबियों की गतिविधियों पर नजर टिकाई है।
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