भुवन भास्कर द्विवेदी
लोकसभा चुनाव और हरियाणा व महाराष्टï्र विधानसभा चुनावों में पार्टी की नैय्या डूबने के चलते बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के अपने चर्चित रहे फार्मलू से तौबा कर ली है। राज्य सभा की दो सीटों के लिए उन्होंने ब्राह्मïणों और वैश्यों को धता बताकर दो दलितों को चुन लिया। ब्रजेश पाठक और अखिलेश दास को धता बताकर उन्होंने आजमगढ़ के बीर सिंह और मुदाराबाद के राजा राम को राज्य सभा में भेजने के लिए चुन लिया। ऐसा करके उन्होंने यूपी के पूर्वांचल और पश्चिमांचल दोनों ही छोरों के दलितों को साधने की रणनीति अपनायी है। उपेक्षा के दंश से तिलमिलाये अखिलेश दास ने बसपा के अपने सभी पदों और प्राथमिकता सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया। जवाब में मायावती न खुलेआम उन पर राज्य सभा टिकट के लिए एक सौ करोड़ रूपये का आफर देने का आरोप मढ़ दिया। यही नहीं वह यह भी बोलीं कि अगर वह दो सौ करोड़ रूपये भी देतो तो भी मैं उन्हें टिकट नहीं देती क्यों कि वह वैश्यों को बसपा के पाले में लाने में कामयाब ही नहीं हुए।
सन 2008 में मायावती के चरण स्पर्श के साथ कांग्रेस छोड़कर बसपा में शामिल हुए अखिलेश दास ने आनन-फानन मीडिया के सामने मायावती पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि उन्होंने राज्य सभा टिकट के लिए पैसा देने को कोई प्रस्ताव नहीं रखा था, बल्कि विधायकी और सांसदी का चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशियों से पार्टी फंड के नाम पर पैसा वसूलना बसपा की संस्कृति में है। उन्होंने यह सफाई भी दी कि कांग्रेस छोड़कर बसपा में आने के लिए उन्होंने मायावती से कोई दरख्वास्त नहीं की थी। बल्कि मायावती ने ही उन पर बसपा में शामिल होने का दबाव बनाया था। यहां तक कि उनका इस्तीफा भी मायावती ने खुद बोलकर लिखवाया था। मायावती और अखिलेश दास के इस आरोप युद्घ से एक बात तो साफ हो गयी है कि भारतीय लोकतंत्र में पैसे का ‘खेलÓ खुलकर खेला जाता है। अखिलेश दास तो खुलकर सामने आ गये, लेकिन ब्रजेश पाठक ने फिलहाल शायद पर्दे के पीछे रहकर ही अपना घाव सहलाना श्रेयस्कर समझा है। हां, यह जरूर रहा कि मायावती की प्रेस कांफे्रंस में हमेशा दिखलायी पडऩे वाले पाठक नए राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा करने के लिए बुलायी गयी प्रेस कांफ्रेंस में नजर नहीं आये। बीर सिंह और राजाराम को राज्य सभा में भेजने के फैसले से यह साफ हो गया कि मायावती अब सवर्णों पर भरोसा नहीं रख सकतीं और उन्होंने अपने कोर वोट बैंक दलितों की ओर रुख करने का मन बना लिया है।
2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती सोशल इंजीनियरिंग के जिस फार्मूले के बूते बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पर काबिज हुई थीं, उसने ही उनके कोर वोट बैंक दलितों को उनसे विमुख कर दिया। पार्टी और सरकार मेंं अगड़ों को महत्व दिया जाना दलितों को रास नहीं आया। नतीजा यह हुआ कि 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। पिछले विधान सभा चुनाव में बसपा ने सूबे की 403 सीटों में से 74 पर ब्राह्मïणों को लड़ाया था, लेकिन सिर्फ दस ही कामयाब हो पाये थे ब्राह्मïणों को महत्व लोकसभा चुनाव में भी दिया गया जब पार्टी ने 80 सीटों में से 21 पर ब्राह्मïणों को टिकट दिये, लेकिन कोई जीत नहीं पाया। ब्राह्मïणों और वैश्यों की कौन कहे, दलित भी इस चुनाव में भाजपा की तरफ खिसक गये और बसपा खाता भी नहीं खोल पायी। हरियाणा और महाराष्टï्र विधानसभा चुनावों में भी यही कहानी दुहराई गयी। इसे देखते हुए मायावती को निश्चय ही यह लगा होगा कि स्पेशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से और ज्यादा चिपके रहना उनके राजनीतिक भविष्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा सकता है और उन्होंने दलितों को ‘अपनानेÓ में अपनी निष्कृति खोज ली है।
ब्राह्मïण किसी की पसंद नहीं
यूपी की 12 फीसदी ब्राह्मïण आबादी पर पूरी तरह ‘भाजपाÓ का लेबल लग चुका है। शायद यही कारण है कि बसपा और सपा दोनों ने ही एक भी ब्राह्मïण नेता को राज्यसभा में भेजने की बाबत नहीं सोचा। मायावती ने मुसलमानों, पिछड़ों और अगड़ों को किनारे करके सिर्फ दलितों को तरजीह दी, तो सपा ने अपने बचे हुए वोट पीएल पुनिया की झोली में डाल दिये, जो दलित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं और राष्टï्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी हैं। समाजवादी पार्टी की इस उदारता से राजनीतिक हलकों में लोगों को चौंकाया भी, क्योंकि कांग्रेस और सपा के बीच दूरियां काफी बढ़ चुकी मानी जा रही थीं। यूपीए के दस साल के शासन काल में कांग्रेस ने सपा को बहुत महत्व नहीं दिया। यूपी में पार्टी को पनुर्जीवित करने के कांग्रेस के प्रयासों ने भी दोनों पार्टियों के बीच दूरियां बढ़ाई थीं। 2012 के विधानसभा चुनाव और इस साल के लोकसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियों के बीच तल्खी देखी थी। कांग्रेस और सपा के बीच दोस्ती और दुश्मनी का खेल यों तो चलता रहा है लेकिन जब बात राज्य सभा की आती है तब सपा प्रमुख किसी और बजाय कांग्रेस पर ही मेहरबान होते रहे हैं। इसके पहले दिसंबर 2013 में कांग्रेस के प्रमोद तिवारी सपा की मदद से राज्य सभा पहुंचे थे। कैप्टन सतीश शर्मा और मुहम्मद अदीब भी सपा की उदारता से लाभान्वित होने वालों में रहे हैं। इस बार सपा ने अपनी उदारता दिखाकर दलित मित्र पार्टी होने का दांव भी चला है। सूबे की 90 विधानसभा सीटों और 30 लोकसभा सीटों पर दबदबा रखने वाले ब्राह्मïणों को भाजपा के हाथों भी निराशा ही हाथ लगी है, क्योंकि वह भी अब पिछड़ों और दलितों को केन्द्र में रखकर राजनीति की बिसात पर अपने पांसे फेंक रही है।
https://rashtriyadinmaan.com
