कभी अन्न के लिए विदेशों का मुंह जोहने वाला भारत आज इतना खाद्यान्न उपजा रहा है कि उसके भण्डारण की समस्या खड़ी हो गयी है। यह उपलब्धि देश के किसानों की हाड़-तोड़ मेहनत का नतीजा है, लेकिन विडंबना यह है कि आज किसान ही बदहाल है। उनकी हालत पर घडिय़ाली आंसू तो खूब बहाये जाते हैं किन्तु उनकी दशा सुधारने के लिए गंभीर प्रयास करने की फुरसत किसी को नहीं। मोदी सरकार की यह जिम्मेवारी है कि वह किसान हितों को वरीयता दे और यह सुनिश्चित करे कि किसानों को उनकी लागत और मेहनत का लाभकारी मूल्य मिले। रजनीकांत वशिष्ठ की रिपोर्ट-
देश का सत्तर फीसदी किसान आज दिहाड़ी मजदूर से भी गया बीता है। वो किसान जो सबका पेट भरने के लिये खेतों में अपने आपको दिन रात भिगोता, सुखाता, तपाता और गलाता हो आज क्यों अपनी ही जान का प्यासा बन गया है। यह सवाल संसद के शीतसत्र में चर्चा का विषय बना, देश में कृषि की दशा और दिशा पर गंभीर मंथन हुआ अच्छी बात है। पर उस रोज लोकसभा में उपस्थित सदस्यों की बस कोरम पूरा करने लायक संख्या इस बात की ओर इशारा कर गयी कि किसान के सरोकार पर सियासी दल कितने गंभीर रहा करते हैं।
किसान का सबसे बड़ा सिरदर्द आज उसे अपनी उपज का लाभकारी मूल्य न मिल पाना है। इंसान के पेट की पहली जरूरत का सामान पैदा करने के बावजूद आज कृषि दुनिया का अकेला ऐसा धंधा है जो घाटे का है। अनाज, फल, सब्जी उगाने पर लागत ज्यादा आती है, पैदावार का दाम बाजार में कम मिलता है। पैदावार का बाजार मूल्य तय करने की आज सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली ऐसी है कि लागत भी नहीं निकल पाती, मुनाफे की कौन कहे। यही वजह है कि पिछले दो दशकों में कृषि कार्यों में पूंजी निवेश लगातार गिरा है। फसल उगाने वाला किसान कर्ज के मकडज़ाल में फंसा है। किसान का बेटा आज खेती नहीं करना चाहता है। जमीन बेच कर नौकरी करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहा है। तीन पीढ़ी पहले के वो दिन गये जब कहा जाता था-उत्तम खेती, मध्यम बान, चाकरी तो निकृष्ट होती है।
देश में किसानों की दशा और दिशा पर नेशनल कमीशन ऑन फारमर्स या स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट पांच जिल्दों में सामने आ चुकी है। स्वामीनाथन कमीशन की ओर से सलाह दी गयी है कि देश की कृषि नीति ऐसी होनी चाहिये जिसमें उत्पादकता निरंतरता के साथ किसान को मुनाफा दिला सके। इससे पर्यावरण का नुकसान भी न हो। कृषि क्षेत्र में तेज और सर्वसमावेशी विकास के लिये संकट को अवसर में बदल कर दिखाना होगा तभी हमारे अन्नदाता का हौसला बरकरार रखा जा सकेगा। कमीशन के हिसाब से अभी तक हमारी नीति ऐसी रही जिसमें हरदम बस कृषि उपज बढ़ाने के बारे में ही सोचा गया। उपज बढ़ाने वाले या उसके परिवार की ओर ध्यान नहीं गया। अब उपज के साथ ही किसान और उसके परिवार के सरोकारों पर भी गंभीरता के साथ हमारे नीति नियंताओं को पेश आना पड़ेगा।
कमीशन की रिपोर्ट तो विस्तार से पांच खंडों में है और उसमें आजादी के बाद से किसान की बदहाली का विश्लेषण किया गया है। मोटे तौर पर किसान और खेती-बारी की दुर्दशा के जो कारण इसमें सामने आये हैं उनमें सबसे पहला कारण भूमि सुधार के आधे अधूरे प्रयास को माना है। सिंचाई के लिये पानी की उपलब्धता, उपज के लिये बाजार की चंटई, मौसम की मनमानी, खाद-बीज का संकट भी सामने हैं। इन सारी मुसीबतों की वजह से किसान खेती की जमीनों को रौंदकर उद्योग धंधे और आवासीय मकानों की फसल उगाने को मजबूर हो रहा है। लहलहाती फसल उगाने वाली जमीन का भूउपयोग बदलने के इस खतरनाक सिलसिले पर पर्यावरण और खेती के हक में एक एडवाइजरी पैनल के माध्यम से लगाम लगायी जानी चाहिये।
बीजू जनता दल के नेता हरेकृष्ण मेहताब ने सरकार से आग्रह किया कि देश की कृषि नीति में इस तरह से सुधार होना चाहिये कि यह सीमांत किसान समर्थक हो, महिलाओं के सशक्तिकरण और भूमिहीन मजदूरों पर विशेष ध्यान दे। देश के कृषि विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों का पूरा लाभ किसान को किसान की जरूरतों के हिसाब से मिले। उन्हें सस्ता कर्ज मिल सके और उपज का लाभकारी मूल्य मिल जाये। भाजपा के प्रह्लïाद सिंह पटेल ने कहा कि पहले खेती सम्मान की बात थी। आज खेती बेच कर नौकरी करना फायदे का सौदा हैं। आजादी के बाद खेती किसानी को बदहाली में पहुंचाने का सारा ठीकरा उन्होने कांग्रेसी सरकारों पर फोड़ दिया। 1950 से 72 के बीच 22 सालों में सुनियोजित तरीके से सीलिंग लादकर देश के किसान की कमर तोड़ दी गयीं। जब कृषि और कृषि व्यापार व्यापारियों के हाथ में चला गया तो सीलिंग हटा ली। उपजाऊ जमीन को आवास और बाजार ने निगल लिया और बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का मंहगा सौदा हाथ में ले लियां। बैल बेकार हो गयें। ट्रैक्टर लेकर कर्जा और खर्चा लाद लिया। पशुधन 1953 से लगातार घटता जा रहा हैं। चारागाह घटे। बीज का दस गुना दाम देना पड़ता है। बीज की कोई गारंटी नहीं है।
शिरोमणि अकाली दल के प्रेमसिंह चंदूमाजरा का मानना था कि सिंचाई को भी इन्फ्रास्ट्रक्चर में शामिल किया जाना चाहिये। बारिश के 70 फीसदी पानी को संभाला जाये तो काम बन सकता है। देश में दस करोड़ लोगों के पास दो एकड़ से कम जमीन है। ऐसे में किसान को कुशल श्रमिक माना जाना चाहिये। उसके श्रम का मूल्य भी न्यूनतम समर्थन मूल्य में शामिल किया जाना चाहिये। खेती पर आने वाली लागत में नब्बे से डेढ़ सौ प्रतिशत वृद्धि हो चुकी है और यह वृद्धि नवासी प्रतिशत किसानों को कर्जदार बनाने के लिये जिम्मेदार है। भाजपा के सत्यपाल सिंह की सोच भी श्री पटेल से मिलती जुलती नजर आयी जिन्होंने कहा कि आजादी के बाद आये शासकों और अफसरों ने खेती को बरबाद करके रख दिया। ‘हाउ दि अदर हाफ डाइजÓ किताब के हवाले से सिंह ने कहा कि असली वैज्ञानिक तो किसान थे पर अमेरिका के सहयोग से देश में खुले कृषि विश्वविद्यालयों ने खेती के हमारे पुराने पारम्परिक तरीकों को बदल कर जबसे काम किया है तबसे हमारी नदियां जहरीली हो गयीं, जमीन बंजर हो गयीं। किसानों के लिये मंडियां बनीं, वहां भी बिचैलिये आ गये। उन्होंने कहा कि जहां का किसान खुशहाल नहीं होता वो देश खुशहाल नहीं रह सकता। इसलिये स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट को अभी रीविजिट किया जाना चाहिये। शॉर्ट टर्म और लॉग टर्म प्लान बनाया जाना चाहिये।
आम आदमी पार्टी के भगवंत मान ने अपने लहजे में कहा एमएसपी दो से चार प्रतिशत बढ़ी है, मंहगाई आठ प्रतिशत बढ़ी तो ऐसे में किसान का तो कुछ हो ही नहीं सकता। सूखा, बाढ़ से नुकसान हो जाये तो मुआवजा मिलता है पैंतीस से चालीस प्रतिशत। मुआवजे के लिये सरकार पटे की रकम को मानक मानती है। पटे की रकम होती है पचास हजार एकड़। सरकार रेट तेरह हजार रुपया तय करती है। नतीजा ये है कि ट्रैक्टरों के मालिक जमींदार साइकिलों पर सब्जियां बेच रहे है। कारपोरेट सेक्टर को उबारने के लिये सरकार 6 लाख करोड़ की राजसहायता बांट सकती है पर किसान का कोई पुरसाहाल नहीं है।
भाजपा के हुकुमदेव नारायण यादव ने आंकड़ों की जबानी बताया कि 1951 में 71 प्रतिशत किसान थे जो 2011 में घटकर 45 प्रतिशत रह गये। साठ सालों में 26 प्रतिशत किसान गायब हो गये। पता चला कि इसी अवधि में देश मेें 26 प्रतिशत खेतिहर मजदूर बढ़ गये। यानी जो कभी जमींदार थे वो अब सीमांत किसान बन गये। आज देश में 64 फीसदी किसान लघु किसान हैं और 18 फीसदी मध्यम दर्जे के हैं। 1990-91 से 11-12 के बीच खाद्यान्न उत्पादन 176 मिलियन टन से बढ़कर 260 मिलियन टन हो गया तो इसमें लघु सीमांत किसान का योगदान सबसे ज्यादा है। कृषि के साथ मत्स्य पालन, पशुपालन, सहकारिता के क्षेत्र में आज सबसे ज्यादा छोटे और मझोले किसान की हालत पर ध्यान देने की जरूरत है। इसलिये कृषि क्षेत्र से जुड़े किसी आयोग में किसान को जगह देनी होगी। खेती की जमीन को कारखानों व उद्योगों से बचाना होगा। गांव की योजना गांव की चौपाल में बने।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि सामान्यीकरण का विशिष्टीकरण और विशिष्टीकरण का सामान्यीकरण किया जाना चाहिये। इसलिये खेती की जो पारम्परिक और कम खर्चे वाली और टिकाऊ तकनीक का उच्चीकरण करना होगा, तभी किसान को सांस मिल पायेगी और वो दिन रात अपनी मेहनत से सारी दुनिया का पेट भर पायेगा। खेती का रकबा कम हो रहा है, खेती करने में रुचि घट रही है, किसान आत्महत्या कर रहे है और आबादी लगातार बढ़ रहीं है। सोचिए हालात यही रहे तो क्या होगा। दरअसल गंभीर राजसहायता की प्राथमिकता की सूची में पहला नम्बर तो किसान ही होना चाहिये। इसके लिये सबसे पहला काम यही होना चाहिये कि किसान को लागत का डेढ़ सौ प्रतिशत मुनाफा सुनिश्चित हो जाये। तो वो काफी हद तक अपनी आर्थिक और समाजी हालात में सुधार कर लेगां। यही वादा तो मोदी ने चुनाव से पहले किसानों से किया था। अमरीका और संपन्न देश आज भारी राजसहायता देकर अपने किसान का सम्मान बचा रहे हैं। भारत में भी किसान और खेती को सरकार से संरक्षण की जरूरत है। 5
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