सत्ता पर सत्रह का संकट


अपना mulayam_singh_yadav_2013032376वां जन्म दिन धूमधाम से मनाकर रामपुर से लौटते ही सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव सरकार को सुस्ती और आकर्मण्यता के लिए कटघरे में खड़ा कर दिया। 23 नवंबर को लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे के शिलान्यास समारोह में उन्होंने मुख्यमंत्री से सीधे पूछ लिया; ‘तुम्हरी सरकार में सिर्फ शिलान्यास ही हो रहे हैं, उद्घाटन क्यों नहीं?Ó उन्होंने मुख्यमंत्री आवास पर इस मौके के लिए मौजूद अफसरों को यह वचन देने पर मजबूर किया कि वे 22 महीनों में इस परियोजना को पूरा कर लेंगे। अभी कुछ दिन पहले उन्होंने मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को छात्रों को लैपटाप बांटने के लिए निशाने पर लिया था। वह मानते हैं कि लैपटाप बांटकर भी सपा उसका फायदा नहीं ले पायी। फायदा ले गये नरेन्द्र मोदी जिन्होंने इन लैपटाप के जरिए अपनी बात नौजवानों तक पहुंचा दी।
मुलायम सिंह यादव अनुभवी राजनेता हैं और पार्टी के सामने आसन्न संकट को देख रहे हैं। अभी छह महीने पहले वह मोदी की आंधी में 22 साल पुरानी अपनी पार्टी को पतझड़ के पत्तों की तरह उड़ते देख चुके हैं। उनकी पार्टी लोकसभा में सिर्फ परिवार की पांच सीटों तक सिमटकर रह गयी, जबकि सूबे में सपा की प्रचण्ड बहुमत वाली सरकार थी और सरकार के पास वोटरों को बताने के लिए घोषित परियोजनाओं और कार्यक्रमों की कमी नहीं थी। लोकसभा चुनाव के बाद दूसरे राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन ने उन्हें चिन्ता में डाल रखा है और उनकी खीझ इसी चिंता से उपज रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में दो साल से कुछ ही अधिक समय बचा है और इस समय के भीतर भाजपा के खतरे से निपटने के लिए कुछ अचूक कर पाने की उनकी बेचैनी और छटपटाहट को सहज ही समझा जा सकता है।
वह जानते हैं कि राज्य में कांग्रेस का वजूद लगभग खत्म हो ही गया है। कभी उनकी सबसे प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी रही बहुजन समाज पार्टी की गति उनकी पार्टी से भी ज्यादा दयनीय हो चुकी है। ऐसे में चरखा दांव के माहिर माने जाने वाले मुलायम के सामने भाजपा के मोदी दांव की काट ढूंढने की चुनौती खड़ी है। वह जानते हैं कि यह चुनौती कठिन है, क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान वह अपने परंपरागत वोट बैंक यादवों, पिछड़ों और मुसलमानों को इधर-उधर छिटकते देख चुके हैं।
वह यह भी जानते हैं कि किसानों के लिए राज्य सरकार की तमाम योजनाएं, स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में किए गये काम, लखनऊ में मेट्रो की शुरूआत, सड़कें बनाने का काम, आईटी सिटी वगैरह की योजनाएं जहां सपा सरकार की उपलब्धियों के रूप में गिनवायी जा सकती हैं, वहीं मुजफ्फरनगर दंगों सहित सांप्रदायिक संघर्षों की श्रृंखला, कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार की विफलता, केन्द्र को लगातार कोसने के बावजूद बिजली की किल्लत और बड़े पूंजी निवेश को आकर्षित करने की कवायद बेनतीजा रहने जैसी चीजों के लिए सपा सरकार के पास भरोसे योग्य जवाब नहीं होंगे। भाजपा इन बातों को लेकर हमलावर होगी। इसके अलावा सपा मोदी के विकास मंत्र का कोई कारगर और भरोसेमंद तोड़ अभी तक नहीं ढूंढ़ पायी है। जहां तक विकास की बात है, देश के लोगों का भरोसा मोदी पर अभी भी कायम है।
प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा की संभावनाएं करीब-करीब खत्म हो चुकी हैं। इस सच्चाई को वह समझ चुके हैं। अब उनका सारा प्रयास इसी बात को लेकर है कि कम से कम यूपी में सपा के हाथ से सत्ता न निकलने पाये और क्षेत्रीय क्षत्रप होने का ताज उनके सिर सजा रहे। इसीलिए वह देश भर में जहां-तहां बिखरे पड़े तमाम जनता दलों को और दूसरी समान सोच वाली पाटियों को एकत्र करके एक तंबू के नीचे लाने की कोशिश कर रहे हैं। ताकि सांप्रदायिक ताकतों, (इसे भाजपा पढ़े) के विरूद्घ वैकल्पिक ताकत खड़ी की जा सके। यह वैकल्पिक ताकत राष्टï्रीय फलक पर तो फिलहाल कुछ कर नहीं पायेगी, लेकिन क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए छत्र का काम जरूर कर सकती है। मुलायम सिंह और उनके जैसे दूसरे नेताओं की राजनीति अब इसी धुरी पर चल सकती है, लेकिन इस तरह की वैकल्पिक ताकत गढऩे की असफल कोशिशें पहले भी की जा चुकी हैंं। इस बार भी यह कवायद बेनतीजा रहे या जो विकल्प बने वह अल्पजीवी ही हो तो कोई ताज्जुब नहीं।
इन बातों के अलावा सपा प्रमुख अपनी पार्टी को लेकर भी निश्चय ही चिंतित होंगे, जहां सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा नहीं जान पड़ता। उनके बहुत से पुराने और विश्वसनीय साथी इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, जो वरिष्ठï नेता बचे हैं उन पर वह भरोसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं यह तो वही बेहतर जानते हों। भरोसे के इस अभाव ने ही उन्हें पार्टी के भीतर परिवार को ‘प्रमोटÓ करने पर मजबूर किया होगा। लेकिन परिवार में भी क्या सब कुछ ठीक-ठाक है? क्या यह उनके लिए परेशानी का सबब नहीं बना होगा कि उनकी छोटी बहू सरेआम मोदी की तारीफ करे और उनकी पार्टी की सरकार की कार्यशैली पर चुटकी ले! उनके छोटे पुत्र प्रतीक यादव को न ही मैनपुरी और न आजमगढ़ से चुनाव लडऩे का मौका दिया गया। उधर बड़ी बहू डिंपल यादव पार्टी के मंचों, कार्यक्रमों और पोस्टरों पर भी महत्व पाती दिखलायी पड़ रही हैं। छोटी बहू सार्वजनिक रूप से जो कुछ कर रही हैं, वह उनकी सहज वाचालता है या फिर रणनीतिक प्रतिक्रया? क्या इसे 2017 में चुनावी दौड़ में अपनी जगह बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
यद्यपि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पिता की राजनीतिक विरासत के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि पार्टी के भीतर नंबर दो की जगह के लिए दावेदारों की कमी नहीं है। इनमें शिवपाल यादव प्रबलतम दावेदार हैं। उन्होंने लंबे समय तक मुलायम सिंह के दाहिने हाथ की तरह काम किया है और अखिलेश यादव की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी को भी हजम कर गये हैं। चाचा-भतीजे के बीच किसी संभावित टकराव को खत्म करने के लिए सपा मुखिया ने संतुलन साधने की कोशिश जरूर की है। शिवपाल को जहां संसदीय बोर्ड में लेकर राष्टï्रीय स्तर पर ले जाया गया है वहीं अखिलेश यादव को सूबे की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। शुरू में जिस कार्यक्रम का जिक्र किया गया है उसी में मुलायम सिंह ने अखिलेश की आलोचना करने के साथ ही शिवपाल यादव की जमकर तारीफ भी की। शिवपाल ने पिछले दिनों अपने काम में काफी तेजी भी दिखलायी है। जनता दरबारों के जरिए आम लोगों तक पहुंचे हैं। धड़ाधड़ निरीक्षण किए हैं। चौटाला और अजित सिंह के कार्यक्रमों और रैलियों में शिरकत की है। यह सब फलीभूत होने की उन्हें उम्मीद भी जरूर होगी। इसके अवाला प्रोफेसर राम गोपाल यादव भी हैं, जो पार्टी के महासचिव हैं और जिन्हें पार्टी के भीतर विचारक और सिद्घान्त निरूपक का दर्जा प्राप्त है। वह एक संयमी और संतुलित नेता हैं। अभी रामपुर में आजम खां द्वारा आयोजित सपा सुप्रीमो के जन्म दिवस समारोह से दूर रहकर उन्होंने यह जतला दिया है कि उन्हें समाजवादी विरासत के प्रति ईमानदार रहना कहीं ज्यादा जरूरी लगता है। खबरें तो इस तरह की भी आयीं कि वह इस ‘जश्नÓ से सहमत नहीं थे और चाहते थे कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव भी इससे बचें, लेकिन उनकी सुनी नहीं गयी। अक्टूबर में लखनऊ में हुए पार्टी के राष्टï्रीय अधिवेशन में सपा प्रमुख ने उन्हें पार्टी को ‘स्वच्छÓ करने का जिम्मा सौंपा था और उन्होंने बड़े सख्त लहजे में यह कहा था कि उन्होंने दगाबाजों और मौकापरस्तों को पहचान लिया है और अपनी लोकप्रियता को दांव पर लगाकर भी वह इन्हें बख्शेंगे नहीं। लेकिन लगता है कि इस बारे में भी उनकी सुनी नहीं जा रही है, क्योंकि अभी तक ‘शुद्घिकरणÓ का कोई संकेत दिखलायी नहीं पड़ा है। सिद्घांत विहीन राजनीति के दौर में सिद्घान्तों के प्रति निष्ठïा रखने वालों को खुद को हाशिए पर डाल दिये जाने की पीड़ा तो झेलनी ही होगी।
जाहिर है कि मुलायम सिंह यादव के सामने तमाम चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। उन्हें परिवार बचाना है, पार्टी बचानी है और सूबे में अपनी सत्ता भी। ऐसे में चौतरफा घिरे हुए मुलायम अगर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार पर कभी-कभार खीझ उतारें तो इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का भी यही मानना है तभी तो उन्होंने कहा कि वह पार्टी के अध्यक्ष हैं और इस नाते उन्हें यह सीख देने का पूरा हक है कि सरकार कैसे चलायी जाये।


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