काल कवलित हो गई है मुडिय़ा


चौपाल चर्चा डेस्क
munim ke bhashaप्रोद्यौगिकी ने हमारी दुनिया बदल डाली है। दिन-पर-दिन बदलती जा रही है। कम्प्यूटर प्रोद्यौगिकी की ऐसी देन है जिसने जीवन के हर क्षेत्र में दखल दिया है। व्यवस्था का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। दुकानों में जहां मुनीम लोग लंबे-लंबे बही-खाते रखे पन्ने रंगा करते थे, वहां अब मेज-कुर्सी पर जमे एकाउंटेंट और कम्प्यूटर ही नजर आते हैं। मुनीमत का पेशा समूल समाप्त हो गया है और मुनीम जी सिर्फ यादों में दफन होकर रह गये हैं।
मुनीमत के पेशे के साथ मुनीमों की अपनी भाषा मुडिय़ा भी काल कवलित हो गयी है। नयी पीढ़ी ने तो छठवें और सातवें दशक तक व्यापार-व्यवसाय में हिसाब-किताब के लिए प्रयुक्त होने वाली इसभाषा का नाम भी न सुना होगा। मुडिय़ा एक तरह की कूट भाषा हुआ करती थी। सच पूछिए तो इसे भाषा कहना भी ठीक नहीं है। दरअसल, यह एक लिपि थी। भाषा तो हिन्दी ही थी। इस लिपि में कुल जमा 30 अक्षर हुआ करते थे। मात्राएं नहीं होती थीं। मात्राएं न होने के कारण कई बार इसे पढऩे में अर्थ का अनर्थ भी हो जाता था। इसको लेकर एक चुटकुला बहुत कहा-सुना जाता था। … एक बार एक सेठ ने दूसरे शहर में रहने वाले अपने भाई को मुडिय़ा में चिट्ïठी लिखी। उन्होंने चिट्ïठी में लिखा ‘बाबा अजमेर गये हैं। बड़ी बही को लेते आता।Ó चूंकि मुडिय़ा में किसी मात्रा का प्रयोग नहीं होताथा, इसलिए सेठ के भाई ने इसे यों पढ़ा, ‘बाबा आज मर गये हैं। बड़ी बहू को लेते आना।Ó
जैसा कि अन्य भाषाओं के साथ है, मुडिय़ा भी चित्र लिपि ही हुआ करती थी। इसका नाम मुडिय़ा शायद इसीलिए पड़ा होगा कि मात्राएं न होने के कारण यह मुंडी या मूंड़ मुड़ाए हुए सी दिखाई देती थी। मात्राओं से परहेज करने का एक कारण तो यह रहा होगा कि व्यापार का हिसाब-किताब सबकी नजरों के सामने खुलने से बचा रहे, दूसरा कारण शायद यह भी रहा हो कि मात्राएं न होने से इबारत दर्ज करने में कम वक्त लगता होगा।
मुडिय़ा में व्यावसायिक लिखा-पढ़ी पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में धीरे-धीरे बंद होती गयी। छठवें-सातवें दशक से बही खाते मुडिय़ा के बजाय देवनागरी लिपि में ही लिखे जाने लगे। अस्सी का दशक आते-आते मुडिय़ा का प्रयोग बिलकुल ही बंद हो गया। लगभग इसी समय से हिसाब-किताब रखने में प्रोद्यौगिकी और कम्प्यूटर का प्रयोग शुरू हुआ। इसी के साथ मुनीमत के पेशे का अवसान भी शुरू हुआ।
मुडिय़ा के मिटने में सरकारी तंत्र के दबाव ने भी काम किया। जैसे-जैसे व्यापारी-व्यवसायी कराधान तंत्र की गिरफ्त में आते गये, वैसे-वैसे इस कूट लिपि का खात्मा होने लगा। दरअसल कर-निर्धारण अधिकारियों को मुडिय़ा आती नहीं थी और बही-खातों की जांच परख के लिए उन्हें मुनीमों और व्यापारियों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। अफसरों को शंका रहती थी कि कहीं उन्हें बरगला न दिया गया हो। इसलिए बही खाते देवनागरी लिपि में लिखे जाने की मांग बढ़ी और कालान्तर में व्यापारियों को मुडिय़ा से किनारा करना पड़ा। अब इस लिपि को पढऩे, जानने और समझने वाले बहुत थोड़े से लोग ही कहीं बचे होंगे।


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